Friday , February 27 2026

विकास की सड़क पर बढ़ता दुर्घटनाओं का अंधेरा-अशोक कुमार साहू                               

                          

भारत में एक ओर सड़क अवसंरचना का अभूतपूर्व विस्तार हो रहा है, तो दूसरी ओर सड़क हादसों की भयावह तस्वीर हमारे विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही है। एक्सप्रेसवे, नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे की लंबाई बढ़ी है, लेकिन इन सड़कों पर हर दिन दर्जनों जिंदगियां खत्म हो रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में हर वर्ष लगभग 5 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और करीब 1.8 लाख लोग अपनी जान गंवा देते हैं। यह संख्या किसी युद्ध या महामारी से कम नहीं है।

    केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में स्वीकार किया हैं कि सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें किसी भी राष्ट्रीय संकट से कम नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि दुर्घटना के बाद घायलों को “गोल्डन ऑवर” में उचित इलाज मिल जाए तो करीब 50 हजार जिंदगियां हर साल बचाई जा सकती हैं। यह बयान न केवल व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि समस्या केवल दुर्घटना की नहीं, बल्कि आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र की भी है।

   सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि सड़क हादसों में मरने वालों में 66 प्रतिशत युवा होते हैं, जिनकी उम्र 18 से 34 वर्ष के बीच है। यानी देश की उत्पादक और ऊर्जावान आबादी का बड़ा हिस्सा हर साल असमय काल के गाल में समा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार 5 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लिए सड़क दुर्घटनाएं मृत्यु का सबसे बड़ा कारण हैं। दुनिया भर में होने वाली सड़क मौतों का 92 प्रतिशत हिस्सा कम और मध्यम आय वाले देशों में है। भारत भी इसी श्रेणी में आता है, जहां वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है लेकिन सुरक्षा संस्कृति उतनी विकसित नहीं हो पाई।

    भारत का सड़क नेटवर्क लगभग 66.71 लाख किलोमीटर लंबा है, जो दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है। यात्री और माल परिवहन का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा सड़कों के माध्यम से होता है। ऐसे में सड़क सुरक्षा केवल परिवहन का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानवीय प्रश्न बन चुका है।

   राज्यों की स्थिति भी कम भयावह नहीं है। आबादी के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में वर्ष 2025 में 27,205 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.8 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि राज्य के उस लक्ष्य को झटका देती है, जिसमें 2030 तक सड़क मौतों को आधा करने की बात कही गई थी। राज्य के परिवहन मंत्री दया शंकर सिंह ने भी माना कि यह चिंता का विषय है और बहु-विषयक दृष्टिकोण से काम करने की आवश्यकता है।

   राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो सड़क दुर्घटनाओं में मौत के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्य शीर्ष पर हैं। तेज रफ्तार, लापरवाही और नियमों की अनदेखी प्रमुख कारण हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल में पैदल यात्रियों की मौतें अधिक होती हैं, जबकि गोवा, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में दोपहिया वाहन चालकों की मौतें ज्यादा दर्ज की गई हैं।

  छत्तीसगढ़ जैसे अपेक्षाकृत कम आबादी वाले राज्य में भी स्थिति गंभीर है। वर्ष 2023 से 15 नवंबर 2025 तक 41,829 दुर्घटनाओं में 19,066 लोगों की मौत हुई।राज्य के परिवहन मंत्री केदार कश्यप ने दो दिन पूर्व विधानसभा में बताया कि केवल पिछले वर्ष ही 6,898 लोगों ने सड़क हादसों में जान गंवाई। केन्द्र सरकार ने रायपुर जिले को ‘जीरो फेटेलिटी डिस्ट्रिक्ट’ योजना में शामिल किया है, जिसका उद्देश्य मृत्यु दर को शून्य तक लाना है। साथ ही प्रधानमंत्री राहत योजना के तहत दुर्घटना के बाद सात दिनों तक के इलाज का डेढ़ लाख रुपये तक खर्च सरकार वहन कर रही है। यह पहल स्वागतयोग्य है, परंतु सवाल यह है कि क्या रोकथाम के उपाय उतनी ही गंभीरता से लागू हो रहे हैं?

