भारतीय राजनीति अब संक्रमण के दौर में नहीं बल्कि पतन के गंभीर दौर में है। संक्रमण का दौर अस्थाई होता है और जिसके अल्पावधि में बदलाव की संभावना होती है। भारतीय राजनीति पिछले कई वर्षों से लगातार पतन की खाई में गहरी धसती जा रही है। जहाँ एक तरफ राजनीति अधोपतन की ओर है वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज भी मानसिक रूप से आमतौर पर मूल्यविहीन और पतनोन्मुख बन रहा है।
एक तो यह दुखद प्रवत्ति उभरी है कि अपवाद छोड़कर बकाया सभी दल परिवारवाद की दिशा में प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ रहे हैं। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी ने जिस परिवारवाद को और परिवार के केंद्रीयकरण को स्थापित किया था वह अब जनमत के दृष्टिकोण से पराजित हो चुका है। यह मिट भी रहा है परंतु उसका स्थान लोकतांत्रिक नेतृत्व के बजाय परिवार जनित नेतृत्व ही ले रहा है। जम्मू कश्मीर में दो परिवारों के बीच मुकाबला रहता है। एक पीडीपी है और दूसरी नेशनल कांफ्रेंस याने एक मरहूम मुफ्ती मोहम्मद सईद का परिवार दूसरा मरहूम शेख अब्दुल्ला का परिवार। कांग्रेस पार्टी का नेतृत्य भी ऐसे ही परिवारों से है हालांकि कांग्रेस अब वहाँ फारूक अब्दुल्ला की पिछलग्गू पार्टी है इसलिए उसके नेतृत्व की कोई विशेष चर्चा नहीं है। पंजाब में भी प्रकाश सिंह बादल का परिवार है मुकाबले में पहले अमरिंदर सिंह का परिवार था अब दूसरे नए परिवार उभर रहे है। कुछ परिवार तो इतिहास के गर्त में समा चुके है। इसके बावजूद भी अभी उनकी असीम इच्छाएं अंदर अंदर धधक रही है। हरियाणा में भी हुड़ा परिवार, चैधरी देवीलाल का परिवार, दिल्ली में शीला दीक्षित, सुषमा स्वराज और साहिब सिंह वर्मा का परिवार है। याने मुकाबले में कम से कम राज्यों में तो कांग्रेस और भाजपा तथा अन्य दलों के भी परिवारों के बीच ही मुकाबला है। उत्तर प्रदेश में भी मुलायम सिंह परिवार और मायावती परिवार है और कांग्रेस तो खंडहर परिवारों का समुच्य है। यही स्थिति तमिलनाडू, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की भी है। बंगाल में अभी चुनावी दृष्टिकोण से मुकाबला ममता और कांग्रेस के परिवार में है। ममता का परिवार भी यद्यपि अभी तक प्रत्यक्ष सत्ता में नहीं पहुँचा है परंतु पहुचने के मार्ग में है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की दो योग्यताएं लोगों में चर्चित हैं, एक तो ये कि उनका कोई परिवार नहीं है और दूसरा कि वे पिछड़ी जाति के हैं। यह देश के पिछड़ी जातियों को लुभाता है और परिवार विरोधी मानसिकता को भाजपा के पक्ष में तर्क को बल देता है। हालांकि इसे भी अर्धसत्य माना जाना चाहिए क्योकि एक तो प्रधानमंत्री का एक वैकल्पिक परिवार है, जो संस्था व सरकार को स्थाई नियंत्रित करता है और दूसरा प्रधानमंत्री का पिछड़ी जाति में जन्म लेना संघ और भाजपा की स्थापित सामाजिक शक्तियों को इस अर्थ में फायदेमंद है कि देश में पिछड़ी जातियों का महत्व मोदी के पक्ष में डालने के लिए लुभाता है। हालांकि श्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक के बारह वर्षों में पिछड़ी जातियों के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है। यहाँ तक कि रोहिणी आयोग की रिपोर्ट भी वे लागू करना तो दूर उसका सार्वजनिक प्रेक्षण भी नहीं कर पाए है। दरअसल, श्री नरेंद्र मोदी सवर्णवादी शक्तियों के लिए पिछड़ी जातियों को फासने के लिए गारे या दाने के समान है जो केवल फंसाने के काम आता है। भाजपा ने राज्य के स्तर पर परिवार वाद को नया स्वरूप दिया है और संघ के पुराने निष्ठावान स्वयंसेवकों के परिवारजनों को योजनाबद्ध ढंग से आगे बढ़ाया है। क्या ये परिवारवाद नहीं है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के पिता संघ और जनसंघ के जुड़े थे और नागपुर से पार्षद चुने गए थे। इसलिये मुख्यमंत्री बने। इसी प्रकार राजस्थान में विजयाराजे सिंधिया का परिवार है याने श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया हैं, कांग्रेस के श्री अशोक गहलोत का परिवार है और ऐसे ही कितने ही छोटे बड़े परिवार है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष श्री जे पी नड्डा, जबलपुर के संघ के प्रचारक स्वर्गीय बनर्जी और श्रीमती जयश्री बनर्जी के दामाद हैं। अब बिहार के श्री नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है उनके पिता जी भी संघ और जनसंघ के थे और उन्हें पुरस्कृत किये जाने के पीछे एक कारण ये भी है। बिहार में तो आरजेडी के नेता लालू प्रसाद का पूरा परिवार है। भाजपा के उपमुख्यमंत्री सम्राट चैधरी शकुनि चैधरी के बेटे हैं और अब श्री नीतीश कुमार के सुपुत्र निशांत कुमार जदयू के नेता हैं। कुल मिलाकर देश की स्थिति ये ही है कि लोकतंत्र का नया सामन्तीकरण हो रहा है और वह परिवारों में सिमट रहा है।
