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रायपुर साहित्य उत्सव : शब्द, संस्कृति और विचारों से गढ़ा गया बौद्धिक उत्सव – अशोक कुमार साहू 

                                                                       

जनवरी की ठंडी सुबह, बसंत पंचमी की उजास और विचारों से भरा वातावरण,नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन परिसर तीन दिनों तक किसी साधारण आयोजन स्थल जैसा नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के एक जीवंत केंद्र में परिवर्तित हो गया था। हर ओर पुस्तकों की सुगंध, कविताओं की गूंज, विचारों की बहस और लोकसंस्कृति की आत्मीय उपस्थिति महसूस की जा सकती थी। अवसर था रायपुर साहित्य उत्सव 2026 का, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि डिजिटल शोर और त्वरित संवाद के इस दौर में भी साहित्य की प्रासंगिकता न केवल बनी हुई है, बल्कि वह समाज को दिशा देने वाली केंद्रीय शक्ति के रूप में उपस्थित है।

  ‘आदि से अनादि तक’ की भावभूमि पर आधारित यह तीन दिवसीय साहित्यिक महोत्सव (23 से 25 जनवरी)केवल कार्यक्रमों की श्रृंखला भर नहीं था, बल्कि यह विचार, संवेदना और संवाद का ऐसा समग्र अनुभव था, जिसमें परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे से संवाद करती दिखाई दीं। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन वैश्विक चिंतन का संगम इस उत्सव को विशिष्ट बनाता रहा। यह आयोजन स्पष्ट संकेत दे गया कि रायपुर साहित्य उत्सव अब केवल एक वार्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सतत बौद्धिक यात्रा का स्वरूप ग्रहण कर चुका है।

  उत्सव का शुभारंभ बसंत पंचमी के पावन अवसर पर हुआ। विनोद कुमार शुक्ल मंडप में आयोजित उद्घाटन समारोह में साहित्य, राजनीति, शिक्षा, मीडिया और कला जगत की प्रतिष्ठित हस्तियों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा को और ऊंचा कर दिया। राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश ने अपने संबोधन में साहित्य को समाज की आत्मा बताते हुए कहा कि एक लेखक और एक पुस्तक भी इतिहास की दिशा बदल सकती है। उन्होंने संत कबीर, तुलसी और आधुनिक हिंदी साहित्य के उदाहरणों के माध्यम से यह रेखांकित किया कि साहित्य केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का वाहक है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अपने उद्बोधन में रायपुर साहित्य उत्सव को साहित्य का महाकुंभ बताते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ प्रभु श्रीराम का ननिहाल है और इस भूमि पर साहित्य का ऐसा विराट आयोजन सांस्कृतिक गर्व का विषय है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को समुद्र मंथन की संज्ञा देते हुए कहा कि जैसे सेनानियों ने स्वयं कष्ट सहकर समाज को अमृत दिया, वैसे ही साहित्यकार अपने शब्दों के माध्यम से समाज को दिशा और आत्मबल प्रदान करते हैं। उनके शब्दों में साहित्य समाज की आत्मा को जीवित रखने वाला तत्व है।

उद्घाटन अवसर पर पुस्तकों का विमोचन केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि वह विचारों का दस्तावेज़ बनकर सामने आया। छत्तीसगढ़ राज्य के 25 वर्षों की यात्रा पर आधारित प्रकाशन, राज्य के साहित्यकारों पर केंद्रित कॉफी टेबल बुक और समकालीन विषयों पर आधारित पुस्तकों ने यह संकेत दिया कि यह उत्सव अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच सेतु का कार्य कर रहा है। इन पुस्तकों में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, संघर्ष और उपलब्धियों की स्पष्ट झलक देखने को मिली।

उत्सव का दूसरा दिन पूरी तरह बौद्धिक विमर्श को समर्पित रहा। भारत के बौद्धिक चिंतन, भारतीय दृष्टि और वैश्विक संवाद पर केंद्रित परिचर्चाओं में वक्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी सैन्य या आर्थिक क्षमता में नहीं, बल्कि उसके विचारों में निहित होती है। वक्ताओं ने इस धारणा को सशक्त तर्कों के साथ खारिज किया कि बौद्धिकता केवल पश्चिम की देन है। भारतीय दर्शन, उपनिषद, वेद और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसी अवधारणाओं को आज की वैश्विक चुनौतियों के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया।

डॉ. भीमराव अंबेडकर पर केंद्रित परिचर्चा विशेष रूप से विचारोत्तेजक रही। वक्ताओं ने उन्हें केवल एक वर्ग या विचारधारा तक सीमित करने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि डॉ. अंबेडकर संपूर्ण भारतीय समाज के चिंतक थे। संविधान निर्माण, सामाजिक न्याय, श्रम अधिकार, महिला सशक्तिकरण और आर्थिक दृष्टि—इन सभी क्षेत्रों में उनके योगदान को समग्र रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया गया। यह सत्र इतिहास के पुनर्पाठ और वर्तमान के आत्ममंथन जैसा प्रतीत हुआ।

