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शुचिता की आड़ में संविधान संशोधन एक अधिकारवादी तंत्र स्थापना की कोशिश – रघु ठाकुर

(रघु ठाकुर)

भारत सरकार ने अचानक पिछले 20 अगस्त को संसद में एक बिल प्रस्तावित किया जिसे 130 वां संविधान संशोधन विधेयक 2025 बताया गया। इस संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से यह प्रस्तावित किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति जो किसी संवैधानिक पद पर है गिरफ्तार किया जाता है और 30 दिन में वह जमानत या अन्य कारण से जेल के बाहर नहीं आता तो उसे अपने पद से हटा हुआ माना जाएगा।

   संशोधन विधेयक पेश करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि यह विधेयक सार्वजनिक जीवन में शुचिता लायेगा और इसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को भी कोई छूट नहीं है। यानी यह निष्पक्ष विधेयक है। इस विधेयक का प्रतिपक्षी दलों ने विरोध किया। आमचलन के अनुसार जोरदार हंगामा हुआ और विधायक को विचारार्थ संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। इस संयुक्त संसदीय समिति में कुल 29 लोग होंगे और संसदीय परंपरा के अनुसार स्वाभाविक है कि इसमें सत्ता पक्ष के लोग उसकी संख्या की तुलना के अनुसार ज्यादा होंगे। इस समिति को संसद के अगले सत्र के पहले दिन अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना है।

  प्रतिपक्षी दलों का कहना है कि यह संशोधन संविधान के अंतर्गत विरोधी दलों की सरकारों को अस्थिर करने और उन्हें भयभीत करने के उद्देश्य से लाया गया है। विरोधी दलों का संशय भी निराधार नहीं है और सत्ता पक्ष के लिए पिछले दिनों की कुछ घटनाएं मजबूत तर्क के रूप में है। जिन्हें उद्धृत करते हुए गृहमंत्री श्री शाह ने संसद में कहा कि कुछ लोग जेल से सरकार चलाते हैं। मुख्यमंत्री या मंत्री के पद पर रहते हुए जेल जाने पर भी इस्तीफा नहीं देते और नैतिक मानदंडों का पालन नहीं करते। उन्होंने यह भी बताया कि जब मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ तो मैंने इस्तीफा दे दिया था और मुकदमे के खात्मे के बाद ही पुनः सरकार में आए। एक अर्थ में उनका यह कहना सही है कि वर्ष 2020 तक यह परंपरा रही है कि अगर कोई मंत्री गिरफ्तार होता था तो वह इस्तीफा देता था। क्योंकि एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति किसी अपराध के संशय में जेल में जाता है तो उसका पद पर बने रहना संवैधानिक परंपरा और नैतिकता के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। इस संशोधन विधेयक के पेश होने के बाद सारे देश में और मीडिया में भी बहस चल रही है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री ए. के. पटनायक ने भी इस विधेयक को असंवैधानिक बताया है और  उनका मत है कि सर्वोच्च न्यायालय इसे खारिज करेगा ऐसा उनका मत है। उन्होंने यह भी कहा है कि केंद्र के हाथ में सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां हैं जो सुनिश्चित कर सकती है कि किसी मुख्यमंत्री या मंत्री को कितने दिन जेल में रखना है। इससे केंद्र सरकार मुख्यमंत्री या मंत्रियों का पद छीन सकेगी। यदि सरकार कमजोर हुई तो मुख्यमंत्री के हटते ही डगमगा जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि अतीत में देखा गया है कि कई मुख्यमंत्री या मंत्री 30 दिन  से अधिक जेल में रहे लेकिन उनके खिलाफ आज तक आरोप सिद्ध नहीं हुआ। दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी कहा कि अगर कोई मंत्री और मुख्यमंत्री बरी होते हैं तो झूठा फसाने वाले उन अधिकारियों व एजेंसियों के मुखिया और सरकार के पीएम सीएम भी जेल भेजे जाएं। भाजपा की ओर से अधिकृत या अनाधिकृत रूप से राज्यसभा के पूर्व महासचिव बी. के. अग्निहोत्री ने कहा है कि राजनीतिक शुचिता की दृष्टि से यह अच्छा कदम है। अगर कोई सिविल सर्वेंट किसी भी कारण से 48 घंटे से अधिक जेल में रहता है तो सिविल सेवा के नियमों के तहत उसे निलंबित मान लिया जाता है। जमानत के बाद भी उसे बहाली के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। अगर कोई सीएम या मंत्री जेल में  रहने के चलते कुर्सी गवाता है तो पार्टी किसी और नेता को सीएम या मंत्री बना सकती है और पार्टी सत्ता में रहेगी, इसलिए इस उपाय का स्वागत किया जाना चाहिए। श्री अग्निहोत्री जी के तर्क निराधार लगते हैं। अधिकारी का निलंबन होता है और अगर उसे बहाली के लिए मशक्कत करना पड़ती है तो यह नियम कायदों की खामी है और सक्षम अधिकारियों का कदाचरण है। इस बहस को अगर बारीकी से देखा जाए तो इसका मूल कारण तो सत्ता के प्रति और सरकारी एजेंसियों के प्रति अविश्वास है जोकि स्वाभाविक ही है।

