डॉ.राम मनोहर लोहिया की मौजूदा समय में प्रासंगिकता – रघु ठाकुर

(लोहिया के जन्मदिवस पर विशेष आलेख)
समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया का 23 मार्च को जन्म दिन है। उनकी युवा अवस्था जर्मनी से शिक्षा पूरी करके और देश आने के बाद आजादी के आंदोलन में बीती। लाहौर से लेकर आगरा जेल तक भीषण यातना के साथ उन्होंने जेल यात्रा पूरी की। 1945 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने गोवा मुक्ति आंदोलन शुरू किया, जिसकी शुरुआत गोवा में नागरिक अधिकारों के साथ शुरू हुई और वह बाद में गोवा मुक्ति आंदोलन में बदल गया। इस आंदोलन में वे आग्वा किले में बनाई गई जेल में रहे जो बहुत कष्टकारी जेल यात्रा थी। आजादी के बाद भी वे बहुत बार देश की आजाद सरकार की जेलों में रहे परंतु उनकी कानपुर की जेल यात्रा भी काफी तकलीफप्रद थी। जिस प्रकार ब्रिटिश हुकुमत या पुर्तगाली हुकुमत ने उन्हें शत्रु मानकर व्यवहार किया था कुछ उससे भी अधिक बुरा व्यवहार देश की आजाद सरकार ने उनके साथ कानपुर जेल में किया था।
लोहिया के जीवन के बहुत पहलु हैं, भाषा, राजनीति, धर्म, सिविल नाफरमानी, कृषि नीति, आदि कितने ही ऐसे विषय हैं जिन्हे लोहिया ने अपने विचारों से पुष्ट कर देश के समक्ष रखा। उन विषयों पर अब भी लोहिया के विचारों के आगे कम से कम मूल और सूत्र रूप में कोई उसके आगे चिन्तन नहीं हो सका है। हालाँकि समयकाल के साथ चिन्तन की धारा को निरंतर आगे ले जाने के प्रयास होना चाहिए।
कुछ मित्र मुझसे पूछते हैं कि आप सदैव दुनिया की चर्चा करते हैं, तो उसमें लोहिया ही क्यों जरूरी है। इस 21वीं सदी में, बाजारवाद के युग में, वैश्वीकरण के दौर में, लोहिया के विचारों की क्या प्रासंगिकता है? मैं उनको कहता हूँ कि, लोहिया की श्सप्तक्रांत्यि आज भी अपने मूल और सूत्र रूप में समता के विश्व का आधार है। मैं इसके अलावा कुछ अन्य मुद्दों पर आज डॉ. लोहिया को वर्तमान काल की प्रासंगिकता को कसौटी पर कसूँगा।
1. हिन्दुस्तान की संसद को डॉ लोहिया ने एक नया दर्शन व सूत्र दिया था। देश की संसद केवल खाता बही रखने व पेश करने वाली मुनीम साहब की खाता बही नहीं है। बल्कि देश के गरीब और आम आदमी का प्रतिबिम्व है। लोहिया ने हिन्दुस्तान की संसद में श्तीन आने बनाम पन्द्रह आने वाला भाषण देकर गरीबों की संसद बना दिया, और उस अल्प काल याने लगभग 5-6 वर्षों के दौरान देश का गरीब चाय वाला, पान वाला, छोटा व्यापारी, गाँव का किसान जो आज संसद की कार्यवाही को देखना तो दूर सुनना भी नहीं चाहता, लोहिया के संसदीय जीवन के दौरान संसद की कार्यवाही को रेडियो पर सुनते थे। लोहिया संसद में बोलते थे, गरीबों की बात उठाते थे और हजारों मील दूर बैठा किसान-मजदूर लोहिया के भाषण में अपने जीवन की व्यथा व कथा देखता था। इसीलिये डॉ लोहिया ने कहा था कि मेरे पास कोई संपत्ति नहीं है, सिवाय इसके कि देश का गरीब आदमी मुझे अपना आदमी मानते हैं। 