छत्तीसगढ़ के लोकगीतों पर केंद्रित चर्चा ने इस बात को रेखांकित किया कि लोकसंस्कृति किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि समाज की जीवंत स्मृति है। खेतों में गाए जाने वाले गीत, पर्व-त्योहारों की धुनें और जीवन के संघर्षों से उपजे स्वर लोकगीतों के माध्यम से आज भी जीवित हैं। वक्ताओं ने कहा कि लोकगीतों में छत्तीसगढ़ की आत्मा बसती है और इन्हें संरक्षित करना सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

सिनेमा और मीडिया पर केंद्रित सत्रों में समकालीन समाज के महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए। फिल्मकारों और विचारकों ने कहा कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का प्रभावी माध्यम है। मजबूत कहानी, संवेदना और सच्चाई ही किसी फिल्म को कालजयी बनाती है। वहीं मीडिया पर हुई चर्चाओं में पत्रकारिता की विश्वसनीयता, जमीनी रिपोर्टिंग और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर गंभीर मंथन हुआ। वक्ताओं का मत था कि मीडिया को केवल कंटेंट उत्पादन की दृष्टि से नहीं, बल्कि समाज के प्रहरी के रूप में देखा जाना चाहिए।

डिजिटल युग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता(एआई)पर आधारित परिचर्चा उत्सव का सबसे समकालीन पक्ष रही। वक्ताओं ने तकनीक और परंपरा के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीक भारतीय ज्ञान परंपरा की विरोधी नहीं, बल्कि उसकी सहयोगी बन सकती है। ई-बुक्स, ऑडियो बुक्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने साहित्य को नए पाठक दिए हैं और यह परिवर्तन साहित्य के विस्तार का संकेत है, न कि उसके पतन का।

उत्सव का तीसरा और अंतिम दिन अधिक आत्ममंथन और सांस्कृतिक चेतना से भरा रहा। नवयुग में भारत बोध पर केंद्रित चर्चा में वक्ताओं ने कहा कि मानसिक गुलामी से मुक्ति, भारतीय भाषाओं का सम्मान और अपनी सांस्कृतिक दृष्टि का विकास ही सच्चे भारत बोध की नींव है। शिक्षा, भाषा और संस्कृति के प्रश्नों को एक-दूसरे से जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया गया कि आत्मविश्वासी समाज ही वैश्विक मंच पर सशक्त भूमिका निभा सकता है।

चित्रकला प्रदर्शनी उत्सव का एक महत्वपूर्ण आकर्षण रही। छत्तीसगढ़ महतारी, बस्तर के बाजार, आदिवासी जीवन और राजिम कुंभ पर आधारित चित्रों ने बिना शब्दों के इतिहास और संस्कृति की कथा कह दी। यह प्रदर्शनी दर्शकों के लिए मौन संवाद का माध्यम बनी, जहाँ रंगों ने भावनाओं को स्वर दिया।

बाल साहित्य पर केंद्रित चर्चाओं में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण साहित्य की कमी महसूस की जा रही है। वक्ताओं ने कहा कि बाल साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कार और संवेदना की पहली पाठशाला है। नाट्यशास्त्र और भारतीय कला परंपरा पर आधारित सत्रों ने यह रेखांकित किया कि भारतीय कला केवल सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि से भी समृद्ध है।

  समापन समारोह में राज्यपाल रमेन डेका ने अपने उद्बोधन में कहा कि इंटरनेट और नई पीढ़ी के इस दौर में भी साहित्य और प्रिंट मीडिया का महत्व कभी कम नहीं होगा। शब्द समाज को जोड़ते हैं, सोच को गहराई देते हैं और मनुष्य को बेहतर इंसान बनाते हैं। उनके शब्दों में यह उत्सव इस बात का प्रमाण है कि साहित्य आज भी जीवित, सक्रिय और प्रासंगिक है।

   इस आयोजन के लिए पुरखौती मुक्तांगन का चयन और आयोजन समिति के कर्ताधर्ता रहे मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा,छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा,जनसम्पर्क आयुक्त रवि मित्तल एवं उनकी पूरी टीम द्वारा इसे सफल बनाने के लिए किए गए अथक परिश्रम को याद नही करना उनके साथ नाइंसाफी होंगी।   

  फिलहाल, रायपुर साहित्य उत्सव 2026 यह स्पष्ट संदेश देकर संपन्न हुआ कि छत्तीसगढ़ की धरती केवल लोकसंस्कृति की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक संवाद की उर्वर भूमि भी है। विचार, कला और संवाद का यह महोत्सव साहित्य को वर्तमान से जोड़ते हुए भविष्य की ओर देखने का साहस देता है। यह उत्सव यह विश्वास भी दिलाता है कि शब्द कभी निष्क्रिय नहीं होते,वे समय के साथ चलते हैं, समाज को दिशा देते हैं और चेतना को जीवित रखते हैं।

लेखक-अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।