
नई दिल्ली, 04 फरवरी।पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने अहम रुख अपनाते हुए निर्वाचन आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने इस मामले में नौ फरवरी तक जवाब मांगा है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग करते हुए आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया के जरिए पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है और इससे आम नागरिकों के मताधिकार का हनन हो रहा है। उन्होंने इसे “लोकतंत्र की रक्षा” से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि पात्र नागरिकों का नाम मतदाता सूची में बने रहना अनिवार्य है और किसी भी निर्दोष व्यक्ति को इससे वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को विस्तृत दलीलें रखने की अनुमति दी गई। बनर्जी ने कहा कि उन्होंने इस विषय में निर्वाचन आयोग को छह पत्र लिखे हैं, लेकिन उन्हें कहीं से भी न्याय नहीं मिला। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पश्चिम बंगाल में कड़े मानक अपनाए जा रहे हैं, तो असम जैसे राज्यों में वही प्रक्रिया क्यों नहीं लागू की जा रही।
वरिष्ठ अधिवक्ता दीवान ने अदालत को बताया कि अब तक लगभग 1.36 करोड़ मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगतियों’ के आधार पर नोटिस जारी किए जा चुके हैं। इन विसंगतियों में माता-पिता के नामों का मेल न होना, आयु में असामान्य अंतर और नामों की वर्तनी संबंधी त्रुटियां शामिल हैं। उन्होंने कहा कि कई मामलों में नाम गलत लिखे गए हैं, जिन्हें आसानी से सुधारा जा सकता था।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बंगाली भाषा के उच्चारण और बोलचाल के कारण नामों की वर्तनी में त्रुटियां होना आम बात है। पीठ ने यह भी कहा कि मतदाता सूची संशोधन के दौरान प्रवासन जैसे मामलों पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इससे पात्र व्यक्तियों का नाम हटाया नहीं जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा और अन्य दस्तावेजों की मांग की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कई जीवित नागरिकों को मृत घोषित कर दिया गया है।
वहीं, निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने एसआईआर की निगरानी के लिए पर्याप्त वरिष्ठ अधिकारियों की सेवाएं उपलब्ध नहीं कराईं और अधिकांश कार्य निम्न श्रेणी के कर्मचारियों के भरोसे छोड़ा गया।
हालांकि मुख्यमंत्री बनर्जी ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने निर्वाचन आयोग की हर मांग को पूरा किया है।
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 19 जनवरी को निर्देश दिया था कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और नागरिकों को असुविधा से बचाने वाली होनी चाहिए। साथ ही ‘तार्किक विसंगतियों’ की सूची ग्राम पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने के निर्देश भी दिए गए थे।
ममता बनर्जी पहले भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखकर एसआईआर को “मनमाना और त्रुटिपूर्ण” बताते हुए इसे रोकने की मांग कर चुकी हैं। उनका कहना है कि मौजूदा स्वरूप में यह प्रक्रिया जारी रही तो इससे बड़े पैमाने पर मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित किया जा सकता है, जो लोकतंत्र की बुनियाद पर सीधा हमला होगा।
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