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चमकते भाव, फीकी खुशियाँ: सोना-चांदी की महंगाई का सामाजिक असर-अशोक कुमार साहू

चार दिनों की अल्पकालिक राहत के बाद देश में सोने और चांदी की कीमतें एक बार फिर बेकाबू हो गई हैं। यह तेजी केवल बाजार के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे सामाजिक और मानवीय परिणाम सामने आने लगे हैं। ग्रामीण भारत में, जहां आभूषण सिर्फ गहना नहीं बल्कि बेटी की सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की गारंटी माने जाते हैं, वहां बढ़ती कीमतों ने लाखों परिवारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। किसान, श्रमिक और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार आज अपनी वर्षों की बचत के बावजूद बेटियों के विवाह के लिए न्यूनतम आभूषण तक जुटा पाने में असमर्थ होते जा रहे हैं। सोना-चांदी की यह महंगाई अब केवल आर्थिक चुनौती नहीं रही, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर सीधा दबाव डालने लगी है।

राजस्थान से राज्यसभा के कांग्रेस सांसद नीरज डांगी ने हाल ही में संसद में सोने-चांदी की कीमतों में असाधारण वृद्धि का मुद्दा उठाते हुए सरकार का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने कहा कि पिछले 13 महीनों में चांदी की कीमतों में लगभग 306 प्रतिशत और सोने की कीमतों में करीब 111 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जिस देश में सोना-चांदी नारी की सुरक्षा, आत्मसम्मान और पारिवारिक भविष्य से जुड़ा हुआ है, वहां इनकी कीमतों को यूं ही बेलगाम छोड़ देना सरकार की विफल आर्थिक नीतियों को उजागर करता है।

श्री डांगी ने यह भी कहा कि एक ओर सरकार महिला सशक्तिकरण की बात करती है, वहीं दूसरी ओर भारी जीएसटी, ऊंचे आयात शुल्क और जमाखोरों पर प्रभावी नियंत्रण न कर महिलाओं की वर्षों की बचत को मूल्यहीन बना रही है। उन्होंने सरकार से मांग की कि देशहित में सोने और चांदी की कीमतों पर हस्तक्षेप किया जाए, जीएसटी की दरों में कटौती की जाए और जमाखोरी रोकने के लिए कठोर कदम उठाए जाएं।

गौरतलब है कि गत शुक्रवार को सोने की कीमत में करीब 12 प्रतिशत, चांदी में 26 प्रतिशत और प्लैटिनम में 18 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी, जिसे आम लोगों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा गया। लेकिन यह राहत महज चार दिन ही टिक सकी। मंगलवार, 3 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में फिर जोरदार उछाल आया। वैश्विक बाजार में हाजिर सोना लगभग 4 प्रतिशत की मजबूती के साथ 4,830 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया, जबकि हाजिर चांदी करीब 8 प्रतिशत की छलांग लगाकर 82.74 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करने लगी।

भारत में भी इसका असर साफ दिखा। एमसीएक्स पर सोना करीब चार प्रतिशत की तेजी के साथ 1,48,950 रुपये प्रति दस ग्राम तक पहुंच गया, वहीं चांदी 6.75 प्रतिशत की तेजी के साथ 2,52,200 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर कारोबार करती दिखी।

सोने और चांदी की कीमतों की यह अस्थिरता अब वैश्विक समस्या बन चुकी है। ऐतिहासिक तेजी के बाद अचानक गिरावट और फिर कुछ ही दिनों में दोबारा तेज़ी यह संकेत देती है कि फिलहाल कीमतों में स्थिरता की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में परंपरागत रूप से ज्वैलर्स शादी-विवाह के लिए अग्रिम राशि लेकर पहले ही आभूषणों की दर तय कर लेते थे। लेकिन मौजूदा अस्थिरता के कारण ज्वैलर्स भी इससे बच रहे हैं, जिससे आम लोगों की परेशानियां और बढ़ गई हैं।

देश में इस समय शादी-विवाह का सीजन चल रहा है। बढ़ती कीमतों ने किसान, श्रमिक और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए न्यूनतम आभूषण खरीदना भी मुश्किल बना दिया है। शहरी इलाकों के बाहर छोटे शहरों और कस्बों में आभूषणों की बिक्री पर इसका साफ असर दिख रहा है। लोग अब कम वजन के आभूषण खरीदने को मजबूर हैं। कई विक्रेताओं ने किस्तों और विशेष योजनाओं की शुरुआत जरूर की है, लेकिन आम लोगों में इनके प्रति खास आकर्षण नहीं है।

ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों में चांदी के आभूषणों का भी विवाह में विशेष महत्व रहा है, लेकिन चांदी की कीमतों में आई बेतहाशा वृद्धि ने उनके बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। एक ग्राम गोल्ड ज्वैलरी का चलन हाल के वर्षों में बढ़ा है, लेकिन ज्वैलर्स के अनुसार लोग इसे शादी-विवाह में देने के बजाय अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए अधिक खरीद रहे हैं। महिलाएं विवाह समारोहों में इन्हीं हल्के आभूषणों को पहन रही हैं। ज्वैलर्स का मानना है कि आने वाले समय में इस प्रवृत्ति में और तेजी आएगी।

भारत में शादी-विवाह में दिए जाने वाले आभूषण केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक तरह की नकदी संपत्ति भी रहे हैं। मुश्किल समय में परिवार इन्हें बेचकर या इन पर ऋण लेकर अपनी जरूरतें पूरी करते रहे हैं। कोरोना काल में तो आभूषणों ने असंख्य परिवारों के लिए जीवनरेखा का काम किया। मकान के बाद आभूषण ही ऐसी संपत्ति है, जिसे निम्न और मध्यम वर्ग के परिवार बहुत मजबूरी में ही बेचते हैं।

कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश के ज्वेलरी और सराफा व्यापार पर भी पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियां, आयात लागत, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति और निवेश की प्रवृत्तियां—इन सभी कारणों से सराफा बाजार इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (JITO), रायपुर के अध्यक्ष और छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध सर्राफा कारोबारी तिलोकचंद बरड़िया का कहना है कि भारत का ज्वेलरी सेक्टर करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा है और इसमें स्थिरता बनाए रखना बेहद जरूरी है।

उनके अनुसार कीमतों में बार-बार होने वाले उतार-चढ़ाव से खुदरा मांग प्रभावित होती है, जिससे छोटे और मध्यम ज्वैलर्स को स्टॉक मैनेजमेंट, कैश फ्लो और ग्राहक विश्वास जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। विवाह और त्योहारी सीजन को देखते हुए यह आवश्यक है कि बाजार में विश्वास का माहौल बने। उन्होंने सरकार से आयात शुल्क, टैक्स स्ट्रक्चर और अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल और व्यावहारिक बनाने की मांग की, ताकि ज्वेलरी और सराफा व्यापार को राहत मिल सके और रोजगार के नए अवसर पैदा हों।

पिछले एक साल में सोने की कीमतों में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। इसी अवधि में कीमती धातुओं में निवेशकों की भारी मांग देखी गई, जिससे एक के बाद एक रिकॉर्ड बने। यह तेजी अनुभवी ट्रेडरों के लिए भी चौंकाने वाली रही और कीमतों में असाधारण उतार-चढ़ाव पैदा हुआ। जनवरी में यह रुझान और तेज हुआ, जब कमजोर होती मुद्राओं, फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को लेकर चिंताओं, ट्रेड वॉर और भू-राजनीतिक तनाव के बीच निवेशकों ने सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख किया।

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, हालिया गिरावट और तेजी के दौर में डॉलर की मजबूती और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर व स्वीडिश क्रोना जैसी कमोडिटी करेंसी में बिकवाली भी अहम कारण रही। 26 जनवरी को सोने की कीमत पहली बार 5,000 डॉलर प्रति औंस के पार चली गई थी, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 4,57,000 रुपये प्रति औंस और 10 ग्राम के हिसाब से करीब 1,61,000 रुपये बैठती है। 2025 में ही सोने ने 60 प्रतिशत से अधिक की सालाना बढ़त दर्ज कर ली थी, जो 1979 के बाद सबसे ज्यादा है।

शेयर बाजार की अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिशें और केंद्रीय बैंकों की भारी खरीदारी—ये सभी कारक सोने और चांदी की कीमतों को ऊंचे स्तर पर बनाए हुए हैं। चीन, पोलैंड, तुर्की, भारत और कज़ाकिस्तान जैसे देश अपने रिजर्व में लगातार सोना बढ़ा रहे हैं। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार उभरते देश हर महीने औसतन 60 टन सोना खरीद रहे हैं।

स्पष्ट है कि सोने और चांदी की मौजूदा तेजी केवल निवेश का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संतुलन से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है। ऐसे में सरकार के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह बाजार की अस्थिरता को नियंत्रित करने, कर ढांचे को तर्कसंगत बनाने और आम जनता, विशेषकर निम्न और मध्यम वर्ग, को राहत देने के लिए ठोस कदम उठाए। क्योंकि अगर आभूषण आम लोगों की पहुंच से पूरी तरह बाहर हो गए, तो इसका असर केवल बाजार पर नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ेगा।

लेखक-अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।