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पटका सदस्यता राजनीति का पतन – रघु ठाकुर

भारतीय राजनीति के राजनैतिक संस्कृति में निरंतर गिरावट हो रही है। आजादी के समय में कांग्रेस पार्टी जो देश की प्रमुख पार्टी थी, की सदस्यता के बारे में जो नियम थे वह काफी कड़े थे और जो लोग सदस्य बनते थे उनमें से सभी तो नहीं पर अधिकांश लोग अपनी पार्टी की सदस्यता को स्वीकार करते समय वचन पत्र पर हस्ताक्षर करते थे और नीति व सिद्धांतों को स्वीकार करते थे। कांग्रेस पार्टी के सदस्यता के प्रारूप में खादी पहनना अनिवार्य था और अधिकांश कांग्रेसजन इसका पालन भी करते थे। पार्टी की सदस्यता को लेकर जो स्वअनुशासन और जो निष्ठा थी उसका एक उदाहरण तत्कालीन सी.पी.एण्ड वरार के सागर जिले के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी स्व. केशवराव खांडेकर थे। खांडेकर जी पक्के गांधीवादी थे और उन्हें महाकौशल का गांधी कहा जाता था। यह भी पुराने कांग्रेसजनों के द्वारा बताया जाता रहा है कि महात्मा गांधी चाहते थे कि सी.पी. एण्ड बरार के मुख्यमंत्री खांडेकर जी बने, परंतु खांडेकर जी ने एक सिद्धांत के तौर पर बयान दिया कि अगर मुझे सर्वसम्मति से चुना जायेगा तभी मैं मुख्यमंत्री का पद स्वीकार करूंगा और इसके बाद कांग्रेस के कुछ लोगों ने सुनियोजित ढंग से एक अन्य हरिजन विधायक का नाम उछाल दिया तथा श्री खांडेकर जी ने मुख्यमंत्री बनने से इंकार कर दिया। बाद में स्व. पं. रविशंकर शुक्ला मुख्यमंत्री बने।

इस घटना की पुष्टि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. मोरारजी देसाई ने की थी। जब वे प्रधानमंत्री बने और मैं उनसे मिलने गया तो वह मुझसे बोले कि मैंने तय कर लिया था कि एक भी व्यक्ति मेरा विरोध करेगा तो मैं प्रधानमंत्री नहीं बनूँगा। परंतु मैंने यह किसी को बताया नहीं था वरना लोग किसी न किसी को खड़ाकर देते और तब उन्होंने स्व. खांडेकर जी की घटना मुझे सुनाई थी। स्व. खांडेकर जी का गांव सागर शहर से लगभग 18 किमी दूर था और आज से लगभग 70-80 वर्ष पूर्व वहां की स्थिति क्या रही होगी इसकी कल्पना आज नहीं की जा सकती। तब न पक्की सड़कें थीं और न वाहन होते थे और वाहनों के नाम पर ग्रामीण क्षेत्रों में बैलगाड़ियां,घोड़ागाड़ियों का प्रयोग होता था। खांडेकर जी जिस तारीख को कांग्रेस के सदस्य बने थे उसी तारीख को वर्ष पूरा होने पर वे सदस्यता का नवीनीकरण कराने सागर आते थे यहां तक कि कई बार तो मूसलाधार बारिश होने पर भी वह गाँव पैदल चलकर आते थे और अपनी सदस्यता का नवीनीकरण कराते थे।

    कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी यद्यपि कांग्रेस का अनुषांगिक संगठन जैसा था परंतु जो लोग कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बनते थे वे भी अपनी सदस्यता, वैचारिक प्रतिबद्धता, नीति प्रतिबद्धता के प्रति संकल्पित होते थे। उस समय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता भी कैडर आधारित होती थी और जिसे हासिल करने के लिये अनेकों शर्तों को पूरा करना पड़ता था। इसी प्रकार कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता भी कैडर आधारित थी और जिसे हासिल करने के लिये वैचारिक कसौटियों को स्वीकार करना होता था।

