बस्तर 2.0 :सशस्त्र माओवादियों के खात्मे के बाद विकास का रोड मैप

(अशोक कुमार साहू)
लगभग साढ़े चार दशक तक हिंसा, भय और अविश्वास के साये में जीने वाला बस्तर आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सशस्त्र माओवादियों के खात्मे संबंधी बयान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय तथा गृह मंत्री विजय शर्मा के दृढ़ दावों ने यह संकेत दिया है कि बस्तर अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। यह केवल सुरक्षा परिदृश्य में बदलाव नहीं, बल्कि एक लंबे संघर्ष के बाद उभरती उम्मीदों का क्षण है। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि बंदूकों की खामोशी अपने आप विकास की गारंटी नहीं देती।अब असली परीक्षा इस शांति को स्थायी बनाते हुए बस्तर को विकास, विश्वास और अवसरों की मुख्यधारा में शामिल करने की है।
इसी संदर्भ में मुख्यमंत्री साय का नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलकर ‘बस्तर रोडमैप 2.0’ का विस्तृत और दूरदर्शी ब्लूप्रिंट प्रस्तुत करना एक महत्वपूर्ण और समयोचित पहल है। यह पहल केवल योजनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो बस्तर को सुरक्षा समस्या के नजरिए से निकालकर विकास की संभावनाओं के केंद्र के रूप में देखना चाहती है।
बस्तर में आई शांति अचानक नहीं आई है। इसके पीछे सुरक्षा बलों के हजारों जवानों और निर्दोष नागरिकों की शहादत जुड़ी है। दशकों की हिंसा के बाद जो स्थिरता हासिल हुई है, उसे बनाए रखना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इतिहास यह भी बताता है कि केवल सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होते; यदि विकास और सामाजिक न्याय समानांतर रूप से नहीं चलते, तो असंतोष फिर सिर उठा सकता है।
इसी संदर्भ में ‘बस्तर 2.0’ का ब्लूप्रिंट महत्वपूर्ण हो जाता है, जो ‘सैचुरेशन, कनेक्ट, फैसिलिटेट, एम्पावर और एंगेज’ जैसी रणनीति पर आधारित है। इसका स्पष्ट संकेत है कि सरकार केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण पर भी जोर दे रही है।
बस्तर की सबसे बड़ी समस्या हमेशा से कनेक्टिविटी रही है। घने जंगल, दुर्गम भौगोलिक स्थिति और कमजोर सड़क नेटवर्क ने इस क्षेत्र को विकास से दूर रखा। प्रस्तावित योजना के तहत 228 नई सड़कों और 267 पुलों का निर्माण, साथ ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधूरे कार्यों को 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य, इस दिशा में बड़ा कदम है।
रेल लाइन विस्तार, एयरपोर्ट विकास और इंद्रावती नदी पर बैराज निर्माण जैसी परियोजनाएं न केवल कनेक्टिविटी सुधारेंगी, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी गति देंगी। यह समझना जरूरी है कि सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार और प्रशासन तक पहुंच का माध्यम भी है।
बस्तर के विकास की असली कसौटी शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार होगी। एजुकेशन सिटी, मेडिकल कॉलेज और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की योजनाएं इस दिशा में सकारात्मक संकेत देती हैं। 45 पोटा केबिन स्कूलों को स्थायी भवनों में बदलने का निर्णय भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अस्थायी व्यवस्था से स्थायी संस्थागत ढांचे की ओर संक्रमण का प्रतीक है।
स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना और डॉक्टरों के लिए ट्रांजिट हॉस्टल बनाना, उन व्यावहारिक समस्याओं को संबोधित करता है जो अब तक डॉक्टरों की कमी का कारण रही हैं।
इंद्रावती नदी पर देउरगांव और मटनार में सिंचाई परियोजनाओं से 31,840 हेक्टेयर भूमि को लाभ मिलने की संभावना है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों किसानों के जीवन में बदलाव की संभावना है। बस्तर की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और वनोपज पर आधारित है, ऐसे में सिंचाई सुविधा का विस्तार आर्थिक स्थिरता का आधार बनेगा।
सरकार की तीन वर्षीय योजना के तहत 2029 तक 85% परिवारों की आय 15,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये करने का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह सामाजिक बदलाव का बड़ा माध्यम बन सकता है। इसके साथ ही लघु वनोपज के मूल्य संवर्धन, स्थानीय उत्पादों के ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ने पर भी समानांतर ध्यान देना होगा।
बस्तर प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता से समृद्ध है। चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान जैसे स्थल वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। कैनोपी वॉक, ग्लास ब्रिज और एडवेंचर टूरिज्म जैसी परियोजनाएं इस दिशा में नए आयाम जोड़ सकती हैं।
‘बस्तर ओलंपिक’ और ‘बस्तर पंडुम’ जैसे आयोजन स्थानीय संस्कृति को राष्ट्रीय मंच पर लाने का प्रयास हैं। इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय युवाओं को भी नई पहचान और अवसर मिलेंगे।
बस्तर के वर्तमान को समझने के लिए उसके अतीत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2005 में शुरू हुआ सलवा जुडूम अभियान, जो नक्सलवाद के खिलाफ जन आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था, समय के साथ विवादों में घिर गया। बड़े पैमाने पर विस्थापन, मानवाधिकार उल्लंघन और सामाजिक विभाजन ने इसे एक असफल प्रयोग बना दिया।
इसी तरह 2013 का झीरम घाटी हमला, जिसमें महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल जैसे वरिष्ठ नेताओं समेत 32 लोगों की जान गई, बस्तर के इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय है। यह घटना केवल एक हमला नहीं थी, बल्कि उस समय नक्सलियों की ताकत और राज्य की सीमाओं का प्रतीक थी।
इन घटनाओं से सबसे बड़ी सीख यह मिलती है कि किसी भी समस्या का समाधान केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि संवेदनशील और समावेशी दृष्टिकोण से ही संभव है।
नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद सबसे बड़ी चुनौती आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास की भी है। केवल आर्थिक सहायता देना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार से जोड़ना होगा। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है समाज में उनकी स्वीकार्यता सुनिश्चित करना, ताकि वे फिर से हिंसा की ओर न लौटें।
इसके साथ ही आदिवासी समुदाय को उनके वन अधिकारों का पूर्ण लाभ देना, उनकी सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करना और उन्हें विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाना अनिवार्य है। ‘बस्तर मुन्ने’ जैसे कार्यक्रम यदि ईमानदारी से लागू होते हैं, तो वे शासन और जनता के बीच भरोसे की खाई को पाट सकते हैं।
‘बस्तर 2.0’ का ब्लूप्रिंट एक सकारात्मक शुरुआत है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। योजनाएं तभी सफल होंगी जब उनमें पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित होगी।
प्रधानमंत्री के संभावित बस्तर दौरे और केंद्र सरकार के विशेष पैकेज की उम्मीदें इस क्षेत्र के लिए नई संभावनाएं खोल सकती हैं। यदि केंद्र और राज्य मिलकर दीर्घकालिक दृष्टि के साथ काम करें, तो बस्तर न केवल हिंसा से उबर सकता है, बल्कि विकास का एक मॉडल भी बन सकता है।
दरअसल, बस्तर की कहानी केवल एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि उस भारत की कहानी है जो संघर्ष से निकलकर विश्वास और विकास की ओर बढ़ रहा है। शांति की यह नई शुरुआत तभी स्थायी होगी, जब इसके साथ न्याय, समावेशन और अवसरों की ठोस बुनियाद भी खड़ी की जाए।
सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।