दूसरी दुखद घटना यह है कि उम्मीद थी कि आजादी के बाद लोकतांत्रिक मानस का विस्तार होगा, लोकतंत्र परिपक्व होगा और चुनाव की प्रक्रिया से नया और काबिल नेतृत्व सामने आएगा परंतु यह उम्मीद भी धूमिल हुई है। भारतीय लोकतंत्र आज धनतंत्र, सत्तातंत्र, शक्तितंत्र और जाति तंत्र का बंदी बन गया है। हाल ही की एडीआर रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग की जानकारी प्रकाशित हुई, जिसके अनुसार पिछले वर्ष भारतीय जानता पार्टी को 6600 करोड़ का चंदा मिला है और कांग्रेस पार्टी जो देश के केंद्रीय रंगमंच से पिछले बारह साल से बाहर है और कई राज्यों में सत्ता से बाहर है को लगभग 450 करोड़ रुपया का चंदा मिला है और ऐसी ही अन्य दलों की स्थिति है। उद्योगपति चुनाव के लिए चंदा नहीं देते है बल्कि वे राजनीति में पूंजी निवेश करते है। याने पैसे से जन्मी राजसत्ता और राजसभा से पोषित पूँजीपतियों का एक गठजोड़ बन गया है। इसकी चक्की में देश पिस रहा है और सभी संवैधानिक संस्थाओं की साख संदिग्ध है। चाहे वह न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो, विधान पालिका हो या फिर चुनाव आयोग हो। अनास्था के समुद्र में देश डूब रहा है।
मतदाता ने भी अपने तात्कालिक लाभ को ही राजनीतिक कर्म मान लिया है। जो भी राजनीति की रिश्वत देगा वहाँ वोट पड़ेगा। वह चाहे मुफ्त बिजली, पानी या राशन हो, लाड़ली बहना हो या कुछ और अब मतदाता का विश्वास राजनीति और राजनेताओं पर नहीं रह गया है। वे नेताओं प्रति विश्वास और आस्था खो चुके है इसलिए जो आज मिलना है वही लेकर अपने वोट का इस्तेमाल करते है।
न्यायपालिका की साख भी गिरावट पर है। हालत यह है कि न्यायपालिका के अंदर से भी आरोप उठ रहे हैं और बाहर से भी, न्यायपालिका न्याय करने के बजाए उपदेशक बन गई है।
राजनीति का स्वरूप घात प्रतिघात का हो गया है। दलों ने अपने आंख और कान पर पट्टे बांध लिए है। वे उतना ही देखते हैं जो उन्हें अपने राजनैतिक आरोप के लिए देखना जरूरी है। पिछले पंद्रह दिनों से दुनिया विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही है और युद्ध का फैलाव हो रहा है। इसका असर दुनिया के सभी देशों पर पड़ना स्वाभाविक है चाहे वे शक्तिशाली हो, अमीर हो या गरीब हो। भारत में भी इस युद्ध के प्रभाव से तेल, ईंधन और गैस का संकट आया है, जो स्वाभाविक है। देश के कोने-कोने में गैस के लिए लाइनें लगी हैं। देश के गैस पेट्रोलियम के ऊपर अघोषित रोक लगा दी गई है। होटल और रेस्तरा को गैस सिलिंडर नहीं दी जा रही परंतु सरकार कह रही है कि कोई समस्या नहीं है। दूसरी तरफ प्रतिपक्ष इस संकट के लिए प्रधानमंत्री और सरकार को जिम्मेदार बता रहा है। हालांकि इसमें सरकार की कोई बड़ी भूमिका नहीं है जब दुनिया में युद्ध होता है तब उसका असर दुनिया पर पड़ता ही है। कुल मिलाकर झूठ का व्यवहार है, सत्ता पक्ष का भी और प्रतिपक्ष का भी। देश की जीडीपी बढ़ी है परंतु प्रति व्यक्ति आय में हम बहुत पीछे है। यहाँ तक कि औसत आय में हम पाकिस्तान से भी पीछे है। विकास के नाम पर जो योजनाएं या नीतियाँ बनाई जा रही है वो देश को भविष्य में विनाश की ओर ले जाने वाली है। इस विकास से हवा, पानी और खाद्यान में जहर घुल रहा है और जीवन मूल्य समाप्त हो रहे हैं। संग्रह और भोग की अपार इछाएं तैयार की जा रही हैं। 60-70 वर्ष के वृद्ध लोग विवाह की वर्ष गाँठ मना रहे हैं और सारी उन कामों की पुनरावृत्ति कर रहे हैं जो उन्होंने जवानी में किये थे। विवाह के दिखावे के नाम पर डेस्टिनेशन वेडिंग, प्री डेस्टिनेशन वेडिंग फिर वेडिंग ये तीन-तीन शादियां एक ही व्यक्ति की हो रही है। ऐसा लागता कि सारा समाज इस भोग की खाई में गहरा धंस रहा है। देश में बाहर के खतरे हैं, भीतर की कमजोरियां हैं। अब देश को कैसे बचाया जाए, यह चिंता का विषय है?
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।




