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वोट के बदले नकद? चुनावी लोकलुभावन योजनाओं की बढ़ती परंपरा-अशोक कुमार साहू

पिछले कुछ वर्षों से चुनावों के दौरान मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राज्यों द्वारा की जा रही लोकलुभावन घोषणाओं और उनके कारण राज्यों की वित्तीय स्थिति पर पड़ रहे भारी बोझ को लेकर देश-व्यापी बहस चल रही है। इसी बहस के बीच चुनावी राज्य असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 37 लाख महिलाओं को आठ हजार रुपये नगद देने की घोषणा कर यह साफ संकेत दे दिया है कि मतदाताओं को रिझाने का यह अब तक सफल रहा सिलसिला फिलहाल थमने वाला नहीं है।

दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में चुनावों के समय मुफ्त योजनाओं की परंपरा काफी पुरानी है। इसकी शुरुआत 1960 के दशक में स्कूली बच्चों को मुफ्त भोजन देने से हुई थी। बाद के वर्षों में यह दायरा बढ़ता गया और साड़ी-धोती, रंगीन टीवी, लैपटॉप और वाशिंग मशीन तक बांटी जाने लगीं। दक्षिण से शुरू हुई यह परंपरा अब उत्तर और मध्य भारत तक पहुंच चुकी है और इसका स्वरूप भी बदल गया है। वर्तमान समय में लोकलुभावन घोषणाएं सीधे नकद हस्तांतरण (Direct Cash Transfer) पर केंद्रित हो गई हैं।

उत्तर भारत में आम आदमी पार्टी (आप) ने इस मॉडल का सफल प्रयोग किया। इसके बल पर वह दिल्ली में लगातार दो बार सत्ता में आई और पंजाब में भी सरकार बनाने में सफल रही। यह भी माना जाता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव में आप की इसी रणनीति ने कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया। इसके बाद कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में छह गारंटियों की घोषणा कर सत्ता में वापसी की। तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में भी नकद हस्तांतरण आधारित घोषणाओं ने कांग्रेस की जीत में अहम भूमिका निभाई।

कभी इस तरह की घोषणाओं की मुखर विरोधी रही भारतीय जनता पार्टी भी अब चुनावी सफलता के लिए नकद हस्तांतरण की रणनीति में सबसे आगे नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सार्वजनिक मंचों से मुफ्त में “रेवड़ी बांटने” की संस्कृति के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन राज्यों में उनकी पार्टी और सहयोगी दल सत्ता हासिल करने या बचाए रखने के लिए इसी नीति का सहारा ले रहे हैं। स्पष्ट है कि लगभग सभी राजनीतिक दल बजट पर पड़ने वाले दबाव, शिक्षा-स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना के लिए धन की कमी की चिंता से अधिक सत्ता प्राप्ति पर जोर दे रहे हैं।

नकद हस्तांतरण योजनाओं के चुनावी असर का अंदाजा मध्यप्रदेश से लगाया जा सकता है। जून 2023 में सत्ता-विरोधी लहर से जूझ रही शिवराज सिंह चौहान सरकार ने लाड़ली बहना योजना के तहत 1.29 करोड़ महिलाओं को 1250 रुपये प्रतिमाह देना शुरू किया और दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में शानदार वापसी की। छत्तीसगढ़ में भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए महतारी वंदन योजना को इस तरह प्रचारित किया कि मजबूत मानी जा रही भूपेश बघेल सरकार सत्ता से बाहर हो गई। महाराष्ट्र में लोकसभा चुनावों में पिछड़ने के बाद भाजपा-महायुति सरकार ने लाड़ली बहिन योजना शुरू की और विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से वापसी की।

झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार ने विधानसभा चुनाव से कुछ माह पहले मइया सम्मान योजना शुरू की और भाजपा की पूरी ताकत झोंकने के बावजूद सत्ता में बनी रही। पंजाब में आप ने एक हजार रुपये प्रतिमाह देने का वादा कर सरकार बनाई। हरियाणा में भाजपा ने 2100 रुपये प्रतिमाह देने की घोषणा कर सत्ता में वापसी की, जबकि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार गृह लक्ष्मी योजना के तहत महिलाओं को दो हजार रुपये प्रतिमाह दे रही है।

हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनावों में भी चुनाव से ठीक पहले करोड़ों लाभार्थियों, विशेषकर महिलाओं, के खातों में सीधे पैसे ट्रांसफर किए गए। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत लगभग 1.41 करोड़ महिलाओं को 10 हजार रुपये की सहायता डीबीटी के माध्यम से दी गई, जिसे एनडीए की जीत का प्रमुख कारण माना जा रहा है।