1967 के बाद से संसद की चाल और चरित्र बदल चुका है। अब संसद में गरीबों की भागीदारी नहीं है बल्कि संसद अमीरों की बन गई। तीन-चौथाई से अधिक सांसद आज करोड़पति हैं जबकि देश के 85 करोड़ लोग 5 किलो अनाज के लिये मोहताज और अपना वोट बेचने को लाचार हैं। क्या संसद का यह बदला हुआ स्वरूप गरीबों की संसद से अमीरों की संसद, भारतीय संसद से वैश्वीकृत संसद में परिवर्तित, संप्रभु संसद से विश्व व्यापार के समझौते की गुलाम संसद तक में परिवर्तन क्या आज भी लोहिया को प्रासंगिक सिद्ध नहीं करता? आज संसद देश में आमजन के लिये विश्वसनीय नहीं है, यह लोकतंत्र के लिये एक बुरा दौर है। संसद की कार्यवाही को आम आदमी देखना ही नहीं चाहता। किसी नग्नावतार अभिनेता-अभिनेत्री की फिल्म को देखने के लिये, क्रिकेट के मैच को देखने के लिये देश का मध्य व उच्च वर्ग बैचेन रहता है परंतु संसद की कार्यवाही को देखना तो दूर, शुरू होने के पूर्व टी.वी. बंदकर देता है। आज की संसद संवाद करने की जगह बहिष्कार की संसद बन गई। कई बार तो यह लगता है कि सत्ता पक्ष व प्रतिपक्ष बहिष्कार चाहते हैं। ताकि सत्ता पक्ष अपने मनोनुकूल निर्णय करने को स्वतंत्र रहे और विपक्ष नकली क्रांतिकारी नकाब ओढ़े हुए बने रहे।
2. लोहिया ने 1950 के दशक में 18 साल के बालिग मतदाता द्वारा समूची दुनिया की एक निर्वाचित विश्व संसद के गठन की कल्पना प्रस्तुत की थी। आज अगर यह विश्व संसद बनी होती तो क्या रूस व यूक्रेन युद्ध आरंभ हो पाता ? अफगानिस्तान-पाकिस्तान, ईरान-इजरायल, इजरायल-फिलिस्तीनी जैसे जो सीमाई आजादी या खनिज संपदा को लेकर क्या सांपत्तिक युद्ध हो पाते? क्या आतंकवाद की घटनायें होती? क्या वैश्विक पूँजीवाद अपने आगोश में विश्व को लेने में समर्थ होता? अभी दुनिया जो तीसरे युद्ध की ओर बढ़ रही है, इसका अंत क्या होगा, कैसे होगा, कितना विनाशकारी होगा? इन सवालों की कल्पना कठिन है। कहने को यूएनओ है पर वह एक लकवाग्रस्त संस्था है। इजरायल,अमेरिका बनाम ईरान युद्ध शुरू होने के बाद यूएनओ के महासचिव ने एक पुकार लगाई है कि युद्ध समाप्त होना चाहिये्य, परंतु कर्म के स्तर पर कुछ भी नहीं है। यहाँ तक कि वे युद्धरत महाशक्तियों के बारे में एक निंदा का शब्द भी नहीं बोल पाते। यूएनओ की महासभा की सुरक्षा परिषद की बैठक भी नहीं बुला पाते। क्या ऐसा यूएनओ दुनिया की समस्याओं का हल कर सकता है? दूसरी ओर आप कल्पना करें कि अगर लोहिया की कल्पना के अनुसार निर्वाचित विश्व संसद बनी होती तो क्या दुनिया इस विश्व युद्ध के संकट व त्रासदी को झेलने को विवश होती? क्या जिस दुनिया का निर्माण आज हो रहा है उसमें एक व्यक्ति वारेन वफेट के पास 70 लाख करोड़ की नगदी है और दूसरा व्यक्ति 70 रुपये पर जिंदा है ऐसी विषम दुनिया बन पाती। क्या दुनिया में नशे का व्यापार हो पाता? क्या दुनिया में व्यक्ति व राज्य की तानाशाही हो पाती? अगर विश्व संसद बनी होती या बन जाए तो न केवल इन सब समस्याओं से निजात मिलेगी बल्कि एक सुंदर दुनिया बन जाये। क्या यह लोहिया की प्रासंगिकता महसूस नहीं कराती?
3. राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र लगभग समाप्त है। दल व्यक्तिपरक और परिवारपरक बन गये हैं। एक नये प्रकार के लोकतांत्रिक आवरण में ढके क्रूर पारिवारिक सामंतवाद का न केवल उदय हो रहा है बल्कि यह व्यापक रूप से फैल चुका है। लोहिया ने लगातार सत्ता के विकेंद्रीकरण चौखंभा राज्य, दलों में आंतरिक लोकतंत्र की बात को मजबूती से उठाया था और व्यक्तिपरक दलों को लोकतंत्र की तरफ झुकने के लिये लाचार किया था। आज राजनीतिक दलों की गिरावट, अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली जातिवाद और परिवारवाद, दलीय तानाशाही, क्या लोहिया की प्रासंगिकता सिद्ध नहीं करती है?
4. डॉ लोहिया ने महात्मा गांधी के दुनिया को दिये सबसे बड़े हथियार सत्याग्रह को अपने काल के अनुकूल एक नये स्वरूप में प्रस्तुत किया था। उन्होंने सिविल नाफरमानी को लोकतंत्र की बुनियाद के साथ जोड़ा, सिविल नाफरमानी को संसद को बेहतर बनाने के लिये, उसके साथ रिश्ता जोड़ा। यह लोहिया ही कहते थे कि अगर सड़कें सूनी रहेगी तो संसद आवारा हो जायेगी। संसद तभी कोई अच्छा कानून पारित कर सकती है जब जनता का दबाव बने। अहिंसक सिविल नाफरमानी के बजाय संसद बांझ है।लोहिया ने अहिंसक सिविल नाफरमानी को नागरिक अधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष माना और नागरिक अधिकारों का सबसे मजबूत हथियार भी बनाया। वे कहते थे कि वे ऐसा व्यक्ति गढ़ना चाहते हैं जो स्वभाव से सत्याग्रही हो, याने व्यक्ति अपने आपमें ही हर अन्याय की मुखालपत वाला बने और जहां कहीं भी कोई अन्याय हो वहाँ उसका प्रतिकार करे। क्या आज की परिस्थितियां जो दलीय और राजकीय तानाशाही की गिरफ्त में है। क्या लोहिसा की प्रासंगिकता सिद्ध नहीं करती?
डॉ लोहिया ने महात्मा गांधी को इस अर्थ में भी पुर्नजीवित किया, कि आजादी के बाद एक विचार देश के समक्ष कुछ समूहों के द्वारा रखा था कि आजादी के बाद देश में सत्याग्रह की क्या आवश्यकता है? अपनी सरकार है, अब सत्याग्रह की जरूरत नहीं है। पर डॉ लोहिया ने कहा कि सत्याग्रह एक सर्वकालिक गांधी का दिया हुआ औजार है और सतत सत्याग्रह ही एक बेहतर देश, समाज संसद और राजनीति का निर्माण कर सकता है। आज जिस प्रकार लोग भयभीत हैं, अपनी बात हिम्मत से कहने में डरते हैं, क्या उन्हें निर्भय बनाने के लिये लोहिया की अहिंसक सिविल नाफरमानी सबसे सशक्त माध्यम नहीं है? आज राज्य निरंकुश बन रहा है और राजनैतिक नेतृत्व दब्बू व बौना हो रहा है। तब क्या इस हालत को बदलने के लिये लोहिया की अहिंसक सिविल नाफरमानी सबसे उपयुक्त माध्यम नहीं है? एक जीवित मुर्दा व्यक्ति को जीवित जीवंत व्यक्ति में बदलने के लिये, सड़कों को गरमा कर, संसद को उपयोगी बनाने के लिये, देश को गरमाकर, केन्द्रीकरण और तानाशाही की ओर बढ़ती सरकार के कदमों के सामने अंगार बिछाने के लिये, अहिंसक नाफरमानी के अलावा कया और केाई विकल्प हो सकता है? और क्या यह लोहिया की प्रासंगिकता नहीं है?
अगर देश के प्रबुद्धजन कोई और मार्ग सुझा सकते हैं तो बतायें, मैं उनका स्वागत करूँगा। परंतु तब तक तो लोहिया प्रासंगिक बने रहेंगे और मैं उनकी चर्चा करता रहूँगा।
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।




