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अमेठी में राहुल को पहली बार मिल रही हैं सबसे कड़ी चुनौती – राज खन्ना

राज खन्ना

मोदी बनारस में इत्मिनान से।पर अमेठी राहुल को बेफ़िक्र नही होने दे रही। बनारस के भरोसे ने मोदी को बड़ोदरा की जरूरत महसूस नही होने दी। उधर ‘ परिवार की अमेठी ‘ ने राहुल को वायनाड से भी जुड़ने को मजबूर कर दिया।

2019 की अमेठी अब तक की सबसे कठिन लड़ाई की चश्मदीद है। पहली बार अनेक सूबों के अलग जातियों-समूहों के कांग्रेसियों पर ,” अपने नेता ” के लिए अमेठी में वोट जुटाने की जिम्मेदारी आई है। अब तक नामांकन और फिर मतदान के बीच गांधी परिवार का एकाध दौरा अमेठी के लिए पर्याप्त होता था। गुजरे चार चुनावों से प्रियंका की वहां मौजूदगी बहुत थी। इस बार अकेले उन्हें काफी नही माना जा रहा।  बाहर के कांग्रेसियों के लिए अमेठी प्रवेश की मंजूरी की शर्त हटाई जा चुकी है।  एक कांग्रेसी नेता हंसते हुए कहते हैं , ”  इस बार अमेठी के लिए पासपोर्ट-बीजा ” की जरूरत नही। अमेठी गांधी परिवार के नाम से जानी-पहचानी जाती है। इस पहचान के आगे जाति-मजहब सब बौने थे। 2019 का बदलाव देखिये।  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और गुजरात के हार्दिक पटेल अमेठी के कुर्मियों को साधने में लगे हैं। अन्य पिछड़ों को संजोने के लिए अनिल सैनी और उनके साथी गांव-गांव दस्तक दे रहे हैं। अरसे से राजनीतिक परिदृश्य से ओझल कैप्टन सतीश शर्मा ब्राह्मण समूहों के बीच ले जाये जा रहे हैं। साथ में वह बांटने को क्या लाये इसकी जांच के लिए देर रात अधिकारी-पुलिस संजय गांधी अस्पताल के गेस्ट हाउस  धमक गए। हालांकि वहां कुछ नही मिला।  छत्तीसगढ़ के रवींद्र चौबे , पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी, उनकी विधायक पुत्री आराधना मिश्रा पहले से ब्राह्मण बहुल इलाकों में सक्रिय हैं। ठाकुरों के लिए महाराष्ट्र से पूर्व मंत्री कृपा शंकर सिंह आये हैं। गुलाम नवी आजाद, इमरान प्रतापगढ़ी, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नामों की एक लंबी सूची है, जो राहुल की जीत पक्की करने की कोशिश में लगे या अभी अमेठी के गांव-गांव घर-घर घूम रहे हैं।

एक और मोर्चे पर गांधी परिवार को पहली बार अमेठी में जूझना पड़ रहा।  पहला मौका है, जब प्रतिद्वन्दी के साथ सत्ता का भी बल है और ये सत्ता पूरी ताकत से उनका रास्ता रोकने में लगी है। खिलाफ़ उन अस्त्रों का इस्तेमाल हो रहा है, जो अब तक उनकी पूंजी थे । प्रियंका प्रतिद्वन्दी खेमे की पैसा बांटने की शिकायत कर रही हैं। उन प्रधानों की पीठ थपथपा रही जिन्होंने, उनके मुताबिक पैसा वापस कर दिया। राहुल “अमेठी के अपने परिवार” को भावुक चिट्ठी लिख रिश्तों की याद दिला रहे। वह भी पैसा पानी की तरह बहने की शिकायत कर रहे हैं। अमेठी इस ” चुनावी पैसे ” से पहली बार परिचित नही हो रही हैं। हाँ ! पहली बार ” विरोधी खेमे”  के पैसे का शोर है। अमेठी में , “सत्ता का खेल ” भी नया नही है। जब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही , उसका अमेठी ने हर रुप देखा। इन पंक्तियों के लेखक ने पत्रकार के रूप में अमेठी के 1977 से लगातार चुनाव कवर किये हैं।  ” बूथ कैप्चरिंग ” का अमेठी से पहला परिचय 1977 में यहीं के पीपरपुर से हुआ था। फिर भी संजय गांधी हार गए थे। इस हार की सीख में 1980 में संभल कर चुनाव लड़ा गया था। पर 1981 में राजीव गांधी के पहले चुनाव में रिकार्ड बनाने की होड़ थी। मतदान के दिन क्या-क्या हुआ, ये सुल्तानपुर कलेक्ट्रेट में गिनती के बक्से खुलने पर पता चला। बिना मुड़े। बैलेट पेपर की गड्डियां। मुकाबले में लड़ रहे शरद यादव और उनके ग्रीन ब्रिगेड के चंद नवजवानों ने छावनी में बदले गणना स्थल पर जबरदस्त नारेबाजी कर आसमान सिर पर उठा लिया। शरद तेजी से तबके कलेक्टर पुलक चटर्जी के चश्मे की ओर लपके थे। चटर्जी ने मुस्कुराते हुए अपना चश्मा उनकी ओर बढ़ा दिया था। वफ़ादार आई ए एस चटर्जी ने अपनी बाकी नौकरी गांधी परिवार के इर्द-गिर्द ही बिताई। 1984 में विपक्षी खेमे में पहुंची मेनका गांधी अमेठी के एक से दूसरे मतदान केंद्र पर दौड़ती रही थीं। कही सुनवाई नही। जहां सीधे टकराने की कोशिश वहां बदसलूकी। गिनती में जिसने आवाज उठाई। टांग कर बाहर हुआ। और इसी सत्ता संरक्षण में 1989 में अहिंसा के पुजारी बापू के पौत्र राज मोहन गांधी की उम्मीदवारी के वक्त अमेठी में सबसे बड़ी चुनावी हिंसा हुई थी। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ हुए थे। कभी गांधी परिवार के सबसे खास संजय सिंह विपक्षी खेमे में थे। 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने इसी अमेठी से प्रदेश में सबसे बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। पर सत्ता से दूर वह भी बेचारे थे। उन्ही दिनों मुम्बई से अपना एक बड़ा ऑपरेशन करा कर वापस आये थे। चलने में छड़ी का सहारा लेना पड़ रहा था।  दिन भर अमेठी में बूथ लूटे गए थे। समर्थक चिल्लाते रहे। मतदान खत्म होने के घंटा भर पहले संजय सिंह सड़क पर आए। भुसियांवा तिराहे पर उन्हें गोली मारकर घायल कर दिया गया था। लंदन तक इलाज चला। महीनों बाद ठीक हुए। इस चुनाव में राजमोहन गांधी और संजय सिंह दोनों की जमानत जब्त हो गई थी।

