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मंदिर का धन देवता का है, सरकार का नहीं : न्यायपालिका का स्पष्ट संदेश- डॉ.चन्द्र गोपाल पाण्डेय

 

मंदिर सिर्फ व सिर्फ पूजा, श्रद्धा और आस्था का केन्द्र है, इससे शायद किसी की असहमति हो।मन्दिर शब्द का अपना धार्मिक निहितार्थ है।’देवालय’  जैसे पवित्र स्थल के विवाद को समाज अच्छा नही मानता है।पहले मंदिरों के स्वामित्व, उत्तराधिकार व प्रबंधन आदि को लेकर मुकदमेबाजी होती थी।इधर विवाद के केंद्र में दान, चढ़ावे की धनराशि के व्यय के मद और रख-रखाव को लेकर कोर्ट -कचेहरी हो रही है।ऐसे विवाद उन मंदिरों के भी हैं,जिनके संचालन के लिए विधिवत ट्रस्ट बने हैं या उनकी व्यवस्था शासन द्वारा अधिनियमित है।

    विगत सप्ताह श्री बांके बिहारी मंदिर में ‘विशेष पूजा ‘ पर सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी अकारण नहीं है।मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत का कथन  कि दोपहर 12 बजे मंदिर बंद होने के बाद भी भगवान को एक मिनट तक आराम नहीं मिलता और इसी समय सबसे अधिक विशेष पूजाएं कराई जाती हैं, जिनमें केवल धन अदा करने वाले शामिल हो सकते हैं।पीठ ने इसे भगवान के ‘शोषण’ जैसा करार दिया है।किसी मठ मन्दिर की (अ) व्यवस्था के प्रति सर्वोच्च न्यायालय  की यह कोई सामान्य टिप्पणी नही है।न्यायमूर्तिगण सूर्यकांत, जॉयमाल्या बागची और विपुल पंचोली की पीठ वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

   याचिका में मुख्य रूप से उच्च अधिकार प्राप्त समिति के उस व्यवस्थात्मक नीति को चुनौती दी गई है, जिसमें मंदिर के दर्शन समय में बदलाव के साथ ही देहरी पूजा जैसी धार्मिक परंपराओं को बन्द किया गया है।

   यकीनन सरकार ने मन्दिर प्रबंधन को अधिक उत्तरदायी बनाने के लिये ‘ उत्तर प्रदेश श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट ऑर्डिनेंस – 2025’ जारी किया है।इसमें निहित व्यवस्था से बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन समिति असहमत है और इसी के बाद यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा है।

   केरल के वायनाड जिले में स्थित प्राचीन थिरुनेल्ली महाविष्णु मंदिर की मुकदमेबाजी एक अलग किस्म की रही।थिरुनेल्ली मन्दिर देवस्वम, को बैंक में  जमा पैसे (एफ डी की धनराशि)को वापस पाने के लिये सर्वोच्च न्यायालय तक की  शरण लेनी पड़ी।

    दक्षिण की काशी के रूप में प्रसिद्ध इस मंदिर के मामले में सर्वोच्च न्यायालय  (5 दिसम्बर25) की स्पष्ट टिप्पणी थी कि मंदिर का धन देवता का धन होता है और सहकारी बैंकों को “सहारा देने” के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।मन्दिर देवस्वम कोऑपरेटिव बैंकों में मन्दिर की सवधि जमा(एफ डी)पैसे को वापस चाहती थी और बैंक वापस नही कर रहा था।विवश होकर मन्दिर देवस्वम को केरल उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करनी पड़ी, जिसमें बैंकों को जमा राशियों को लौटाने का आदेश दिया गया। लेकिन बैंकों ने केरल उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन करने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी।

  शीर्ष न्यायालय का नजरिया बैंक व मन्दिर प्रबंधन दोनों के लिये निर्देशात्मक रहा। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि क्या मंदिर का पैसा बैंक को बचाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं? मंदिर की राशि ऐसी सहकारी बैंक में क्यों रखी जाए जो मुश्किल हालत में है? उसे एक राष्ट्रीयकृत बैंक में क्यों न रखा जाए, जहाँ अधिक ब्याज भी मिले।पीठ ने कहा मंदिर का पैसा देवता का है।इसे सुरक्षित रखना और केवल मंदिर के हित में उपयोग करना आवश्यक है।इन्हीं टिप्पणियों के साथ सहकारी बैंकों की सभी याचिकाएँ खारिज कर दीं।

   इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय का सुविचारित मत रहा है कि मन्दिर में चढ़ाया गया धन और सम्पत्ति देवता की होती है।मद्रास उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती देने वाली तमिलनाडु राज्य की याचिका को इसी स्थिर मत के  साथ खारिज कर दी थी। तामिलनाडु सरकार मन्दिर के अधिशेष धन से विवाह मण्डप (मैरिज हाल) बनाना चाहती थी। इस हेतु निर्गत शासनादेश की वैधता को  मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने निर्णय में कहा कि मंदिरों में प्राप्त दान का उपयोग केवल धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए ही किया जाना चाहिए। इसे विवाह हॉल बनाने या अन्य वाणिज्यिक/गैर-धार्मिक परियोजनाओं के लिए उपयोग करना विधिसम्मत नही है।सर्वोच्च न्यायालय के अभिमत को दोहराया कि मन्दिर का धन भगवान का है, सरकार का नहीं।उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार के मंदिर के धन से मैरिज हॉल बनाने की अनुमति देने वाले शासनादेश को रद्द कर दिया और कहा कि विवाह जैसे संस्कार में व्यावसायिक पहलू जुड़ने से यह धार्मिक उपयोग नहीं रह जाता।

   उच्च न्यायालय ने यहां तक कहा कि वह मंदिर के धन और संपत्ति के संरक्षक के रूप में कार्य करती है, इसलिए इसका दुरुपयोग रोकने के लिए हस्तक्षेप करना उसका कर्तव्य है।

केरल के गुरुवायूर श्रीकृष्ण मन्दिर की धनराशि व्यय करने के प्रावधान भी कुछ इसी तरह है।गुरुवायूर देवास्वोम अधिनियम,1978 में मन्दिर के फंड को मन्दिर के उद्देश्यों के इतर ख़र्च करने की इजाजत नही है।मंदिर फंड से मुख्यमंत्री आपदा राहत कोष में धनराशि दिए जाने को केरल उच्च न्यायालय ने ‘कानून के तहत अमान्य’ करार दिया था और धनराशि वापस लेने का आदेश दिया था।इस आदेश के विरुद्ध अपील सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

  मन्दिर के धन के दुरुपयोग के मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का नजरिया अधिक कठोर है।किसी ट्रस्टी द्वारा या उसके निर्णय से धन का दुरुपयोग पाए जाने पर उससे वसूली करने को कहा है। यह भी कहा कि धन का दुरुपयोग आपराधिक न्यास भंग ( क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट) होगा। न्यायालय ने आदेश दिया कि भक्तों में विश्वास जगाने के लिए सभी मंदिरों को अपनी मासिक आय और व्यय, दान से वित्तपोषित परियोजनाओं का विवरण और ऑडिट का सारांश नोटिस बोर्ड या वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना चाहिए।कश्मीर चंद शाद्याल बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य 2025:एच एच सी:34567 के इस निर्णय  में स्पष्ट किया गया है कि मंदिर का कोष (फंड) देवता का होता है, न कि सरकार का। मंदिर के धन का उपयोग केवल मंदिर के धार्मिक उद्देश्यों या धार्मिक दान के लिए ही किया जा सकता है। इस धन को राज्य के सामान्य राजस्व या सामान्य सार्वजनिक कोष की तरह नहीं माना जा सकता है। इसे सरकार की किसी भी कल्याणकारी योजना या मंदिर या धर्म से असंबंधित अन्य गतिविधियों के लिए डायवर्ट नहीं किया जा सकता है।

   इधर सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पूरे देश में मंदिरों की सम्पत्तियों पर कब्जे को लेकर एक अलग तरह की याचिका दाखिल की गई। इस याचिका (गौतम आनन्द बनाम भारत संघ डब्ल्यू .पी.( सी)नम्बर 001221/2025) में मन्दिर -सम्पत्ति पर कब्जे की जांच के लिए समिति बनाने के निर्देश देने की मांग की गयी थी।लेकिन न्यायालय ने सुनवाई करने से यह कहते हुए मना कर दिया कि वह ऐसे मामलों पर पूरे देश में निर्देश जारी नहीं कर सकता।

सम्प्रति- लेखक डा.चन्द्रगोपाल पांडेय वरिष्ठ पत्रकार है।डा.पांडेय के विभिन्न विषयों पर लेख प्रमुख समाचार पत्रों में छपते रहते है।