अक्सर हम किडनी की बीमारी को केवल शरीर की कार्यक्षमता तक ही सीमित मानते हैं, लेकिन एक नए अध्ययन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। शोध के अनुसार, क्रॉनिक किडनी डिजीज केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि हमारी बौद्धिक क्षमता को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
किडनी और दिमाग के बीच का गहरा संबंध
‘द जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन नेटवर्क ओपन’ में प्रकाशित इस शोध में पाया गया कि जैसे-जैसे क्रॉनिक किडनी डिजीज बढ़ता है, वैसे-वैसे इंसान की बौद्धिक क्षमता में गिरावट आने लगती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस बीमारी से पीड़ित लोगों को किसी काम पर ध्यान केंद्रित करने में समस्या होती है और उनके काम करने की गति भी धीमी हो जाती है। दरअसल, क्रॉनिक किडनी रोग में किडनी लंबे समय तक रक्त को सही तरीके से शुद्ध नहीं कर पाती, जिसका नकारात्मक असर दिमाग पर पड़ता है।
हजारों लोगों पर किया गया शोध
इस महत्वपूर्ण अध्ययन के लिए अमेरिका की तुलाने विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं ने एक व्यापक जांच की। इसमें 21 से 79 वर्ष की आयु वर्ग के 5,600 से अधिक प्रतिभागियों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने इन लोगों के रक्त और मूत्र के नमूनों का विश्लेषण किया और लगातार छह वर्षों तक उनकी बौद्धिक कार्य क्षमता का मूल्यांकन किया।
हाई ब्लड प्रेशर बनता है बड़ी वजह
शोध टीम ने उन शारीरिक प्रक्रियाओं की भी पहचान की है जो किडनी रोग को मस्तिष्क की शिथिलता से जोड़ती हैं। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि क्रॉनिक किडनी डिजीज के कारण मरीज का ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। इसी बढ़े हुए रक्तचाप और बीमारी की प्रगति के कारण मरीजों की बौद्धिक क्षमता में हानि का जोखिम बढ़ जाता है।
डिमेंशिया का बढ़ता खतरा
यह अध्ययन एक और गंभीर चेतावनी देता है। साक्ष्यों से पता चलता है कि सामान्य आबादी की तुलना में, जो लोग लंबे समय से किडनी की समस्या से जूझ रहे हैं, उनमें डिमेंशिया होने का संबंध अधिक प्रमुखता से देखा गया है। यह स्पष्ट करता है कि किडनी का स्वास्थ्य सीधे तौर पर हमारे मस्तिष्क के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।
CG News | Chhattisgarh News Hindi News Updates from Chattisgarh for India