न्यायपालिका ही विश्वास का आखिरी केंद्र – रघु ठाकुर

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने शालेय शिक्षा के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम में शामिल पुस्तक में न्यायपालिका के संबंध में जो लेख प्रकाशित किया है,उसे लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय व मुख्य न्यायाधीश महोदय काफी विचलित हुए। सार्वजनिक रूप से की गई टिप्पणियों में उन्होंने एनसीईआरटी की पुस्तक में इस लेख के प्रकाशन पर न केवल आपत्ति की है बल्कि सार्वजनिक रूप से उसे न्यायपालिका के सम्मान पर सुनियोजित हमला माना है। उन्होंने यह भी कहा कि इसे क्षम्य नहीं माना जा सकता।भारत के मुख्य न्यायाधीश की सार्वजनिक प्रतिक्रिया के बाद सरकार सक्रिय हुई। एनसीईआरटी ने उस लेख को हटाने की घोषणा की और लिखित रूप से सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगी। उस माफी का सार्वजनिक प्रकाशन भी हुआ। इसके बावजूद मुख्य न्यायाधीश महोदय संतुष्ट नजर नहीं आए। उन्होंने ऐसे संकेत दिए हैं कि इसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। स्वाभाविक था कि उनकी भावना व तेवर देखकर भारत सरकार इसका संज्ञान लेती। प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल की बैठक में उल्लेख करते हुए कहा कि यह गंभीर घटना है इस पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। याने किसी एक व्यक्ति या कुछ लोगों को जिम्मेदार ठहरा कर दंडित किया जाना संभावित तय है।
एनसीईआरटी संसद द्वारा पारित कानून के तहत गठित एक स्वतंत्र इकाई है जिसे देश के शिक्षण संस्थानों के लिए पाठ्यक्रम तय करने का दायित्व दिया गया है। एनसीईआरटी ने पाठ्यक्रम के लिए लेख चुनने हेतु एक कमेटी बनाई थी जिसमें श्री सुमित पंत और श्रीमती सुधा मूर्ति भी शामिल है। सुधा मूर्ति श्री नारायण मूर्ति की पत्नी हैं और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री श्री सुनक की सास है। शायद इसी वजह से उन्हें भारत सरकार ने राज्यसभा में मनोनीत किया है। वैसे भी पाठ्यक्रम निर्धारण समिति के सभी सदस्य परिषद द्वारा नामजद होते हैं और प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से वे सरकार के नामजद जैसे होते हैं। अगर इस समिति ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के विषय को शामिल किया है और यदि यह गलत है तो इसकी जवाबदारी भले ऊपरी तौर पर या सामने से समिति या परिषद की नजर आती हो पर यह जवाबदारी भारत सरकार तक भी जाती है।
हालांकि मैं इस लेख के प्रकाशन में कुछ भी अनुचित या न्यायपालिका के सम्मान को गिराने वाला नहीं मानता। इस लेख में छापा गया है कि न्यायपालिका के जजों के खिलाफ 8600 शिकायत प्राप्त हुई हैं। लगभग 50 लाख प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। कई करोड़ प्रकरण न्यायालयों में विचारार्थ लंबित है। यह संख्या भी तब है जब उच्चतम न्यायालय की पहल पर सरकार ने लोक अदालत का कानून पारित किया है। लाखों सामान्य या छोटे मामले लोक अदालत में हल किये जा रहे हैं। हालांकि लोक अदालत की कार्यवाही को जहां तक मैंने देखा और समझा है वह न्याय की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। बिजली, पानी, ट्रैफिक, छोटे-मोटे कर्ज आदि जो विषय लोक अदालत में चिह्नित किए गए हैं वह लोक अदालत के जज साहब के सामने निर्धारित तिथि पर प्रस्तुत किए जाते हैं। लोक अदालत की तारीख की सार्वजनिक घोषणा की जाती है। बहुत सारे मामलों में तो आपस में विभाग और पक्षकार मिलकर मामला निपटाते हैं। अनेक ऐसे प्रकरण होते हैं जिन्हें पक्षकार लड़ना चाहता है परंतु लंबी-लंबी तारीखों में पेशियों करने अपील दर अपील लड़ते-लड़ते जब न्याय नहीं मिलता तो थक कर समर्पण कर देता है और लोक अदालत के समझौते के नाम पर स्वीकृति देता है।
