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“क्रेडिट की सियासत: अखिलेश यादव के दौरे पर श्रेय लेने की होड़ ”                      

(सन्तोष यादव)

सुलतानपुर, 15 अप्रैल। राजनीति में श्रेय लेने की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह हद से आगे बढ़ जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है। कूरेभार ब्लॉक के शहरी गांव में हाल ही में घटित एक घटना ने इस प्रवृत्ति को एक बार फिर उजागर कर दिया है। यहां समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आगमन को लेकर श्रेय लेने की होड़ ने स्थानीय सियासत में हलचल पैदा कर दी है।

    दरअसल, शहरी गांव में एक निजी पारिवारिक कार्यक्रम उस समय राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया, जब अखिलेश यादव युवा सपा नेत्री शीला यादव को विवाह की बधाई देने उनके आवास पहुंचे। इस मुलाकात की पृष्ठभूमि पूरी तरह व्यक्तिगत थी। जानकारी के अनुसार, शीला यादव ने लखनऊ में स्वयं अखिलेश यादव से मुलाकात कर उन्हें अपने विवाह का निमंत्रण दिया था। उसी आमंत्रण के आधार पर, सुलतानपुर में एक अन्य निजी कार्यक्रम में शामिल होने के दौरान उन्होंने समय निकालकर शीला यादव के घर जाकर उन्हें शुभकामनाएं दीं।

    यह एक सामान्य और आत्मीय पारिवारिक मुलाकात थी, लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने सियासी रंग ले लिया। हाल ही में समाजवादी पार्टी में शामिल हुए एक पूर्व विधायक ने इस दौरे का श्रेय लेने की कोशिश करते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की। इस पोस्ट में उन्होंने लगभग एक वर्ष पूर्व शीला यादव के गांव में हुई एक दुखद घटना के संदर्भ में पीड़ित परिवार से अखिलेश यादव की मुलाकात को अपने प्रयासों का परिणाम बताया।

   विवाद तब और गहरा गया, जब उस पोस्ट में जो तस्वीरें साझा की गईं, वे स्पष्ट रूप से शीला यादव के घर की थीं, लेकिन कहीं भी यह उल्लेख नहीं किया गया कि  अखिलेश यादव उनके विवाह समारोह के अवसर पर वहां पहुंचे थे। इस तथ्य की अनदेखी को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी देखी गई।

   गांव के कई प्रत्यक्षदर्शियों ने इस दावे को भ्रामक बताते हुए कहा कि यह मुलाकात पूरी तरह स्वाभाविक थी, क्योंकि शीला यादव का घर उसी क्षेत्र में स्थित है और उन्हें व्यक्तिगत रूप से निमंत्रित किया गया था। ग्रामीणों का कहना है कि इसे किसी विशेष राजनीतिक आग्रह या प्रयास का परिणाम बताना वास्तविकता से परे है।

    स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि आज की राजनीति में कार्य से अधिक उसके श्रेय का प्रचार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। इस घटना ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सोशल मीडिया के दौर में सियासी छवि गढ़ने के लिए किस तरह तथ्यों को नजरअंदाज कर दावे किए जाते हैं।

     कुल मिलाकर, शहरी गांव की यह घटना केवल एक स्थानीय विवाद नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रवृत्ति का प्रतीक है, जहां वास्तविकता से अधिक उसका प्रस्तुतीकरण महत्व पाने लगा है।

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