राहुल गांधी ने अमेठी के अपने पहले दो चुनाव आसान मुकाबले में जीते थे। 2014 की चुनौती के समय केंद्र में उनकी सत्ता थी। प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी सपा ने उन्हें समर्थन दिया था। सब अनुकूल था। इस बार पैसा पानी की तरह बहाने- बांटने का उनका और प्रियंका का भाजपा पर आरोप है। तब भाजपा इसी का रोना रो रही थी।  आखिरी तीन दिनों ने तब बहुत कुछ बदल डाला था। इस बार की सत्ता की पहले से तैयारी है। प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य, प्रधान, बीडीसी, गांव के मानिंद, आशा बहुएं, आंगनवाड़ी कार्यकर्त्री , स्वयं सहायता समूह , जीते- हारे  की लंबी सूची है।  सब की पूछताछ- मिजाजपुर्सी की कोशिश है। डेरा डाले मंत्री हैं। कस्बों-गांवों और घर-घर दस्तक देते। हर काम के लिए तसल्ली देते। अगले तीन साल प्रदेश की अपनी सरकार की याद दिलाते। कमजोर नसों को दबाते। साधने के लिए जतन करते। अपने रुठों को मनाते तो दूसरों के पाले से खींच लाने के लिए प्रशासनिक पुर्जों का इस्तेमाल करते।    चार चरणों के चुनाव से खाली हुए उत्तर प्रदेश के साथ ही अनेक राज्यो के भाजपा के मंत्री, नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं की पलटन अमेठी में तैनात है। संघ के रणनीतिकार पूरे चुनाव में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। बड़ी बातें मंच से। मुद्दे हवा में। जमीन पर कैसे साथ आओगे उपाय। और ये उपाय हर दल के एक जैसे होते हैं।

2019 के चुनाव के दो बड़े चेहरे हैं। उनमें एक राहुल की प्रतिष्ठा अपने गढ़ में ही दांव पर है। मुकाबले में स्मृति हैं । पर मोदी अनुपस्थित रहकर भी पूरे चुनाव में उपस्थित हैं। हर ओर उनका नाम- काम। 2014 में मोदी ने चुनाव प्रचार के आखिरी वक्त अमेठी में दस्तक दी थी। इस बार चुनाव की घोषणा के ठीक पहले अमेठी को बताने आये कि उनकी प्रत्याशी हार कर भी अमेठी में पांच साल डटी रही। उनके सबसे खास अमित शाह ने अमेठी के प्रचार का समापन रोड शो में बड़े शक्ति प्रदर्शन के साथ किया । बताते हुए , ‘ अमेठी हमार ।’ इस चुनाव में मोदी-राहुल की कटुता चरम पर है। अमेठी के हिसाब- किताब की अकुलाहट में यह कटुता शामिल है। अमेठी में मुकाबला करीब का है और मोदी राहुल को ‘ हर हाल ‘ में अमेठी में हराना चाहते हैं। इसकी तैयारी पांच साल से चल रही  हैं।  अमेठी के साथ वायनाड इस चुनौती की ही देन है। प्रचार थम चुका है।

अगर दूसरा खेमा तैयारी में है, तो राहुल, प्रियंका और कांग्रेस पार्टी भी पीछे नही हैं।वे अमेठी- रायबरेली में डट गए हैं। मुकाबले की पूरी तैयारी और विश्वास के साथ। अमेठी लोकसभा की सिर्फ एक अदद सीट नही है। उसके नतीजे का संदेश दूर तक जाएगा। परीक्षा की घड़ी 6 मई बिल्कुल पास । बीच में एक दिन और दो रातें। इन दो रातों में अमेठी जागेगी। सोने की कोशिश करने वालों को जगा- जगा याद दिलाया जाएगा। साथ लाया जाएगा। कैसे ? कैसे भी !!

 

सम्प्रति- लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते है।