  पिछले दिनों जिस प्रकार सरकार ने ईडी सीबीआई आदि संस्थाओं का दुरुपयोग किया है उससे प्रतिपक्ष की चिंता भी निराधार नहीं कहीं जा सकती। कितना विचित्र है कि दो-दो साल तक मंत्री जेल में रहे और उसके बाद भी एजेंसी अपराध का कोई प्रमाण न दे सके और फिर स्वतःखात्मा लगा दे। होना तो यह चाहिए कि एजेंसी पहले प्रमाण जुटाए तब गिरफ्तार करे न कि प्रमाण मिलने के पहले ही गिरफ्तार करने के अवैधानिक हथियार की शक्ति का प्रयोग करे। ऐसी घटनाएं कोई एक दो नहीं है बल्कि बीसियों हैं। ऐसी भी घटनाएं सामने आई हैं कि जहां किसी विरोधी पक्ष के नेता के सत्ताधारी दल में शामिल होने के बाद उसके खिलाफ एजेंसी स्वतः अपना केस वापस ले ले और खात्मा लगा दें। महाराष्ट्र एनसीपी के नेता और शरद पवार के भतीजे श्री अजीत पवार के खिलाफ 70 हजार करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप भाजपा ने और सीबीआई ने भी लगाए थे परंतु जब वे एनसीपी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए तो सीबीआई ने खात्मा लगा दिया और श्री पवार को मंत्री बना दिया। जब वे पुनः भाजपा छोड़कर एनसीपी में चले गए तो केंद्र के इशारे पर सीबीआई ने फिर उनके खिलाफ प्रकरण शुरू करने की अर्जी लगा दी। और फिर जब वे पुनःभाजपा के समर्थन में चले गए तो न केवल उपमुख्यमंत्री हैं बल्कि इस एजेंसी ने फिर मामला वापस कर लिया। लगभग ऐसी ही घटना प्रफुल्ल पटेल की भी है जो एनसीपी के पक्ष से केंद्र सरकार में मंत्री थे। केंद्र सरकार एजेंसियों का इस प्रकार बेशर्म प्रयोग राजनीतिक भयादोहन और दल बदल करवाने के लिए करती रही है। अतः केंद्र सरकार की नियत और सत्ता की दास एजेंसियों की कार्यवाही कैसे विश्वसनीय मानी जा सकती है? जो लोग निष्पक्षता या शुचिता का तर्क दे रहे हैं वह तर्क पढ़ने और सुनने में अच्छा लगता है,परंतु देश में नौकरशाही का जो चरित्र है उसमें क्या उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री या सत्ता पक्ष के मंत्री के विरुद्ध कोई कार्रवाई करेंगे? कुल मिलाकर अभी तक के राजनीतिक अनुभव और आम तौर पर सभी सरकारों के चरित्र को देखते हुए इन प्रावधानों की शब्दावली और शुचिता के दावे पर कैसे विश्वास किया जा सकता है ? फिर दूसरा एक वैधानिक, नैतिक और तार्किक पक्ष भी है, कि क्या किसी व्यक्ति को किसी एजेंसी के द्वारा आरोपी बना दिए जाने मात्र से उसे दोषी मान लिया जाए। दोषी सिद्ध करने का अधिकार न्यायपालिका का है। अभी तक यह कानून है कि यदि किसी व्यक्ति को दो वर्ष या उससे अधिक की सजा हो जाती है तो वह पद पर रहने के अयोग्य हो जाता है परंतु इस संशोधन से तो केवल आरोप लगने पर ही व्यक्ति को अपराधी मान लिया जाएगा और पद से हटने के दंड का भागी माना जाएगा। यह संशोधन न्याय के मूल सिद्धांत के ही खिलाफ है। श्री अमित शाह का राजनीतिक जीवन आपातकाल के बाद का है परंतु उन्हें अपनी मातृ संस्था के प्रमुखों से जानना चाहिए कि जिस आपातकाल का वे विरोध करते हैं और कांग्रेस के द्वारा लगाए गए जिस आपातकाल ने उनके और उनकी पार्टी के लिए सत्ता के दरवाजे खोले हैं उसमें क्या हुआ था ? जब सरकार का आदेश हुआ कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण को, मोरारजी देसाई को गिरफ्तार करना है और आरोप बनाने और लगाने का काम सरकारी एजेंसी को करना है तो पुलिस ने जयप्रकाश नारायण को राजद्रोह का अपराधी और पुलिस तथा सेना में विद्रोह फैलाने का उत्तरदायी बता दिया था। मोरारजी देसाई को तो यह आरोप पत्र दिया गया था कि वह सरकार के टेलीफोन के खंभे पर चढ़कर तार काट रहे थे इसलिए उन्हें गिरफ्तार किया गया था। उस पुलिसकर्मी का कोई दोष नहीं है क्योंकि उसे तो झूठा आरोप लिखना है। केंद्रीय जांच एजेंसियां और पुलिस लगभग सत्ता पक्ष के सही या गलत आदेशों का पालन करने वाली बन जाती है। मेरी राय में  शुचिता और नैतिकता के लिए कानून बनाया जाए तथा कानून निम्न प्रकार का हो सकता है।

