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दो हजार से अधिक के UPI भुगतान पर MDR शुल्क को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

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नई दिल्ली, 16 सितंबर। ₹2,000 से अधिक के यूपीआई भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि नई शुल्क व्यवस्था पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपायों, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लागू की गई है।

याचिका में केंद्र सरकार की 14 सितंबर की अधिसूचना तथा 15 सितंबर को घोषित नई एमडीआर व्यवस्था को चुनौती दी गई है। प्रस्तावित व्यवस्था 15 अक्टूबर से लागू होनी है। इसके तहत व्यक्ति से व्यापारी (P2M) को किए जाने वाले ₹2,000 से अधिक के सामान्य यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाए जाने का प्रावधान है। वहीं, ₹2,000 तक के यूपीआई भुगतान पर कोई MDR नहीं लगेगा। इस शुल्क का भुगतान व्यापारियों को करना होगा।

याचिका के मुताबिक, ₹75,000 या उससे अधिक के लेनदेन के लिए MDR की अधिकतम सीमा ₹300 निर्धारित की गई है। याचिकाकर्ता ने शुल्क की दर, लेनदेन की सीमा, अधिकतम शुल्क तथा विभिन्न क्षेत्रों के लिए किए गए वर्गीकरण को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम पर भी सवाल

जनहित याचिका में भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रावधान कार्यपालिका को पर्याप्त स्पष्ट दिशानिर्देशों के बिना यह तय करने का अधिकार देता है कि कौन-से इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यम शुल्क मुक्त रहेंगे।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि नई शुल्क व्यवस्था की घोषणा प्रेस बयान के माध्यम से की गई और शुल्क निर्धारित करने वाला पूरा आदेश आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने इसे पारदर्शिता और वैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है।

छोटे कारोबारियों पर असर की आशंका

याचिका में आशंका जताई गई है कि 0.4 प्रतिशत MDR लागू होने से कम मार्जिन पर कारोबार करने वाले व्यापारियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। साथ ही, शुल्क का अप्रत्यक्ष प्रभाव उपभोक्ताओं पर पड़ने और डिजिटल भुगतान के इस्तेमाल में कमी आने की आशंका भी व्यक्त की गई है।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से ₹2,000 से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर MDR लागू करने वाली व्यवस्था को रद्द करने या उसके क्रियान्वयन पर रोक लगाने का अनुरोध किया है।

वैकल्पिक रूप से याचिका में मांग की गई है कि सरकार नई व्यवस्था पर पारदर्शी सार्वजनिक परामर्श करे, संबंधित आंकड़े सार्वजनिक करे और इसके संभावित प्रभाव का आकलन कराए। इसके साथ ही सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय किए जाने की मांग की गई है।

याचिका में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार से इस पूरी व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा कराने का भी आग्रह किया गया है।