
भारत में वायु प्रदूषण को लंबे समय तक उत्तर भारत, विशेषकर दिल्ली-एनसीआर और सिंधु–गंगा के मैदानी इलाकों की सर्दियों से जुड़ी समस्या माना जाता रहा,लेकिन बीते कुछ वर्षों में सामने आए आंकड़े और शोध यह स्पष्ट कर चुके हैं कि अब यह संकट न तो मौसमी रह गया है और न ही किसी एक क्षेत्र तक सीमित। आज वायु प्रदूषण पूरे देश में फैल चुका है और यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति का रूप ले चुका है, जो शिशुओं से लेकर बुजुर्गों तक, अमीर से गरीब तक और लगभग हर अंग प्रणाली को प्रभावित कर रहा है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की ताजा रिपोर्ट इस संकट की गंभीरता को उजागर करती है। हाई-रेजोल्यूशन सैटेलाइट तकनीक के जरिए किए गए इस विश्लेषण में भारत के 28 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों के 749 जिलों की वायु गुणवत्ता का आकलन किया गया। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें से एक भी जिला ऐसा नहीं है जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वायु गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरता हो।
रिपोर्ट के अनुसार, 749 जिलों में से 447 जिले, यानी करीब 60 प्रतिशत, ऐसे हैं जहां पीएम 2.5 (PM2.5) का वार्षिक औसत स्तर भारत के राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) से ऊपर पाया गया। WHO के मुताबिक PM2.5 का वार्षिक सुरक्षित स्तर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर होना चाहिए, जबकि भारत में तय NAAQS सीमा 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इसके बावजूद सैकड़ों जिले इस सीमा को भी पार कर चुके हैं।
देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर ‘प्रदूषण विजेता’ बनकर सामने आई है। यहां PM2.5 का वार्षिक औसत स्तर 101 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है, जो भारतीय मानक से ढाई गुना और WHO की सीमा से लगभग 20 गुना अधिक है। 2025 में निगरानी किए गए 256 शहरों में से 150 शहरों में राष्ट्रीय PM2.5 मानक का उल्लंघन पाया गया। दिल्ली में कई दिनों तक PM2.5 का स्तर 107 से 130 µg/m³ तक रिकॉर्ड किया गया, जबकि भारत में 24 घंटे की सीमा 60 µg/m³ और WHO की गाइडलाइन 15 µg/m³ है।
स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अधिकतम 500 पर सीमित है, जबकि वास्तविक समय में कई बार प्रदूषण का स्तर इससे कहीं अधिक, कभी-कभी 1000 से भी ऊपर पहुंच जाता है। यानी आधिकारिक पैमाने भी जमीनी हकीकत को पूरी तरह नहीं दिखा पा रहे।
CREA की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा प्रदूषित 50 जिलों में दिल्ली और असम के 11-11 जिले शामिल हैं। इसके बाद हरियाणा और बिहार के 7-7 जिले, उत्तर प्रदेश के 4, त्रिपुरा के 3, राजस्थान और पश्चिम बंगाल के 2-2 जिले आते हैं। राज्य स्तर पर देखा जाए तो दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर ऐसे राज्य हैं जहां निगरानी में शामिल हर एक जिला NAAQS मानक से ऊपर पाया गया।
रिपोर्ट में नॉर्थईस्ट को नया प्रदूषण हॉटस्पॉट बताया गया है। असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में प्रदूषण का स्तर पूरे साल ऊंचा बना रहता है। असम में प्रदूषण का प्रमुख कारण उद्योग नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर चल रहे निर्माण कार्य और धूल (डस्ट) को बताया गया है। गुवाहाटी और उसके आसपास के इलाके, खासकर बर्नीहाट, आज गंभीर प्रदूषण की चपेट में हैं।
CREA के विश्लेषक के अनुसार, भारत की वायु समस्या को केवल शहरों की धुंध या सर्दियों की समस्या मानना अब बड़ी भूल होगी। यह पूरे वर्ष और पूरे देश की समस्या बन चुकी है। इसके समाधान के लिए जिला और क्षेत्र आधारित नीति की सख्त जरूरत है। एयरशेड अप्रोच यानी एक पूरे भौगोलिक क्षेत्र को ध्यान में रखकर प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति अपनाए बिना इस संकट से निपटना संभव नहीं है।
