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छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता पर मंथन, धार्मिक-सामाजिक संगठनों से लिए गए सुझाव

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रायपुर, 27 अगस्त। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का प्रारूप तैयार करने की दिशा में जन-संवाद और सुझाव लेने की प्रक्रिया जारी है।

      इसी क्रम में राजधानी रायपुर के न्यू सर्किट हाउस में आज धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों, विभिन्न आयोगों, निगमों और मंडलों के पदाधिकारियों के साथ विस्तृत बैठक आयोजित की गई। बैठक में यूसीसी समिति के सदस्य एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह और एम.के. राउत, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार, सेवानिवृत्त अधिकारी ज्योति रानी सिंह तथा सदस्य सचिव श्याम धावड़े मौजूद रहे।

      संविधान के अनुच्छेद 44 में निहित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों को प्रभावी रूप देने के उद्देश्य से गठित समिति प्रदेश के विभिन्न वर्गों से सुझाव जुटा रही है। समिति द्वारा जिलों में फील्ड स्टडी, ऑनलाइन पोर्टल और जन-संवाद के माध्यम से आम नागरिकों, धार्मिक-सामाजिक संगठनों, कानूनविदों, प्रबुद्धजनों और जनप्रतिनिधियों की राय ली जा रही है।

विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में समानता पर जोर

      बैठक में समान नागरिक संहिता के तहत विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत एवं पारिवारिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान और न्यायसंगत कानूनी व्यवस्था बनाने पर चर्चा हुई। प्रस्तावित व्यवस्था में धर्म, जाति या पंथ के आधार पर अलग-अलग नियमों के स्थान पर समान कानूनी ढांचे की दिशा में आगे बढ़ने पर जोर दिया गया।

     समिति के समक्ष महिलाओं और पुरुषों के समान अधिकार, विशेषकर उत्तराधिकार और वैवाहिक अधिकारों में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के सुझाव भी रखे गए। इसके साथ ही व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद जटिलताओं और अस्पष्टताओं को दूर कर एक स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित कानूनी व्यवस्था विकसित करने पर भी विचार-विमर्श हुआ।

    बैठक में मौखिक तलाक जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने तथा पारिवारिक मामलों में महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने से जुड़े विषयों पर भी सुझाव दिए गए। लिव-इन संबंधों जैसे समकालीन सामाजिक विषयों को भी प्रस्तावित संहिता के दायरे में न्यायसंगत तरीके से शामिल करने की आवश्यकता बताई गई।

जनजातीय परंपराओं को लेकर संवेदनशीलता

      छत्तीसगढ़ की विशिष्ट जनजातीय सामाजिक व्यवस्था और पारंपरिक रूढ़ियों को लेकर भी बैठक में महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। समिति ने संकेत दिया कि प्रस्तावित यूसीसी के प्रावधानों का राज्य की जनजातीय और रूढ़िगत परंपराओं पर पड़ने वाले व्यावहारिक प्रभावों का संवेदनशीलता के साथ आकलन किया जाएगा।

      बैठक में इस बात पर भी जोर रहा कि छत्तीसगढ़ की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए ऐसी संहिता तैयार हो, जिसमें समानता के साथ स्थानीय परंपराओं और समुदायों की विशिष्टताओं का भी समुचित अध्ययन किया जाए।

विभिन्न समुदायों की रही भागीदारी

      बैठक में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समुदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर अपने सुझाव समिति के समक्ष रखे। इनमें मध्य क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष प्रणव कुमार मरपच्ची, विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष ललित माखीजा, क्रिश्चियन समाज के जान राजेश पॉल, मुस्लिम समाज के अध्यक्ष सलाम रिजवी, गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष इंद्रजीत छाबड़ा, अन्य पिछड़ा वर्ग प्राधिकरण के उपाध्यक्ष ललित चंद्राकर और राज्य नीति आयोग के अध्यक्ष गणेश शंकर मिश्रा शामिल रहे।

      इसके अलावा राज्य खाद्य आयोग के अध्यक्ष संदीप शर्मा, महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. ममता साहू तथा सदस्य सरला कोसरिया और दीपिका सोरी, गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष विशेषर पटेल, राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष अमरजीत छाबड़ा, राज्य नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव, अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष रूप सिंह मंडावी, मछुआ कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष लखन लाल धीवर तथा जैतू साव मठ के महंत राम सुंदर दास सहित अग्रवाल समाज, माहेश्वरी समाज और अन्य सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

व्यापक जन-संवाद से तैयार होगा प्रारूप

      समिति प्रदेश में यूसीसी के संभावित प्रारूप को व्यापक जन-संवाद के आधार पर तैयार करने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए अलग-अलग वर्गों से प्राप्त सुझावों का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि प्रस्तावित संहिता में सामाजिक विविधता, लैंगिक समानता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन कायम किया जा सके।

      समिति के समक्ष हुई परिचर्चा में सभी नागरिकों को विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और अन्य व्यक्तिगत मामलों में समान अधिकार उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। बैठक में मिले सुझावों को प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के प्रारूप में शामिल करने के लिए समिति द्वारा उनका परीक्षण किया जाएगा।

     समिति की ओर से प्रदेशव्यापी स्तर पर चल रही यह प्रक्रिया छत्तीसगढ़ के लिए ऐसी समान नागरिक संहिता तैयार करने की कवायद के रूप में देखी जा रही है, जो समानता और न्याय के सिद्धांतों के साथ प्रदेश की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को भी ध्यान में रखे।