लंबित प्रकरण निपटाने के लिए शीर्ष न्यायालयों ने पिछले दिनों चेंबर हियरिंग की प्रथा भी शुरू की जिसमें हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वालों या उनके वकीलों को सुने बगैर ही न्यायाधीश फैसला कर देते हैं। फैसला क्या होता है ,बल्कि अधिकांश मामले खारिज कर दिए जाते हैं। ये चेम्बर हियरिंग वस्तुतः न्यायिक प्रक्रिया को स्वतः न्यायालय द्वारा खंडित करना है।सामान्य आम आदमी और गरीबों के फैसलों के लिए लोक अदालत हैं लेकिन अमीरों के अरबों खरबों के बैंक चोरी के मामलों के लिए आर्बिट्रेशन सिस्टम है जिसमें सेवानिवृत न्यायाधीश को आर्बिट्रेटर बनाया जाता है। वे पंचायत कर अरबों खरबों के मामले निपटा देते हैं। अगर आर्बिट्रेशन कमेटी के निर्णयों की समीक्षा की जाए तो बहुत सारे प्रश्न खड़े होंगे। सरकारी धन के चोरी या न-अदायगी के जिम्मेदार लोग बड़े आर्थिक और कारावास के दंड से बच जाते हैं।
याचिकाओं के नाम पर प्रतिदिन कई घंटे माननीय सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के व्यय होते हैं जिनमें उन पर मार्मिक टिप्पणी होती है परंतु फैसले नहीं होते। पता नहीं अदालतों ने कभी इस पर विचार क्यों नहीं किया। उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था और कार्य वितरण के खिलाफ तो कितनी ही बार आवाज उठी है। उच्चतम न्यायालय के ही चार न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ राजधानी दिल्ली में पत्रकार वार्ता की थी, जो सारे देश की मीडिया में प्रमुखता से छपी थी। बाद में पत्रकार वार्ता करने वाले न्यायाधीशों में से एक भारत के मुख्य न्यायाधीश भी बने। परंतु इतनी बड़ी घटना से माननीय उच्चतम न्यायालय की साख और सम्मान पर चोट नहीं पहुंची। कुछ दिनों पूर्व पुणे के एक लॉ कालेज में बोलते हुए स्वतः सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश श्री उज्जवल भुयान ने सरकार के कहने पर हाईकोर्ट जज के ट्रांसफर करने को कालेजियम का गलत निर्णय सार्वजनिक रूप से कहा, पर क्या इससे कोर्ट के सम्मान पर चोट नहीं पहुंची? जो पाठ पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था वस्तुतः उसमें न्यायपालिका के खिलाफ कुछ भी नहीं है। केवल वे सूचनाएं दर्ज की गई हैं जिन्हें संसद में एक प्रश्न के उत्तर में भारत के विधिमंत्री ने बताया था। ये सूचनाएं देश के सभी अखबारों व मीडिया में पहले भी आई हैं।
मैं न्यायपालिका का पूरा सम्मान करता हूं। चाहता हूं कि न्यायपालिका की साख सुरक्षित रहे। मैंने लगातार कई कई लेखों में लिखा भी है कि देश की जनता के समक्ष सरकार अविश्वसनीय है, संसद पर भरोसा नहीं, नौकरशाही पर भरोसा नहीं, केवल न्यायपालिका ही विश्वास का आखिरी केंद्र है। यदि न्यायपालिका से विश्वास उठेगा तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा होगा। लोग हिंसा की ओर मुड़ेंगे और उसके लिये लाचार होंगे।