   आजादी के बाद जब सोशलिस्ट पार्टी अलग बनी तब भी पार्टी की सदस्यता की पवित्रता और कार्यकर्ताओं के आचरण का ध्यान रखा जाता था। मुझे याद है कि जब 1963-64 में मैं डॉ. लोहिया के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी का सदस्य बना तब भी हम लोग अपनी संस्था के प्रति बहुत गहरा सम्मान रखते थे। पार्टी का सदस्य बनना उसके लिये सदस्यता फार्म पर हस्ताक्षर करना संविधान व नीति वक्तव्य को पढ़कर उसकी स्वीकृति देना अनिवार्य था, बाद में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी तब कुछ नियम और भी कड़े बनाये गये थे। यानि सक्रिय सदस्य बनने के लिये न्यूनतम निर्धारित सदस्यों को सदस्य बनाना, जन आंदोलन में जेल जाना, पार्टी के प्रशिक्षण शिविरों में शामिल होना अनिवार्य शर्त होती थी और इसका हम लोग कड़ाई से पालन भी करते थे और अपनी सदस्यता के लिये गर्व महसूस करते थे। परंतु 1959 के बाद कांग्रेस पार्टी में सदस्यता का संबंध केवल सदस्यता शुल्क की राशि जमा करना हो गया। और पैसे वाले लोग, उद्योगपति लोगों ने या कहीं के भी राजे रजवाड़ों ने पैसा जमाकर थोक में सदस्यता लेना शुरू कर दिया। उस समय अंग्रेज के मित्रों को यह बड़ा सुखद लगता था कि उनकी तरफ से कोई सेठ हजार दो हजार, पांच हजार का शुल्क जमा करने के लिये पैसा दे रहा है। उन्हें किसी के पास जाने की तकलीफ करने की जरूरत नहीं है और उस राशि के आधार पर वे संगठन के ऊपर काबिज होने लगे। यहीं से पार्टी की गिरावट शुरू हुई और अब इस अधपतन की स्थिति में है कि उसकी शुरुआत 1960 से शुरू हो गई थी। 60 के दशक में जनसंघ भी सदस्यता आधारित पार्टी थी उनका संगठन बंद जैसा संगठन था परंतु सदस्य उनकी पार्टी के विचारों पर प्रतिबद्ध व खरा उतरता था। उस समय जनसंघ में पैसे या धन की फर्जी सदस्यता का स्थान नहीं था, यह बात जरूर है कि उनकी पार्टी के प्रत्याशियों के चुनाव के लिये व्यापारी वर्ग के लोग भरपूर सहयोग करते थे क्योंकि वह व्यापारियों की पार्टी मानी जाती थी। कालान्तर में केवल कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर जो यद्यपि बंद संगठन की पार्टी थी परंतु कैडर बेस पार्टी थी और उसकी सदस्यता संख्या में भले ही कम हो परंतु नियम, कायदों व गुणवत्ता में प्रमाणित थी। 1962-67 के बाद तो लगभग सभी राजनैतिक दलों में खुली मेम्बरशिप का काम शुरू हुआ और सदस्यता की नीतिगत प्रतिबद्धता, सदस्यों की वैचारिक प्रतिबद्धता लगभग पीछे छूट गई। बंद सदस्यता के संगठनों में कुछ बुराईयां आईं, उनका राजनैतिक पतन भी हुआ, जैसे प. बंगाल में सी.पी.एम.। परंतु उनका एक वैचारिक ढांचा आज भी बरकरार है, भले ही वह देश और समाज में प्रभावकारी न रहा हो परंतु मूल ढांचा तो कम से कम बचा हुआ है। जनता पार्टी तो एक बगैर संगठन के शुरू हुई थी और लगभग वैसे ही समाप्त भी हो गई थी। लोकदल और कुछ अन्य पार्टियां यथा उ.प्र. की समाजवादी पार्टी, बिहार की आरजेडी आदि कोई भी सदस्यता आधारित पार्टियां नहीं हैं। बल्कि कुछ जातियां ही इन पार्टियों की समानार्थी बन गई। भाजपा का मूल ढांचा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नियंत्रण में रहा और इस पार्टी को बनाने में उनकी ही भूमिका है। जनता पार्टी को तोड़कर भाजपा बनाना यह संघ की अपनी जरूरत भी थी और रणनीति भी थी। पार्टियों में खुली सदस्यता शुरू होने के बाद दल के पुराने वफादार साथियों का जिन्होंने कठिन समय में पार्टी को चलाया, उनकी पूछ क्रमशः घटती गई। मूल ढांचे के लोग अपने आपको उपेक्षित और अपमानित महसूस करने लगे। वे क्रमशः पीछे हटते गये और सत्ता के सहारे उपजे नव धनाढ्य तबके जो अपराध, भ्रष्टाचार व कालेधन से संपन्न बना है उसने अपने भ्रष्ट पैसे की चकाचौंध, विज्ञापनों से पार्टियों के ढांचे पर कब्जा कर लिया जो पार्टियां व्यक्ति केन्द्रित रही उनमें भी आतंरिक लोकतंत्र या परिवार की प्राइवेट कंपनियां जैसी बन गई। जहां कोई विधान, नियम कायदे नहीं हैं, बल्कि जो शीर्ष पर बैठा हुआ है वही सर्वोपरि है। उसका कहा ही पार्टी का नीति व संविधान है। 1990 के दशक तक लगभग 10 वर्ष भाजपा व संगठन के फैसले उनके मातृ संगठन आरएसएस द्वारा लिये जाते थे। परंतु 1997-98 के बाद क्रमशः भाजपा भी व्यक्ति केन्द्रित पार्टी तथा धन आधारित या उद्योगपतियों, औद्योगिक संचालित पार्टी में बदल गई और अब तो स्थिति किस चरम पतन पर पहुंची है इसकी कल्पना भी कठिन है।