अब असम में विधानसभा चुनाव से चार माह पहले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अरुणोदय योजना के तहत 37 लाख महिलाओं को बिहू उपहार के रूप में आठ हजार रुपये देने की घोषणा कर दी है। 20 फरवरी को यह राशि एक साथ उनके खातों में ट्रांसफर की जाएगी। इस वर्ष असम के साथ-साथ केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि सत्ता में बने रहने या सत्ता हासिल करने के लिए वहां किस तरह की नकद हस्तांतरण घोषणाएं की जाती हैं।

चुनावी वर्षों में ऐसी घोषणाओं का सीधा असर राज्यों की वित्तीय सेहत पर पड़ रहा है। पिछले दो दशकों में जिन 20 राज्यों में चुनाव हुए, वहां चुनावी वर्ष में राजकोषीय घाटा राज्य के सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले औसतन 0.5 प्रतिशत अधिक रहा। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, मध्यप्रदेश, ओडिशा, आंध्रप्रदेश और झारखंड में यह स्थिति और गंभीर रही है। राज्यों द्वारा कर्ज लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसमें बीते वर्ष 8 से 10 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है।

रिजर्व बैंक, पीआरएस और अन्य वित्तीय एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार तेलंगाना में छह गारंटियों पर 56 हजार करोड़, कर्नाटक में विभिन्न योजनाओं पर 48 हजार करोड़, महाराष्ट्र में लाड़ली बहिन योजना पर 45 हजार करोड़, उत्तर प्रदेश में मुफ्त राशन पर 20 हजार करोड़ और मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना योजना पर करीब 19,350 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।

बिहार में वित्त वर्ष 2024-25 में टैक्स से 54 हजार करोड़ रुपये की आय हुई, जबकि चुनावी घोषणाओं को पूरा करने में इसकी 62 प्रतिशत से अधिक राशि खर्च हो जाएगी। छत्तीसगढ़ के बजट पर भी लोकलुभावन योजनाओं का भारी दबाव है, जिससे विकास कार्यों के लिए उपलब्ध राशि लगातार घटती जा रही है।राज्य का चालू वित्त वर्ष का बजट एक लाख 65 हजार करोड़ का है.जिसमें 53 हजार करोड़ रूपए मुफ्त एवं रियायत पर तथा 55 हजार करोड़ रूपए वेतन पेंशन पर खर्च हो रही है।इसके साथ ही बड़ी राशि कर्जों की अदायगी और ब्याज चुकाने में जा रही है।इसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ रहा है।विकास कार्यों के लिए राशि लगातार कम होती जा रही है।पिछले दो दशक में राज्य में जिस तेजी से विकास कार्य हुए उन पर लगभग लगाम लगती जा रही है।राज्य के वित्त मंत्री ओ.पी.चौधरी स्वीकारते है कि मुफ्त एवं रियायत पर खर्च हो रही राशि का दबाव रहता है लेकिन उन्होने यह भी कहा कि लोकतंत्र में सरकार को जनता की तकलीफ दूर करने के लिए वेलफेयर का काम करना पड़ता है। 

  सीधे नकद हस्तांतरण और मुफ्त योजनाओं पर बहस वर्षों से जारी है, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति बनती नहीं दिख रही। उलटे यह प्रवृत्ति और मजबूत होती जा रही है। चुनाव जीतने का यह एक आजमाया हुआ फार्मूला बन चुका है। संसद की लोक लेखा समिति के सौ वर्ष पूरा होने पर 2021 में तत्कालीन उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने विकास की बजाय मुफ्त में दान देने वाली घोषणाओं पर व्यापक बहस की आवश्यकता जताई थी।उच्चतम न्यायालय ने भी चुनाव आयोग से कहा था कि वह राजनीतिक दलों की ओर से की जाने वाली घोषणाओं के मामले में दिशा निर्देश जारी करें,लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ ठोस नही हो पाया।

  भारतीय रिजर्व बैंक ने भी एक बाऱ फिर 2025 के अंत में राज्यों को चुनाव-पूर्व अत्यधिक खर्च और वित्तीय घाटे के प्रति सचेत किया है। विशेषज्ञों का मानना हैं कि अगर लोक लुभावन घोषणाएं कर चुनाव जीतने की प्रवृत्ति पर लगाम नही लगी तो फिर विकास की दीर्घकालीन योजनाओं के लिए कोई स्थान नही बचेगा।

लेखक-अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।