वायु प्रदूषण का सबसे गंभीर प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। अनुमान के अनुसार, लगभग 46 प्रतिशत भारतीय ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां प्रदूषण के कारण उनकी जीवन प्रत्याशा कम हो गई है। दिल्ली में PM2.5 के लगातार संपर्क से औसतन जीवन प्रत्याशा आठ साल से अधिक घट जाती है।
दिल्ली सरकार के आधिकारिक आंकड़े भी इस सच्चाई की पुष्टि करते हैं। साल 2024 में राजधानी में सांस संबंधी बीमारियों से 9,211 लोगों की मौत हुई, जबकि 2023 में यह संख्या 8,801 थी। परिसंचरण तंत्र से जुड़ी बीमारियों से 21,262 मौतें दर्ज की गईं। कुल मिलाकर 2024 में दिल्ली में मौतों की संख्या बढ़कर 1,39,480 हो गई, जो 2023 में 1,32,391 थी। यानी हर दिन औसतन 381 मौतें।
PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण सीधे रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं। इससे उच्च रक्तचाप, हार्ट अटैक (मायोकार्डियल इन्फार्क्शन) और स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। श्वसन तंत्र पर इसका असर और भी गंभीर है। भारत में करीब 6 प्रतिशत बच्चे अस्थमा से पीड़ित हैं और प्रदूषण बढ़ने पर अस्पतालों में सांस की तकलीफ से जुड़े मामलों की संख्या तेजी से बढ़ती है।
न्यूरोलॉजिकल यानी तंत्रिका संबंधी प्रभाव भी अब वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चुके हैं। वायु प्रदूषण मस्तिष्क में सूजन पैदा कर सकता है, जिससे बच्चों का शैक्षणिक प्रदर्शन प्रभावित होता है और बुजुर्गों में मनोभ्रंश (डिमेंशिया) का खतरा बढ़ जाता है।
उच्च PM 2.5 एक्सपोजर का सीधा संबंध समय से पहले जन्म और कम जन्म वजन से पाया गया है। दिल्ली में शिशु मृत्यु दर (IMR) में भले ही मामूली सुधार हुआ हो, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रदूषण इस दिशा में एक बड़ा जोखिम बना हुआ है। 2024 में दिल्ली में कुल 3,06,459 लाइव बर्थ दर्ज किए गए, जबकि जन्म दर में गिरावट और मृत्यु दर में बढ़ोतरी देखी गई।
प्रदूषण का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की वैश्विक छवि और खेल आयोजनों पर भी पड़ रहा है। 2026 इंडिया ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट से दुनिया के नंबर-3 खिलाड़ी एंडर्स एंटोनसेन का हटना इसका उदाहरण है। उन्होंने खुलकर दिल्ली के प्रदूषण को अपने फैसले की वजह बताया। यह लगातार तीसरा साल है जब वह इस टूर्नामेंट से हटे हैं।
यह संकट अब केवल उत्तर या पूर्व भारत तक सीमित नहीं रहा। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी हालात चिंताजनक हैं। राजधानी रायपुर में हाल ही में AQI 228 दर्ज किया गया, जो अत्यंत खतरनाक श्रेणी में आता है। दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव, धमतरी और कांकेर तक PM 2.5 और PM10 के महीन कणों ने हवा को जहरीला बना दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, ठंड में हवा की गति कम होने से प्रदूषण एक ही क्षेत्र में लंबे समय तक जमा रहता है।
स्पष्ट है कि अब तक की नीति, जो केवल कुछ चुनिंदा शहरों तक सीमित थी, पर्याप्त नहीं है। पूरे देश और पूरे वर्ष के दृष्टिकोण से वायु प्रदूषण से निपटने की जरूरत है। उद्योग, परिवहन, निर्माण, कृषि और शहरी नियोजन,हर क्षेत्र में सख्त और वैज्ञानिक कदम उठाने होंगे। पेड़ों की कटाई रोकना, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन मजबूत करना और जिला-स्तरीय एक्शन प्लान लागू करना समय की मांग है।
वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के जीवन और भविष्य का सवाल बन चुका है। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसकी कीमत स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और जीवन प्रत्याशा, हर स्तर पर हमें और भारी चुकानी पड़ेगी।
लेखक-अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।
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