
भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम मनरेगा का नाम बदलकर ‘वीबी–जी राम जी’ कर दिया है। संसद में विपक्षी दलों ने इस नाम बदलने का तीखा विरोध किया और जो होना स्वाभाविक भी था। भाजपा और उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ न केवल 11 वर्षों से बल्कि अगर इतिहास में जाए तो 1930 के बाद से ही महात्मा गांधी को बदनाम करने, उनका अपमान करने व उनके विरुद्ध अन्य प्रकार के झूठ फैलाती रही है और अब पिछले 11 वर्षों में इसमें ज्यादा गति आई है, क्योंकि सरकार का संरक्षण है।
स्व. बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद राजकीय शोक घोषित किए जाने पर एक छात्र ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी की थी और जिस प्रकार उसे गिरफ्तार किया गया था, जिसे बाद में न्यायपालिका ने रिहा करने का आदेश दिया और कार्रवाई पर रोक लगाई, परंतु आज तक देश में महात्मा गांधी के खिलाफ गंदी–गंदी टिप्पणी करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
व्यक्तिगत तौर पर मैं ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई का पक्षधर नहीं हूँ, क्योंकि मैं मानता हूँ कि कार्रवाई या दंड से विचार नहीं मरते। मैं चाहता हूँ कि समाज के लोग आगे आकर ऐसे झूठे आरोपों का प्रतिकार करें, सुनियोजित झूठ फैलाने वालों को तार्किक उत्तर देकर निरुत्तर करें।
बाल ठाकरे की घटना का उल्लेख तो मैंने यह बताने के लिए किया है कि देश में दो प्रकार के कानून चलते हैं। यह भी आश्चर्यजनक है कि संघ–भाजपा के लोग अभी तक ऊपरी तौर पर महात्मा गांधी के प्रति श्रद्धा का भाव प्रकट करते हैं, परंतु उनके ही नीचे के अनुयायी महात्मा गांधी के खिलाफ गंदे शब्दों का प्रयोग करते हैं। ऊपर से नमन और नीचे से दुत्कार की यह संघ की शिक्षा है, इसके बहुत सारे प्रमाण मैं दे सकता हूँ, परंतु अभी वह मेरा विषय नहीं है।
भाजपा के नेताओं और सत्ताधीशों के लिए शब्द कितने अर्थहीन हैं और केवल शब्दों तक सीमित हैं, इसका प्रमाण उस दिन मिला जब संसद में उत्तर देते हुए ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि महात्मा गांधी हमारे दिलों में हैं। यह कितना विचित्र था कि जिनके दिलों में महात्मा गांधी हैं, उनके कागजों से महात्मा गांधी हटाए जा रहे हैं। यह दिल, दिमाग और शब्दों की कागजों से दूरी शोध का विषय है।
मुझे ऐसा लगता है कि महात्मा गांधी के नाम को हटाने के पीछे संघ के तीन उद्देश्य हैं—
1. वे देखना और तौलना चाहते हैं कि महात्मा गांधी का नाम हटाने पर देश में क्या प्रतिक्रिया होती है। अगर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उनका अगला चरण नोटों पर से भी गांधी का चित्र हटाने का हो सकता है। उन्हें वास्तव में गांधी से इतनी घृणा है कि वे गांधी की हर याद को मिटाना चाहते हैं।
2. दरअसल सरकार को मनरेगा के जो मूल प्रावधान थे, उनमें ही परिवर्तन करना था, क्योंकि मनरेगा जैसी योजना उनकी नीति के अनुकूल नहीं है। 2014 से 2019 के बीच उन्होंने मनरेगा का बजट कम किया था। यहाँ तक कि काफी समय तक काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी तक नहीं चुकाई गई।
3. सरकार ने नाम बदलने की रणनीति इसलिए भी अपनाई ताकि विपक्ष गांधी के नाम को लेकर हंगामा करे और मूल प्रावधानों पर चर्चा न हो सके, जिनसे मनरेगा की आत्मा को समाप्त किया जा रहा है।
अच्छा होता कि पहले उन प्रावधानों पर संसद में बहस होती जिनके माध्यम से मनरेगा कानून को निष्प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है। देश की जनता इन तथ्यों को जान पाती।
मैं मानता हूँ कि मनरेगा के उद्देश्यों में कई कमियाँ सामने आई हैं, जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रष्टाचार, पंचायत स्तर पर गड़बड़ियाँ, परंतु यह दोष व्यवस्था का है, कानून का नहीं।
क्या वीबी राम जी के नाम हो जाने से ग्रामीण स्तर पर होने वाला भ्रष्टाचार रुक जाएगा? इसलिए नाम बदलने की अनुपयोगिता स्पष्ट है और यह सरकार की मंशा तथा विपक्ष को उलझाने का षड्यंत्र प्रतीत होता है।
महात्मा गांधी के नाम को हटाना एक प्रकार से देश के राष्ट्रपिता का अपमान है।
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।
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