  अन्य दलों के समान भाजपा में भी आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, संविधान या नीति नहीं है, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुये महाप्रभु जो फतवा जारी कर दें वही पार्टी का नियम, नीति बन जाती है। 2014 में चुनाव के पूर्व संघ ने अपनी बैठक में तय कर श्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित किया था परंतु अब स्थिति इतनी उलट है कि संघ की भाजपा के संगठन के भीतर दखल, पकड़, अनुशासन आदि सभी कुछ समाप्त हो चुका है। अब चाहे मुख्यमंत्रियों का चयन हो, चाहे नीतियों का निर्णय हो संघ का काम केवल महाप्रभु के आदेश का समर्थन करना और उसका पालन करना है। बताया जाता है कि अब संघ के संगठनात्मक ढांचे को चलाने के लिये जो विपुल राशि चाहिये, वह तो सत्ता व कारपोरेट के बैक डोर से ही मिल रही है। संघ व जनसंघ के बड़े-बड़े पदाधिकारी जो बसों या छोटे मोटे वाहनों से चलते थे, कार्यकताओं के यहां खाना खाते थे, पर अब स्थिति इतनी उलट है कि वे तीन या पांच सितारा होटलों में रुकते, बड़े-बड़े कीमती वाहनों में चलते हैं, उनके कपड़े पर सिकुड़न नजर नहीं आ सकती, कई तो दिन में तीन-तीन बार कपड़े बदलते हैं और कुछ चारित्रिक पतन भी इनके कारणों से हुआ है। कितने ही संघ के और भाजपा पदाधिकारी के, पिछले 10 वर्षों में बड़े-बड़े महल उद्योग धंधे हजारों के पटटे, जमीन की मालकियत बढ़ी है। यह थोडी सी ही आंख खेालकर देखा जा सकता है। अब तो संघ के पदाधिकारी भी आमतौर पर संघ कार्यालयों में हीं नही ठहरते, कार्यकर्ताओं के घर पर अब उन्हें खाने पर भी नहीं बुलाया जाता। क्योंकि उनकी जीवनशैली के परिवर्तन ने कार्यकर्ताओं के मन में आदर्श, त्याग की आस्था को समाप्त कर दिया है।

   श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके इशारे पर अमित शाह को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया और श्री शाह ने पार्टी के दफ्तरों और कार्यकर्ताओं को तकनीक व मशीन से लैस किया। जिलों से लेकर राजधानियों तक सत्ता के सहारे दफ्तर खड़े हो गये। ऐसे ही दफ्तर एक जमाने में याने 70 से 88 के बीच कांग्रेस पार्टी के सत्ता के सहारे उसने भी बनाये थे। और प. बंगाल, केरल एवं दिल्ली आदि में वामपंथी पार्टियों ने भी बनाये। परंतु एक बात स्पष्ट है कि ज्यों पार्टियों के मकान, महलों में तब्दील हो रहे, त्यों-त्यों पार्टियां सिकुड़कर ताबूत में बंद हो रही हैं। हो सकता है कि भाजपा के वह दिन आ जायें।

