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कहां गए वो दिन: जब सद्भावना से भरे होते थे उम्मीदवार – अरुण पटेल

अरूण पटेल

पिछले एक दशक से तो लोकसभा और विधासभाओं के चुनाव युद्ध मानकर लड़े जाते हैं जिसमें प्रतिस्पर्धी उम्मीदवार को प्रतिद्वंद्वी न मानकर दुश्मन माना जाने लगा है और आपसी शिष्टाचार व सौजन्य तो दूर की कौड़ी हो गयी है। एक-दूसरे के चेहरों पर आरोपों की कालिख पोतने में कोई किसी से कम नहीं और एक-दूसरे के प्रति सद्भाव तो मानों अब बचा ही नहीं, बल्कि बॉडी लैंग्वेज भी ऐसी हो गयी है कि एक-दूसरे के प्रति नापसंदगी साफ-साफ झलकती है। एक समय ऐसा भी था जब एक-दूसरे का चुनाव में मुकाबला कर रहे उम्मीदवारों का आमना-सामना होता था तो दोनों पूरा सम्मान करते थे। होशंगाबाद लोकसभा क्षेत्र में ऐसे नजारे अक्सर देखने को मिल जाते थे। 1967 के आमचुनाव में प्रसिद्ध समाजवादी नेता और देश के चोटी के संसदीय परम्पराओं के ज्ञाता हरिविष्णु कामथ और कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में चौधरी नीतिराज सिंह के बीच में सीधा चुनावी मुकाबला हो रहा था, लेकिन पूरे चुनाव प्रचार के दौरान दोनों का एक-दूसरे के प्रति मित्रवत व्यवहार रहा। जब आमना-सामना होता था तो सम्मान स्वरुप कामथ के पैर छूने में नीतिराज सिंह को कोई झिझक नहीं होती थी। यह बात अलग है कि उस चुनावी मुकाबले में कामथ जो कि तत्कालीन सांसद थे, चुनाव हार गये।

वैसे हरिविष्णु कामथ 1952 से 1971 को छोड़कर 1977 तक लगातार इस क्षेत्र से चुनाव लड़ते रहे। उन्होंने 1962 और 1977 का आमचुनाव जीता। लेकिन चुनाव हारने के बाद वे चुनाव याचिका भी करते थे और संसद में उपचुनाव के माध्यम से भी एक बार संसद पहुंचे। 1967 में न केवल वे नीतिराज से चुनाव हारे बल्कि उनके विरुद्ध जो चुनाव याचिका की उसमें भी उन्हें सफलता नहीं मिली। कामथ और नीतिराज के मित्रतापूर्ण संबंध थे और चुनाव लड़ने के पूर्व वे उनकी मदद भी करते थे। नरसिंहपुर में कामथ का चुनाव कार्यालय नीतिराज सिंह के मकान पर हुआ करता था और जब दोनों आमने-सामने लड़े तब भी दोनों के चुनाव कार्यालय एक ही भवन में ऊपर-नीचे रहे। वैसे नीतिराज सिंह कामथ से चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे लेकिन अंतत: उन्हें चुनावी समर में अपने पिता चौधरी दौलत सिंह की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए लड़ना पड़ा। उनके पिताजी की इच्छा थी कि वे 1967 में लोकसभा का चुनाव लड़ें। दोनों ने चुनाव लड़ा लेकिन एक-दूसरे का पूरा सम्मान किया।

चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार एक-दूसरे की कमजोरी पर नजर रखते हैं और उसका फायदा उठाकर चुनाव जीतना चाहते हैं, लेकिन ऐसे बिरले ही होते हैं जो सामने वाले को संभलने का मौका भी देते हैं। गाडरवारा के पास की घटना है, चुनाव प्रचार के दौरान रास्ते में कामथ और नीतिराज का आमना-सामना हुआ, कुछ देर बातचीत हुई, कामथ ने इस दौरान उनसे कहा कि नीतिराज चीचली से मैं अभी आ रहा हूं वहां तुम्हारा काम बहुत कमजोर है जरा वहां ध्यान दो। सोहागपुर में कामथ साहब के समर्थन में एक चुनावी सभा चल रही थी जिसमें एक वक्ता ने कांग्रेस उम्मीदवार को लेकर कुछ तीखी टिप्पणी कर दी, कामथ ने उसे तत्काल रोका और स्वयं जाकर मंच संभाला और वक्ता की बात पर खेद व्यक्त किया एवं कहा कि हम लोग सिद्धान्तों पर चुनाव लड़ रहे हैं। चौधरी नीतिराज सिंह पेशे से वकील थे और लगातार 1967 और 1971 का लोकसभा चुनाव जीते। श्रीमती इंदिरा गांधी ने कांग्रेस विभाजन के बाद अपने मंत्रिमंडल में उन्हें सीधे शामिल कर पेट्रोलियम, केमिकल और खनिज संसाधन मंत्रालय का राज्यमंत्री बनाया, जबकि इससे पूर्व केंद्रीय मंत्रिमंडल में मध्यप्रदेश से प्रकाशचन्द सेठी और विद्याचरण शुक्ल बतौर उपमंत्री शामिल हुए थे और बाद में पदोन्नत होकर राज्यमंत्री बने थे। नीतिराज सिंह बाद में केंद्र में कानून और कंपनी मामलों के भी राज्यमंत्री रहे। 1977 में जिस परिसीमन के बाद लोकसभा चुनाव हुआ उसमें भी उन्होंने अहम् भूमिका अदा की थी। अपने मतदाताओं की नब्ज पर नीतिराज सिंह चौधरी की कितनी मजबूत पकड़ थी इसका अंदाजा 1967 के चुनाव के पूर्व उनके द्वारा बताये गये अनुमान से मिलता है, जब सोहागपुर में उनसे एक पत्रकार ने चुनावी संभावना के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि मैं नरसिंहपुर जिले से 25 हजार वोट की लीड लेकर आऊंगा, होशंगाबाद जिला मेरे लिए नया क्षेत्र है यहां का अंदाज यहां के कांग्रेस नेता बतायेंगे। यहां यह अनुमान बताया गया कि स्थिति लगभग बराबरी की है दो-ढाई हजार के मतों का अन्तर दोनों के बीच रहेगा। कामथ ने ऐसे ही सवाल का जवाब दिया कि नरसिंहपुर जिले में नीतिराज का भी प्रभाव है इसलिए मुझे लगभग 15 हजार मतों की लीड मिलेगी, लेकिन होशंगाबाद जिले से लगभग 40 हजार मतों की लीड मिलेगी और मैं आसानी से चुनाव जीत जाऊगा। जब नतीजे आये तो कांग्रेस उम्मीदवार नीतिराज सिंह को 24 हजार 600 मतों की लीड मिली और होशंगाबाद जिले में वे लगभग 18 सौ मतों से पीछे रहे, कुल मिलाकर यह चुनाव जीत गए। दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच आपसी सद्भाव इतना प्रगाढ़ रहा जो आजकल के नेताओं में बिरला हो गया।

 

सम्प्रति-लेखक श्री अरूण पटेल अमृत संदेश रायपुर के कार्यकारी सम्पादक एवं भोपाल के दैनिक सुबह सबेरे के प्रबन्ध सम्पादक है।