Home आलेख यूसीसी पर छत्तीसगढ़ का कदम: न्याय की राह या सामाजिक चुनौती?                                                         

यूसीसी पर छत्तीसगढ़ का कदम: न्याय की राह या सामाजिक चुनौती?                                                         

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                                        -अशोक कुमार साहू

उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब तीसरे भाजपा शासित राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ ने भी समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code—UCC) लागू करने की दिशा में निर्णायक पहल कर दी है। राज्य मंत्रिपरिषद ने इस उद्देश्य से एक उच्चस्तरीय समिति के गठन को मंजूरी दे दी है, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई करेंगी। यह समिति यूसीसी का प्रारूप तैयार करेगी और इसके लिए व्यापक स्तर पर सुझाव एकत्र करेगी। समिति के अन्य सदस्यों के चयन का अधिकार मुख्यमंत्री को सौंपा गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सरकार इस विषय को गंभीरता और प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाना चाहती है।

    वर्तमान में छत्तीसगढ़ में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण, भरण-पोषण और पारिवारिक विवादों जैसे विषयों में अलग-अलग धर्मों के आधार पर विभिन्न पर्सनल लॉ लागू होते हैं। यह व्यवस्था कई बार न्यायिक प्रक्रिया को जटिल बनाती है और समानता के सिद्धांत को प्रभावित करती है। सरकार का मानना है कि यूसीसी लागू होने से कानून व्यवस्था अधिक सरल, पारदर्शी और न्यायसंगत बनेगी। साथ ही यह महिलाओं और वंचित वर्गों को अधिक अधिकार देकर लैंगिक समानता को भी सुदृढ़ करेगी।

     गठित की जाने वाली समिति राज्य के नागरिकों, सामाजिक संगठनों और विषय विशेषज्ञों से व्यापक परामर्श करेगी। इसके लिए एक वेब पोर्टल के माध्यम से भी सुझाव आमंत्रित किए जाने की संभावना है, ताकि अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। समिति द्वारा प्रस्तुत सिफारिशों के आधार पर तैयार प्रारूप को विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत मंत्रिपरिषद की मंजूरी के बाद विधानसभा में प्रस्तुत किया जाएगा।

    हालांकि, इस पूरी कवायद के बीच सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा राज्य की लगभग 32 प्रतिशत आदिवासी आबादी को लेकर है। फिलहाल सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि आदिवासी समुदाय को यूसीसी के दायरे में शामिल किया जाएगा या उससे बाहर रखा जाएगा। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट परंपराएं, रीति-रिवाज, खान-पान और सामाजिक ढांचा होता है, जो मुख्यधारा के कानूनों से काफी अलग होता है। ऐसे में उन्हें एक समान कानूनी ढांचे में समाहित करना किसी भी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है।

   मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए विशेष रूप से आदिवासी समुदाय को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि यदि यूसीसी लागू किया गया, तो इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव आदिवासी समाज पर पड़ सकता है। उन्होंने यह सवाल उठाया है कि क्या पेसा कानून यथावत रहेगा, क्या पांचवीं अनुसूची के तहत पंचायतों को प्राप्त अधिकार सुरक्षित रहेंगे, और क्या विशेष संरक्षित जनजातियों—जैसे बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, अबुझमाड़िया, भुंजिया और पांडा—को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण में कोई बदलाव नहीं होगा। इसके अतिरिक्त उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या आदिवासियों के सामुदायिक भूमि अधिकारों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

  समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए, धर्म या समुदाय की परवाह किए बिना, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और संपत्ति से संबंधित मामलों में एक समान कानून लागू करना है। इसका उद्देश्य कानून के समक्ष समानता को बढ़ावा देना है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को यह निर्देश दिया गया है कि वह सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करे। यह विषय लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है और भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चुनावी वादों में शामिल रहा है।

   संविधान सभा में इस मुद्दे पर हुई बहस में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था।वरिष्ठ पत्रकार राज खन्ना की किताब ..इंडिया अर्थात भारत.. के अनुसार संविधान सभा में इस मसले पर हुई चर्चा में डॉ.आंबेडकर ने कहा था, ” हमारे देश में धर्म का दायरा जन्म से मृत्यु तक फैला है। यहां ऐसी कोई चीज नहीं है, जो धर्म न कही जाय। अगर हम निजी कानूनों की रक्षा करते हैं तो सामाजिक परिवर्तन के मामलों में हमें यथास्थितिवादी बनकर रहना होगा। यह कोई असाधारण बात नहीं है कि हम धर्म की सीमा निर्धारित करें। जिस समान नागरिक संहिता की जरूरत को सुप्रीम कोर्ट कई मौकों पर निर्देशित कर चुका है ,उसकी जरूरत संविधान निर्माण के दौरान ही अनुभव की गई थी। तब आंबेडकर ने इस ओर इशारा किया था, ”  धर्म को उन रीति रिवाजों तक सीमित किया जाए जो मूलतः धार्मिक हैं। यह आवश्यक नहीं है कि उत्तराधिकार और स्वामित्व के कानून भी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर निर्धारित हों।”

   भारत में गोवा एक ऐसा राज्य है जहां ऐतिहासिक रूप से नागरिक संहिता लागू है। हालांकि यह पूर्ण रूप से समान नागरिक संहिता नहीं है, क्योंकि इसमें कुछ समुदायों के लिए विशेष प्रावधान मौजूद हैं। स्वतंत्रता के बाद उत्तराखंड पहला राज्य बना जहां जनवरी 2025 से यूसीसी लागू हुआ। इस कानून में अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से संबंधित मामलों में समान नियम लागू किए गए हैं। साथ ही बहुविवाह पर प्रतिबंध और लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण भी शामिल है। इसमें विवाह के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित की गई है और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों के लिए पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। नियमों का उल्लंघन करने पर दंड का भी प्रावधान है।

     मार्च 2026 में गुजरात विधानसभा ने भी यूसीसी विधेयक पारित किया, जिससे वह उत्तराखंड के बाद यह कानून लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया। गुजरात में भी यह कानून विवाह, तलाक, संपत्ति और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में समान नियम लागू करता है। इसमें बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध और लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण शामिल है। यहां भी अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

     इन दोनों राज्यों के अनुभव छत्तीसगढ़ के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं, विशेषकर तब जब यहां आदिवासी आबादी का प्रतिशत अधिक है। उत्तराखंड में जहां अनुसूचित जनजातियों की आबादी लगभग 2.9 प्रतिशत है, वहीं गुजरात में यह आंकड़ा लगभग 14.8 प्रतिशत है। इसके मुकाबले छत्तीसगढ़ में आदिवासी आबादी लगभग 32 प्रतिशत है, जो इस मुद्दे को और अधिक जटिल और संवेदनशील बना देता है।

    छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा गठित की जाने वाली समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह समानता और विविधता के बीच संतुलन स्थापित करे। एक ओर संविधान की भावना के अनुरूप समान कानून की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर देश की सांस्कृतिक विविधता और आदिवासी समुदायों के विशेष अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

    स्पष्ट है कि समान नागरिक संहिता केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। इसे लागू करते समय संवेदनशीलता, संवाद और सहमति को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। छत्तीसगढ़ की यह पहल तभी सार्थक मानी जाएगी जब यह समानता के सिद्धांत को मजबूत करते हुए विविधता के सम्मान को भी अक्षुण्ण रख सके।

सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।