Thursday , January 8 2026

पिथौरा में स्वराज्य करुण के कविता-संग्रह ‘दिलवालों का देश कहाँ’ का विमोचन

पिथौरा, 08 जनवरी।श्रृंखला साहित्य मंच पिथौरा द्वारा तहसील मुख्यालय पिथौरा में आयोजित गरिमामय साहित्यिक समारोह में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार एवं श्रृंखला मंच के वरिष्ठ सदस्य स्वराज्य करुण के कविता-संग्रह ‘दिलवालों का देश कहाँ’ का विमोचन किया गया।

  पुस्तक का विमोचन वरिष्ठ साहित्यकार, भाषा-विज्ञानी तथा छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पंडित सुन्दरलाल शर्मा राज्य अलंकरण से सम्मानित डॉ. चित्तरंजन कर ने मुख्य अतिथि के रूप में किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि, पत्रकार एवं लेखक गिरीश पंकज ने की।

   समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. चित्तरंजन कर ने कहा कि किसी भी देश और समाज की वास्तविक पहचान उसके साहित्य में प्रतिबिंबित होती है। साहित्य रचना कोई मनोरंजन नहीं, बल्कि चेतना, वेदना और संवेदना का सशक्त माध्यम है। साहित्यकार समाज रूपी शरीर का मुख होता है, जो समाज के दर्द और पीड़ा को शब्द देता है। उन्होंने मानवीय मूल्यों के निरंतर हो रहे विघटन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि परिवर्तन स्वाभाविक है, किंतु मानवीय संवेदनाओं का क्षरण चिंताजनक है। डॉ. कर ने कहा कि साहित्य संस्कार है और भाषा संस्कृति। गीत और कविता जब तक जीवित हैं, तब तक मनुष्यता जीवित रहती है। उन्होंने स्वराज्य करुण की कविताओं को करुणा, देशज भावनाओं और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण बताया।

     अध्यक्षीय उद्बोधन में गिरीश पंकज ने कहा कि आज के समय में कई कविताओं में कलात्मकता तो है, लेकिन भाषा की धार और सामाजिक प्रतिबद्धता का अभाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि स्वराज्य करुण विगत चार दशकों से लोक-मंगल, सामाजिक सरोकार और जन-जागरण के कवि रहे हैं। उनके कविता-संग्रह ‘दिलवालों का देश कहाँ’ पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि कवि इस बात से चिंतित है कि देश धीरे-धीरे धनवालों का देश बनता जा रहा है, जिससे दिलवालों का देश हाशिए पर चला गया है। यह संग्रह उसी हाशिए पर पड़े देश को फिर से केंद्र में लाने का प्रयास है। संग्रह की कविताओं में रोमांस नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा की ईमानदार अभिव्यक्ति है। गीत और ग़ज़ल सहित सभी रचनाएँ छंदबद्ध हैं और पाठक को गहराई से सोचने के लिए विवश करती हैं।

   विशेष अतिथि जी. आर. राना, वरिष्ठ साहित्यकार एवं छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष ने ग्रामीण जीवन में आ रहे नकारात्मक परिवर्तनों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हमारे गाँवों से धीरे-धीरे बरगद, पीपल, दाऊ का बाड़ा और आपसी आत्मीयता गायब होती जा रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने अपनी लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी कविता की पंक्तियाँ भी प्रस्तुत कीं। उन्होंने कहा कि पुस्तक का शीर्षक हमारे खोते हुए गाँवों और खोते हुए देश की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है।

   विशेष अतिथि वरिष्ठ कथाकार एवं उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक ने भी संग्रह की प्रशंसा करते हुए इसे संवेदनशील और विचारोत्तेजक काव्य-संकलन बताया। महासमुंद के कवि अशोक शर्मा ने कहा कि साहित्य समाज को ऊर्जा देता है और साहित्यिक रचनाएँ समय से परे शाश्वत होती हैं।

   समारोह का स्वागत भाषण श्रृंखला साहित्य मंच के अध्यक्ष प्रवीण प्रवाह ने दिया तथा संचालन मंच के पूर्व अध्यक्ष उमेश दीक्षित ने किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. चित्तरंजन कर ने स्वराज्य करुण के कविता-संग्रह के कुछ गीतों के साथ-साथ प्रवीण प्रवाह की एक ग़ज़ल का संगीतमय पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। समारोह में महासमुंद, बागबाहरा, बसना, अभनपुर, रायपुर सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए बड़ी संख्या में साहित्यकार और साहित्य-प्रेमी उपस्थित थे।