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नेपाल में जलप्रलय: 165 मौतें, सैकड़ों लापता; 133 भारतीयों से संपर्क टूटा

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काठमांडू, 27 अगस्त। नेपाल-तिब्बत सीमा पर बुधवार को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्र में भारी तबाही मचा दी है। पानी, मलबे और चट्टानों के तेज बहाव ने बस्तियों, सड़कों, पुलों और पनबिजली परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले लिया।

      नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में मृतकों की संख्या अब कम-से-कम 165 तक पहुंच गई है, जबकि एक हजार से अधिक लोगों के लापता होने की खबर है। बचाव दल मलबे में दबे लोगों और लापता यात्रियों की तलाश में जुटे हैं।

      नेपाल पुलिस ने शुरुआती तौर पर 157 शव बरामद किए थे। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी तीन मौतों की पुष्टि हुई थी। हालांकि, गुरुवार को सामने आए नए अपडेट में नेपाल में मृतकों की संख्या बढ़ने की बात सामने आई है। भारी मलबे, क्षतिग्रस्त सड़कों और लगातार बने हुए जोखिम के कारण राहत एवं बचाव अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

      यह आपदा मुख्य रूप से भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के आसपास के इलाकों में तबाही लेकर आई। नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और आसपास के जिलों में कई गांव और संपर्क मार्ग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पुलों के बह जाने और सड़कों के क्षतिग्रस्त होने से कई इलाकों का संपर्क टूट गया है। कई पनबिजली परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचा है।

ग्लेशियर धंसने से आया विनाशकारी सैलाब

     शुरुआत में इस प्राकृतिक आपदा के पीछे भूकंप को संभावित कारण माना जा रहा था, लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के विश्लेषण में वास्तविक भूकंप के बजाय ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने और उसके बाद मलबे के नदी में गिरने को प्रमुख कारण बताया गया है। इससे नदी में अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा पहुंचा और कुछ ही समय में विनाशकारी बाढ़ की स्थिति बन गई।

      विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और अस्थिर होने से इस तरह की घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। मौजूदा आपदा में भी ग्लेशियर से जुड़े मलबे के अचानक नदी में गिरने के बाद पानी और चट्टानों का सैलाब नीचे की ओर तेजी से बढ़ा। इससे लोगों को संभलने तक का पर्याप्त समय नहीं मिला।

भारतीय नागरिक भी बड़ी संख्या में लापता

       नेपाल में लापता लोगों में बड़ी संख्या विदेशी यात्रियों की है। नेपाल के पर्यटन अधिकारियों की सूचियों में भारत के करीब 130 से 133 नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की बताई जा रही है जो कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तिब्बत की ओर जा रहे थे।

      लापता भारतीयों के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, मलेशिया, दक्षिण कोरिया और जापान सहित कई देशों के नागरिक भी प्रभावित हुए हैं। कई विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री बाढ़ की चपेट में आए इलाकों में मौजूद थे। नेपाल और संबंधित देशों के दूतावास अपने नागरिकों की जानकारी जुटाने और स्थानीय प्रशासन के साथ संपर्क में हैं।

भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ

      नेपाल में आई इस भीषण आपदा के बाद भारत ने तत्काल राहत एवं बचाव सहायता उपलब्ध कराने की पहल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बात कर आपदा में हुई जनहानि पर संवेदना जताई और हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। भारत और नेपाल की एजेंसियां राहत तथा बचाव कार्यों में समन्वय कर रही हैं।

      भारत ने नेपाल के लिए 10 टन मानवीय सहायता और आवश्यक दवाओं की पहली खेप भेजी है। भारतीय वायुसेना के माध्यम से राहत सामग्री काठमांडू पहुंचाई गई है, ताकि नेपाल सरकार को आपातकालीन राहत कार्यों में सहायता मिल सके।

     भारत ने अपने नागरिकों को लेकर भी सक्रियता बढ़ा दी है। विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास नेपाल सरकार के साथ लगातार संपर्क में हैं और लापता भारतीय नागरिकों का पता लगाने तथा उन्हें सुरक्षित निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं।

बिहार और उत्तर प्रदेश में भी सतर्कता

     नेपाल में बाढ़ की स्थिति को देखते हुए भारत के सीमावर्ती राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश में भी प्रशासन को सतर्क किया गया है। केंद्र सरकार ने स्थिति पर नजर रखने के साथ संभावित प्रभाव वाले इलाकों में स्थानीय प्रशासन, बचाव दल और एनडीआरएफ को हाई अलर्ट पर रखा है।

      फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती दुर्गम पहाड़ी इलाकों तक पहुंचना और मलबे में दबे या बाढ़ के बहाव में फंसे लोगों को तलाशना है। कई स्थानों पर संचार और सड़क संपर्क बाधित होने से राहत कार्य प्रभावित हो रहे हैं। नेपाल और चीन दोनों ओर बचाव दल हेलीकॉप्टरों और अन्य संसाधनों की मदद से अभियान चला रहे हैं।