गोरखपुर का औरंगाबाद बना टेराकोटा का ग्लोबल हब

(सन्तोष यादव)
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले का छोटा सा औरंगाबाद गांव आज अपनी पारंपरिक माटी कला के दम पर देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। यहां की गलियों में अब सिर्फ मिट्टी के बर्तन नहीं बनते, बल्कि हर आकार में सपने, हुनर और आत्मनिर्भरता की नई कहानियां गढ़ी जाती हैं।
कभी साधारण कुम्हारी तक सीमित यह गांव आज टेराकोटा उत्पादों का प्रमुख केंद्र बन गया है। यहां तैयार होने वाले हाथी-घोड़े, झूमर, लालटेन, दरवान की मूर्तियां, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं, खिलौने, गमले, दीये और आकर्षक वॉल हैंगिंग जैसे उत्पाद देश के बड़े शहरों—दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद—के साथ-साथ विदेशों तक अपनी पहचान बना रहे हैं। इनकी कीमत 50 रुपये से लेकर 15 हजार रुपये तक होती है, जिससे हर वर्ग के ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार खरीदारी कर सकता है।
गांव में वर्ष 2001–02 में स्थापित टेराकोटा भवन आज कारीगरों की रचनात्मक गतिविधियों का मुख्य केंद्र है। यहां पारंपरिक कला और आधुनिक डिजाइन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यही वह जगह है जहां स्थानीय कारीगर अपनी कला को नया रूप देते हुए बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं।
लगभग सौ से अधिक परिवारों वाले इस गांव में यादव, निषाद, ब्राह्मण और विशेष रूप से प्रजापति समाज के लोग इस कला से जुड़े हुए हैं। लालचंद्र, अर्जुन, गुड्डू, उर्मिला प्रजापति और हीरालाल जैसे कारीगरों का कहना है कि सालभर काम चलता है, लेकिन दीपावली के दौरान मांग कई गुना बढ़ जाती है, जिससे उनकी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
इस पारंपरिक कला को नई पहचान देने में माटी कला बोर्ड की भूमिका बेहद अहम रही है। बोर्ड द्वारा कारीगरों को आधुनिक तकनीक और डिजाइन की नियमित ट्रेनिंग दी जा रही है। साथ ही ऋण और अनुदान के जरिए आर्थिक सहयोग भी उपलब्ध कराया जा रहा है।
सरकार की पहल से कारीगरों को इलेक्ट्रिक चाक, आधुनिक भट्टी और अन्य जरूरी उपकरण भी मिले हैं, जिससे उनके काम की गति और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है। इतना ही नहीं, उन्हें मेलों, प्रदर्शनियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़कर उनके उत्पादों को व्यापक बाजार भी उपलब्ध कराया जा रहा है।
उत्तरप्रदेश में प्रतिनियुक्ति पर आए बिहार सरकार में राजस्व अधिकारी बद्री प्रसाद गुप्ता के आमंत्रण पर इस गांव पहुंचकर मैंने देखा कि गोरखपुर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित यह औरंगाबाद गांव आज सिर्फ एक कला का केंद्र नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की आजीविका का मजबूत आधार बन चुका है। यहां की मिट्टी अब केवल बर्तन नहीं गढ़ती, बल्कि रोजगार, सम्मान और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही है।




