रायपुर, 27 अगस्त। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू किए जाने की चर्चाओं के बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने भाजपा सरकार पर आदिवासी हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की करीब 32 प्रतिशत आबादी आदिवासी है और यूसीसी लागू होने की स्थिति में उनके संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
श्री बैज ने आज यहां जारी बयान में कहा कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज को संविधान के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है। राज्य में पेसा कानून लागू है, वहीं पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों के अलावा भू-राजस्व संहिता में भी आदिवासियों की जमीन और अधिकारों को लेकर विशेष प्रावधान किए गए हैं। ऐसे में यूसीसी लागू होने पर इन व्यवस्थाओं और अधिकारों की स्थिति क्या होगी, सरकार को इसका स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
उन्होंने सवाल किया कि छत्तीसगढ़ में यूसीसी की आवश्यकता आखिर क्यों है और इससे आदिवासी समाज को कोई नुकसान नहीं होगा, इसकी गारंटी सरकार किस आधार पर देगी। बैज ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को लागू करने के लिए आदिवासी समाज पर यूसीसी थोपने की तैयारी कर रही है, जिससे प्रदेश के आदिवासियों में चिंता है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने मांग की कि सरकार स्पष्ट घोषणा करे कि यूसीसी के दायरे से आदिवासी समाज को बाहर रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य में यूसीसी लागू होने पर आदिवासियों के हितों और उनके पारंपरिक अधिकारों का हनन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सरकार से पूछे पांच सवाल
श्री बैज ने मुख्यमंत्री और राज्य सरकार से आदिवासी अधिकारों को लेकर कई सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि सरकार स्पष्ट करे कि यूसीसी लागू होने के बाद क्या पेसा कानून का अस्तित्व और उसके प्रावधान यथावत रहेंगे। पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाली पंचायतों के अधिकारों में कोई बदलाव तो नहीं किया जाएगा, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
उन्होंने विशेष संरक्षित जनजातियों के अधिकारों को लेकर भी सरकार से जवाब मांगा। बैज ने कहा कि बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, अबुझमाड़िया, भुंजिया और पांडा जैसी जनजातियों को संविधान और कानूनों के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है। यूसीसी लागू होने के बाद इनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे या नहीं, सरकार को इसकी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
इसके अलावा उन्होंने भू-राजस्व संहिता में आदिवासियों की जमीन के मालिकाना हक से जुड़े प्रावधानों में किसी तरह के बदलाव की आशंका को भी उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या आदिवासियों की जमीनों पर उनके सामुदायिक अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे और यूसीसी के कारण इन अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।




