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“हाशिए से वापसी की आहट: क्या बदल रही है वरुण गांधी की सियासत?”-अशोक कुमार साहू

भाजपा में लंबे समय से हाशिए पर चल रहे पूर्व सांसद वरूण गांधी की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हालिया मुलाकात केवल औपचारिक शिष्टाचार थी या इसके पीछे कोई गहरे राजनीतिक संकेत छिपे हैं,यह सवाल राजनीतिक गलियारों में प्रमुख चर्चा का विषय बन गया है। इस मुलाकात ने न सिर्फ उनके व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलों को हवा दी है, बल्कि गांधी परिवार के संभावित पुनर्मिलन की चर्चाओं पर भी फिलहाल विराम लगा दिया है।

    मुलाकात के बाद वरुण गांधी द्वारा सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा की गई भावनात्मक प्रतिक्रिया विशेष ध्यान खींचती है। प्रधानमंत्री के प्रति “पितृवत स्नेह और संरक्षण” जैसे शब्दों का प्रयोग केवल औपचारिक कूटनीति नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे एक प्रकार के राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। भारतीय राजनीति में शब्दों और संकेतों की अपनी अलग भाषा होती है, और इस मुलाकात ने उसी भाषा में कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

    दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में वरुण गांधी भाजपा के भीतर एक ‘अलग स्वर’ के रूप में उभरे थे। किसान आंदोलन, बेरोजगारी, अग्निवीर योजना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर उन्होंने खुलकर अपनी ही सरकार की आलोचना की। यह रुख उन्हें आम जनता के एक वर्ग के करीब तो ले गया, लेकिन पार्टी नेतृत्व के साथ उनके संबंधों में दूरी भी बढ़ाता गया। यही कारण रहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उनका टिकट काट दिया गया।पार्टी का एक ऐसा निर्णय जिसने उनके राजनीतिक भविष्य को अनिश्चितता के घेरे में ला खड़ा किया।

    वरुण गांधी का राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा है। वर्ष 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा से जुड़ने वाले वरुण ने बहुत कम उम्र में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। शुरुआती दौर में वे एक आक्रामक हिंदुत्ववादी छवि के साथ उभरे और 2009 में पीलीभीत से पहली बार सांसद बने। हालांकि, 2016 के बाद उनके राजनीतिक विचारों में एक उल्लेखनीय बदलाव आया और उन्होंने खुद को किसानों, युवाओं और ग्रामीण भारत के मुद्दों से जोड़ना शुरू किया। उनकी पुस्तक ‘रूरल मेनिफेस्टो’ इसी सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें उन्होंने कृषि संकट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया।

   इस बीच उनकी मां मेनका गांधी की राजनीति भी उल्लेखनीय रही।वह 2014 में मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री थी,लेकिन 2019 में सुलतानपुर से सांसद चुने जाने के बाद उन्हे मंत्रिमंडल में जगह नही मिली।सुलतानपुर से सांसद रहते हुए उन्होंने क्षेत्रीय विकास पर निरंतर ध्यान केंद्रित किया और पार्टी के केन्द्रीय एवं राज्य नेतृत्व के सीमित राजनीतिक समर्थन के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी कार्य कराए। लेकिन वरुण गांधी के साथ पार्टी नेतृत्व की बढ़ती दूरी का असर मेनका गांधी पर भी पड़ा। उन्हें राष्ट्रीय कार्यसमिति से बाहर किया गया और 2024 में उन्हें भी चुनावी पराजय का सामना करना पड़ा।

   भाजपा में उपेक्षा के चलते वरुण गांधी की कांग्रेस से संभावित नजदीकियों की चर्चाएं भी तेज हो गई थीं। उनके गांधी परिवार से रिश्ते और खासकर प्रियंका गांधी के साथ उनके अच्छे संबंधों को देखते हुए यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि वे कांग्रेस का रुख कर सकते हैं। हालांकि,राहुल गांधी ने पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान ही स्पष्ट किया था कि व्यक्तिगत संबंध अपनी जगह हैं, लेकिन विचारधारात्मक स्तर पर उनके बीच गहरी दूरी है। यही कारण है कि इन संभावनाओं को कभी ठोस आधार नहीं मिल पाया।

   साथ ही, सोनिया गांधी के रुख को लेकर भी यह माना जाता रहा है कि वे वरुण और मेनका के कांग्रेस में प्रवेश को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थीं। इसके पीछे पार्टी के भीतर संभावित शक्ति संतुलन और नेतृत्व को लेकर भविष्य की चुनौतियों की आशंका को एक बड़ा कारण माना जाता है।

   इन सभी परिस्थितियों के बीच प्रधानमंत्री मोदी से हुई यह मुलाकात कई मायनों में निर्णायक संकेत देती है। 2024 में टिकट कटने और तमाम अटकलों के बावजूद वरुण गांधी ने भाजपा के खिलाफ कोई खुला मोर्चा नहीं खोला। उनकी यह ‘संयमित चुप्पी’ अब उनके लिए एक राजनीतिक पूंजी के रूप में देखी जा रही है।

   वर्तमान में भाजपा संगठन में भी बदलाव की प्रक्रिया चल रही है और नए नेतृत्व के तहत कार्यकारिणी के पुनर्गठन की संभावनाएं हैं। ऐसे में वरुण गांधी के लिए पार्टी में पुनः सक्रिय भूमिका मिलने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। उनकी वक्तृत्व क्षमता, जनसरोकारों से जुड़ाव और युवाओं के बीच उनकी पकड़ उन्हें एक उपयोगी राजनीतिक चेहरा बना सकती है,यदि पार्टी नेतृत्व उन्हें पुनः अवसर देने का निर्णय लेता है।

    आखिरकार यह मुलाकात केवल एक व्यक्तिगत शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि संभावनाओं और संकेतों से भरी एक सियासी घटना है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह मुलाकात वरुण गांधी के राजनीतिक पुनरुत्थान की भूमिका बनती है या फिर यह भी भारतीय राजनीति की उन कई घटनाओं में शामिल हो जाएगी, जो चर्चा तो बहुत बटोरती हैं, लेकिन परिणाम सीमित ही देती हैं।

सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।

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