   श्री अमित शाह ने अध्यक्ष बनने के बाद सदस्यता का आवेदन, पार्टी के नीति सिद्धांत, चरित्र आदि के सभी कालम बंद कर दिये और एक नये प्रकार की सदस्यता शुरू की वह थी मिस कॉल सुविधा। बस आप एक मिस कॉल कीजिये व पार्टी के सदस्य बन जायेंगे। पार्टी के पदाधिकारियों ने आपको जाना, पहचाना, न पृष्ठभूमि को जाना बस मिस कॉल से सदस्य बन गये। इस मिस कॉल के तरीके ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को ही लगभग पैसा, अवसर में तब्दील कर हास्यास्पद बना दिया। 2019  तक इस मिस कॉल का दौर भी समाप्त हुआ और अब एक प्रकार की नई सदस्यता शुरू हुई है पर पटका सदस्यता। याने आपको एक पार्टी के चिन्ह वाला पटका गले में डाल दिया जायेगा व आप पार्टी के सदस्य बन जायेंगे। जैसे एक जमाने में वरमाला विवाह होते थे कि वरमाला डालो और विवाह हो गया। वही स्थिति आजकल राजनैतिक दलों में हो गई और लगभग सभी बड़े दलों में यही चलन हो गया। चाहे भा.ज.पा. हो, चाहे कांग्रेस, चाहे स.पा., चाहे रा.ज.द., चाहे जद(यू), शिवसेना, या टी.एम.सी. बस एक पटका डालने की आवश्यकता है। इस बार के लोकसभा के चुनाव के पहले बड़ी संख्या में दल बदल हुये हैं और वह सभी पटका सदस्यता के आधार पर हो गये। कुछ लोगों ने महीने-पंद्रह दिन में ही दो-दो बार पटके डाल दिये, याने आने व कहीं और जाने का पटका। भाजपा ने जहां एक तरफ अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में अबकी बार 400 पार का नारा लगवाया वहीं दूसरे दलों को हतोत्साहित करने के लिये दूसरे दलों के लोगों को भाजपा में शामिल करने का अभियान चलाया। श्री अमित शाह के नेतृत्व में यह अभियान शुरू हुआ और  भाजपा के संगठन में राज्य स्तर पर नई भर्ती प्रकोष्ठ खोल दिये गये। जिनके बाकायदा संयोजक भी बना दिये गये। मप्र में पूर्व गृहमंत्री श्री नरोत्तम मिश्रा को इस भर्ती प्रकोष्ठ का मुखिया बनाया गया। तथा कुछ दिनों पहले उन्होंने यह जानकारी दी कि लगभग 4 लाख लोग कांग्रेस व अन्य दलों को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये। इस पटका सदस्यता से जहां एक तरफ यह वातावरण बना कि सारे दल समाप्त हो रहे हैं केवल भाजपा ही बच रही है और दूसरी तरफ इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भाजपा के मूल संगठन के लोग भयभीत हो गये और अपने अस्तित्व को लेकर निराश हो गये। जब लोकसभा के प्रथम चरण 19 अप्रैल को हुए मतदान का प्रतिशत 6 से 8 प्रतिशत तक घटा तब इस पटका सदस्यता और उसके दुष्परिणाम पर ध्यान दिया गया व चर्चा शुरू हुई कि अगर 4 लाख लोग इस पटका सदस्यता से सदस्य बने हैं तो यदि एक व्यक्ति मात्र 50 वोट भी गिरवाये तो लगभग 2 करोड़ वोट याने 25 प्रतिशत से अधिक वोट पिछले चुनाव से अधिक गिरना चाहिये। अगर पटका सदस्यों ने अपने परिवार के ही वोट डलवाये होते तो लगभग 25 लाख से अधिक वोट गिरते, याने मत प्रतिशत का लगभग 1 प्रतिशत या हो रहे मतदान का लगभग 2 प्रतिशत। प्रथम व द्वितीय चरण के मतदान ने जहां इस पटका सदस्यता की असलियत सामने ला दी है वहीं संगठन के पुराने ढांचे की पूछपरख कुछ बढ़ी है।

मैं भाजपा कांग्रेस या अन्य किसी दल को कोई सलाह नहीं देना चाहता व अधिकारी भी नहीं हूं परंतु इतना अवश्य कहूंगा कि मिस कॉल से लेकर पटका सदस्यता तक राजनीति को विचारहीनता, सैद्धांतिक प्रतिबद्धता, संगठनात्मक वरिष्ठता व नीति विमुखता का जो नया दौर पैदा हुआ है। ये मैं देश में राजनैतिक दलों व लोकतंत्र का माखौल बनाकर छोड़ेगा व अंततः राजनैतिक दल भी नीतिविहीन, आचारविहीन, पतनोन्मुख समूह बनकर रह जायेंगे।

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।