    राज्य सरकारे सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए किस तरह काम करती है उसका अंदाजा सत्तारूढ़  भाजपा के वरिष्ठ सदस्य अजय चन्द्राकर के आरोपों से लगाया जा सकता है।उन्होने कहा कि विधानसभा में नियम 139 के तहत अतिविलंबनीय लोक महत्व के विषय  पर चर्चा में पिछले वर्ष सरकार में सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जो आश्वासन दिए थे वह पूरे नही हुए।उन्होने कहा कि सभी चिन्हित ब्लैक स्पाट अभी तक खत्म करने के लिए कदम नही हुए उठाए गए।श्री चन्द्राकर ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ में दुर्घटनाओं को रोकने के लिए रणनीति केवल कागजी है।लोगो के जीवन से बढ़कर भी क्या कोई चीज अहम हो सकती है। 

   भूतल परिवहन मंत्रालय के अध्ययन के अनुसार 61.4 प्रतिशत मौतें तेज रफ्तार के कारण होती हैं। खतरनाक ओवरटेकिंग और लापरवाही से 23.7 प्रतिशत मौतें होती हैं। नशे में वाहन चलाने, खराब मौसम और जानवरों के अचानक सड़क पार करने जैसे कारण भी दुर्घटनाओं को बढ़ाते हैं। स्पष्ट है कि समस्या केवल सड़क निर्माण की नहीं, बल्कि मानव व्यवहार की भी है।

   संयुक्त राष्ट्र महासचिव के सड़क सुरक्षा विशेष दूत ज्याँ टॉड ने हाल ही में भारत में वैश्विक जागरूकता अभियान का भारतीय संस्करण शुरू करते हुए सड़क दुर्घटनाओं को “मौन महामारी” बताया। उन्होंने कहा कि 2030 तक सड़क मौतों और चोटों को आधा करने का लक्ष्य तभी संभव है जब सरकारें, संस्थाएं और नागरिक मिलकर काम करें।

   भारत सरकार ने भी 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में 50 प्रतिशत कमी का लक्ष्य रखा है। नितिन गडकरी का मानना है कि कई हादसे गलत सड़क डिजाइन, कमजोर निर्माण और त्रुटिपूर्ण विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (क्च्त्) के कारण होते हैं। उन्होंने स्पेन, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड जैसे देशों के अनुभवों से सीख लेने की बात कही है। यह सही है कि बेहतर इंजीनियरिंग, वैज्ञानिक डिजाइन और उच्च गुणवत्ता वाले निर्माण से दुर्घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।

   लेकिन केवल इंजीनियरिंग सुधार पर्याप्त नहीं होंगे। सड़क सुरक्षा के चार स्तंभकृइंजीनियरिंग, प्रवर्तन, शिक्षा और आपातकालीन चिकित्सा समान रूप से मजबूत होने चाहिए। हेलमेट और सीट बेल्ट का अनिवार्य उपयोग, ओवरस्पीडिंग पर कठोर दंड, शराब पीकर वाहन चलाने पर सख्त कार्रवाई और ड्राइविंग लाइसेंस प्रक्रिया में पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है।साथ ही, स्कूल स्तर से सड़क सुरक्षा शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। जब तक ट्रैफिक नियमों का पालन सामाजिक संस्कृति का हिस्सा नहीं बनेगा, तब तक कानून का डर स्थायी समाधान नहीं दे पाएगा।

   सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत को ळक्च् का लगभग 3 प्रतिशत तक नुकसान होता है। यह केवल आर्थिक हानि नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन भी है। एक कमाऊ सदस्य की मृत्यु पूरे परिवार को गरीबी और असुरक्षा की ओर धकेल देती है।विकास का अर्थ केवल चैड़ी सड़कों और तेज रफ्तार गाड़ियों से नहीं है। यदि विकास की इस रफ्तार की कीमत हर साल लाखों जिंदगियों से चुकानी पड़े, तो यह मॉडल पुनर्विचार की मांग करता है। सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता बनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है।

    विशेषज्ञों का मानना हैं कि जब तक सरकार, प्रशासन, इंजीनियर, पुलिस, स्वास्थ्य तंत्र और आम नागरिक अपनी-अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से नहीं निभाएंगे, तब तक “मौन महामारी” का यह सिलसिला जारी रहेगा। सड़कें जीवन को जोड़ने का माध्यम हैं, उन्हें जीवन छीनने का कारण नहीं बनने देना चाहिए।

सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।