हालांकि मैं यह भी मानता हूं कि एक नागरिक के नाते न्यायपालिका की कार्यपद्धति पर चर्चा या टिप्पणी करना एक नागरिक का अधिकार है जिसे दबाना या रोकना लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के अधिकार को सिकोड़ना या सीमित करना होगा। अगर देश के छात्रों को यह मालूम हो जाए कि न्यायपालिका के जजों के खिलाफ कितनी शिकायतें लंबित है या कितने प्रकरण सुनवाई के लिए लंबित हैं तो इसमें न्यायपालिका का क्या बिगड़ने वाला है। यह तो और भी अच्छा होता कि लोग न्यायपालिका के प्रति और अधिक सजग होते। शायद प्रत्युत्तर में न्यायपालिका भी अपने दायित्व को और अधिक जिम्मेदारी के साथ पूरा कर पाती या करने के लिए प्रेरित होती।
यह भी सोचना होगा कि पिछले दशकों में कितने ऐसे प्रकरण मीडिया में आए हैं जिनमें माननीय न्यायाधीशों पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। कई के खिलाफ संसद में महाभियोग भी आया और राजसत्ता तथा न्यायपालिका के मिले-जुले प्रयास से उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई या फिर संसद और न्यायपालिका दोनों चुप हो गईं। अभी कुछ समय पहले दिल्ली उच्च न्यायालय के जज माननीय वर्मा के घर रूपयों का ढेर पाया गया। यहां तक की सर्वोच्च न्यायालय की जांच समिति ने भी इसके लिए जज साहब को जिम्मेदार माना। पर अभी तक उनके खिलाफ न कोई कार्रवाई हुई न वह गिरफ्तार हुए न उन्हें जेल में डाला गया। माननीय न्यायाधीश महोदय कल्पना करें कि ऐसी घटना किसी अन्य के साथ होती तो शासन व न्यायपालिका का क्या व्यवहार होता। मामले के गुण दोष पर टिप्पणी किए बगैर मैं इतना तो इंगित करना ही चाहता हूं कि श्री लालू प्रसाद यादव, श्री संजय सिंह, श्री हेमंत सोरेन, श्री अरविंद केजरीवाल, श्री डी राजा, श्री मनीष सिसोदिया और कितने ही ऐसे अन्य नाम लिखे जा सकते हैं जिनके घर से एक रुपया भी प्राप्त नहीं हुआ परंतु महीनों या सालों न्यायपालिका के आदेश से जेल में रखे गए। माननीय न्यायाधीश के घर से बड़ी संख्या में रुपए प्राप्त हुए। वे स्वस्थ और सकुशल है। इससे न्यायपालिका की साख बढ़ी है या घटी है? इसका फैसला स्वयं न्यायपालिका को करना होगा।
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय की टिप्पणी से पहले देश में शायद ही किसी को पता होगा कि इस किताब के पाठ में क्या छपा है? आज देश के करोड़ों लोगों की जुबान पर उस पाठ की चर्चा है। छिपाने से या हटाने से और अधिक प्रचार होता है। अगर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर टिप्पणी और कार्रवाई के बजाय इसे लोकतांत्रिक तरीके से लिया होता तथा अपनी ओर से एक सूचना जारी करते की उस पाठ्यक्रम में यह भी शामिल कराया जाए कि जो शिकायतें मिली है उनमें कितनों की जांच हुई, कितनी सही या गलत पाई गईं ,जो सही पाई गईं उन पर दोषियों को क्या दंड मिला, इससे न केवल न्यायालय की निष्पक्षता व संवैधानिक उत्तरदायित्व की पूर्ति होती बल्कि साख भी बढ़ती। मैं अभी भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय से अपील करूंगा कि वे पाठ्यक्रम को हटाने व दंड देने की भाषा के बजाय इसे सूचना के रूप में देखें व न्यायपालिका की ओर से एक टिप्पणी प्रकाशित करने भेजें। यह शायद उच्चतम न्यायालय की साख को न केवल सुरक्षित रखेगा बल्कि बड़ी ऊंचाई पर ले जाएगा। हाँ इस पाठ के शीर्षक को अवश्य बदला जाना चाहिए, क्योंकि शीर्षक, आक्रमक व गलत संदेश देता है परंतु शायद शीर्ष कोर्ट तो अपनी ही पीठ को हटाना चाहता है एनसीआरटी ने दो सदस्यीय समिति इसके पुनरीक्षण के लिए बनाई पर उसने भी थोड़ा स्वरूप बदलकर वही पाठ छापने को दिया। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महोदय, इस पर भी आक्रोशित हैं और कुल मिलाकर न्यायपालिका स्वतः ही अपने आपको संदिग्ध बना रही है।
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।