1– न्यायपालिका को 29 दिन में निर्णय देने की वाध्यता हो और उसके बाद आगामी 30 दिनों में अपीलीय न्यायपालिकाएं आवश्यक निर्णय करें। अगर न्यायपालिकाएं अंतिम अपीलीय स्तर पर किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को दोषी सिद्ध करें तब उसे इस्तीफा देने या हटाए जाने का नियम बने।

2–  यह भी कानून बने की जांच एजेंसियां गिरफ्तार करने के 7 दिन के अंदर चालान पेश करें। अगर नहीं कर पाती हैं या न्यायपालिका को संतुष्ट करने लायक प्रमाण पेश नहीं कर पाती हैं तो प्रकरण को निरस्त किया जाए।

3–  जो जांच एजेंसियां आरोप लगा रहीं हैं और अगर वे निर्णय के पूर्व यह स्वीकार करतीं हैं कि उनके पास कोई प्रमाण नहीं है, तो गिरफ्तार करने वाली एजेंसी के मुख्य अधिकारी को दंडित किया जाए।

 4– अगर न्यायपालिका अपने फैसले में यह दर्ज करती है की जांच एजेंसी ने जानबूझकर लापरवाही की है या किसी के दबाव में आकर झूठी कार्रवाई की है, तो उस एजेंसी के जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध अपराधिक प्रकरण दर्ज हो जो गैर जमानती हो।

 5– सुचिता के लिए यह भी संवैधानिक प्रावधान बने कि अगर सत्ता पक्ष अपनी सरकार के विरोधी व्यक्ति या राजनीतिक व्यक्ति पर उनकी जांच एजेंसी के द्वारा आरोप लगाने के बाद  उसे अपने पक्ष में शामिल करते हैं तो उसे राजनीतिक अपराध माना जायेगा तथा उस सत्ताधारी पार्टी को जिम्मेदार मानकर उसकी मान्यता समाप्त की जायेगी ।

 भारत सरकार के 130 वें संविधान संशोधन से जितने भयभीत विरोधी दल हैं जो स्वाभाविक भी है ,उससे ज्यादा भयभीत सत्ता पक्ष के सत्ता संचालक गुट से भिन्न सत्ता के लोग  हैं। क्योंकि इस संशोधन के हथियार का इस्तेमाल जितना प्रतिपक्ष के खिलाफ हो सकता है उतना ही सत्ता पक्ष के अंतर विरोधियों के खिलाफ भी हो सकता है। प्रतिपक्ष तो कम से कम आलोचना भी कर सकेगा पर सत्ता पक्ष का अंतरविरोधी तो यह भी नहीं कर सकेगा। यह संशोधन एक भयावह तानाशाही और लोकतंत्र के खात्मे का कारण बन सकता है ।

  बहरहाल यह संशोधन होगा या नहीं होगा यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है तथा मीडिया और जनता में चर्चा में है परंतु एक लाभ तो प्रधानमंत्री, गृहमंत्री को और उनकी पार्टी को हो ही गया है कि जो मीडिया वोट चोरी के आरोपी की चर्चाओं से भरा हुआ था अब वह इस संशोधन की आड़ में पीछे छूट गया। यह संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव एक चतुराई भरा राजनीतिक षड्यंत्र है,यह शायद प्रतिपक्ष भी नहीं समझ पाया।

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।