रायपुर, 05 सितम्बर। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने झीरम घाटी हत्याकांड मामले में एनआईए की विशेष अदालत के फैसले को आधा-अधूरा न्याय बताया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अदालत के फैसले का सम्मान करती है, लेकिन न्यायालय ने उन्हीं तथ्यों के आधार पर निर्णय दिया है, जो राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने उसके समक्ष प्रस्तुत किए।
पत्रकारों से चर्चा करते हुए बैज ने आरोप लगाया कि एनआईए की जांच शुरू से ही दिशाहीन रही और उसने झीरम हमले के राजनीतिक षड्यंत्र के पहलू की गंभीरता से जांच नहीं की।उन्होंने कहा कि एनआईए ने जिन 10 आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए अदालत में साक्ष्य प्रस्तुत किए, वे कथित रूप से निचले स्तर के नक्सली थे। इतने बड़े हमले में बड़े नक्सली नेताओं की भूमिका की जांच क्यों नहीं की गई, यह गंभीर सवाल है।
बैज ने कहा कि एनआईए की शुरुआती एफआईआर में कई प्रमुख नक्सली नेताओं के नाम शामिल थे, लेकिन बाद में चार्जशीट से उनके नाम हटा दिए गए। उन्होंने पूछा कि जब एनआईए ने स्वयं माना था कि झीरम हमले में करीब 200 नक्सली शामिल थे और 39 लोगों को नामजद किया गया था, तो जांच और कार्रवाई केवल 10 आरोपियों तक ही क्यों सीमित रह गई।
कांग्रेस ने उठाए जांच पर सवाल
दीपक बैज ने कहा कि अदालत के फैसले से झीरम हमले की साजिश का पर्दाफाश नहीं हुआ है। कांग्रेस ने कई सवाल उठाते हुए पूछा कि परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा क्यों हटाई गई थी और यात्रा का मार्ग किसके कहने पर बदला गया था।
उन्होंने कहा कि हमले की योजना किसने बनाई और उसके पीछे कौन लोग थे, इसकी पूरी सच्चाई अब तक सामने नहीं आ सकी है। कांग्रेस का आरोप है कि कई बड़े नक्सली नेताओं के आत्मसमर्पण के दौरान सरकार ने उन्हें झीरम हमले से जुड़ा बताया, लेकिन एनआईए ने उनसे पूछताछ क्यों नहीं की।
बैज ने यह भी सवाल उठाया कि घटना के प्रत्यक्षदर्शियों और घायल पीड़ितों में से कितने लोगों के बयान जांच एजेंसी ने दर्ज किए। उन्होंने आरोप लगाया कि कई पीड़ित और प्रभावित लोग जांच एजेंसियों के समक्ष शपथपत्र के साथ उपस्थित हुए, लेकिन उनके बयान जांच का हिस्सा नहीं बनाए गए।
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि घटना के कई सप्ताह बाद तक शहीदों और घायलों के पर्स, फाइलें और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज घटनास्थल पर बिखरे पड़े थे। उन्होंने सवाल किया कि महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक और अन्य साक्ष्यों को तत्काल जब्त कर जांच का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया।
बड़े नक्सली नेताओं के नाम हटाने पर सवाल
कांग्रेस के अनुसार, एनआईए की शुरुआती एफआईआर में माओवादी नेता गणपति और रमन्ना सहित कई फरार आरोपियों के नाम शामिल थे। 21 मार्च 2014 को गणपति, रमन्ना सहित 26 फरार आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए थे।
बैज ने सवाल किया कि अगस्त 2014 तक जिन प्रमुख नक्सली नेताओं के नाम जांच में शामिल थे, उन्हें बाद में सितंबर 2014 में दाखिल चार्जशीट से क्यों हटा दिया गया।
उन्होंने देवा उर्फ बारसे सुक्का का उल्लेख करते हुए कहा कि शुरुआती जांच में उसका नाम झीरम हमले से जुड़े नक्सलियों में था और उसे वांछित घोषित किया गया था। ऐसे लोगों से पूछताछ और उनकी भूमिका की जांच किस स्तर तक की गई, इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
कांग्रेस ने बसवराजू, गणेश उइके, रूपेश उर्फ संजीव, सुरेंद्र उर्फ रामचंद्र रेड्डी, जयदेव उर्फ बड्डा देव और सोनू उर्फ भूपति सहित उन नामों का भी उल्लेख किया, जिन्हें शुरुआती जांच में फरार बताया गया था। कांग्रेस ने कहा कि इनमें से कई लोगों के आत्मसमर्पण के बाद उनसे झीरम मामले में पूछताछ की स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
आत्मसमर्पित नक्सलियों से पूछताछ क्यों नहीं?
बैज ने कहा कि झीरम हमले से जुड़े बताए गए कई प्रमुख नक्सली नेताओं और कैडरों ने अलग-अलग समय पर आत्मसमर्पण किया है। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि यदि इन लोगों की भूमिका या नाम शुरुआती जांच में सामने आए थे, तो एनआईए ने उनसे झीरम हत्याकांड के संबंध में कब और किस स्तर पर पूछताछ की।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि जांच एजेंसी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आत्मसमर्पण करने वाले ऐसे लोगों से पूछताछ की गई या नहीं और यदि नहीं की गई तो इसके क्या कारण रहे।
एसआईटी जांच रोकने का भी उठाया सवाल
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि एनआईए ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा गठित एसआईटी की जांच को भी रोकने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसआईटी जांच के पक्ष में फैसला दिए जाने के बावजूद राज्य में इस दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
बैज ने कहा कि कांग्रेस लगातार मांग करती रही है कि मामले की साजिश और सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी, एडीजी नक्सल और संदिग्ध समर्पित नक्सलियों से भी आवश्यकतानुसार वैज्ञानिक और कानूनी जांच की मांग की।
भाजपा पर सच सामने नहीं आने देने का आरोप
कांग्रेस अध्यक्ष ने भाजपा की तत्कालीन सरकार पर झीरम मामले की जांच को प्रभावित करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भाजपा नहीं चाहती कि झीरम हत्याकांड की पूरी सच्चाई सामने आए।
बैज ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार द्वारा एसआईटी गठित किए जाने के बाद भी जांच को आगे बढ़ाने में बाधाएं उत्पन्न की गईं। उन्होंने कहा कि झीरम हमले की साजिश, सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक और घटना के पीछे के सभी पहलुओं की निष्पक्ष और व्यापक जांच जरूरी है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस अदालत के फैसले का सम्मान करती है, लेकिन झीरम घाटी हत्याकांड की पूरी सच्चाई सामने आने तक पार्टी न्याय की लड़ाई जारी रखेगी।




