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कैसे तैयार होता है देश का आम बजट…

आम बजट देश के पूरे साल के खर्च का हिसाब-किताब होता है। आइए जानते हैं कि बजट तैयार (Union Budget process) कैसे होता है और इसे तैयार करते वक्त किन बातों का ध्यान रखा जाता है। बजट तैयार कर रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को किसी से मिलने जुलने की इजाजत क्यों नहीं होती। साथ ही देश के बजट से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्यों के बारे में भी जानेंगे।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जुलाई के तीसरे हफ्ते में Modi 3.0 का पहला आम बजट पेश करेंगी। यह उनका लगातार छठा पूर्ण बजट होगा। इसके साथ ही वह मोरारजी देसाई का रिकॉर्ड तोड़कर लगातार सबसे अधिक बार पूर्ण बजट पेश करने वाली वित्त मंत्री बन जाएंगी। हालांकि, अभी ओवरऑल रिकॉर्ड मोरारजी देसाई के ही नाम रहेगा, जिन्होंने कुल 10 बजट पेश किए थे।

आइए जानते हैं कि बजट तैयार कैसे होता है और इसे तैयार करते वक्त किन बातों का ध्यान रखा जाता है। बजट तैयार कर रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को किसी से मिलने जुलने की इजाजत क्यों नहीं होती। साथ ही, देश के बजट से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्यों के बारे में भी जानेंगे।

आम बजट क्या होता है?
अगर कम शब्दों में कहें, तो आम बजट वैसा ही है, जैसे कि हम अपने घरेलू खर्चों के लिए बजट बनाते हैं। हमारी जितनी कमाई होती है, उसी के हिसाब से हम अपने खर्च के लिए योजना बनाते हैं। मतलब कि बच्चों की पढ़ाई, EMI, शॉपिंग और दवाओं पर कितना खर्च होगा। अगर हमारी कमाई कम या ज्यादा होती है, तो हम उसी हिसाब से कर्ज लेने या फिर निवेश करने की योजना बनाते हैं। बजट में भी कमोबेश यही चीजें होती हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर।

संविधान के अनुच्छेद 112 के मुताबिक, केंद्र सरकार के किसी एक साल का वित्तीय ब्यौरा संघीय या आम बजट होता है। इसे केंद्र सरकार को हर साल पेश करना होता है। इससे पता चलता है कि सरकार को सालभर में कुल स्रोतों से कितना राजस्व मिला है और कुल कितनी रकम खर्च की गई है।

बजट से यह जानकारी भी मिलती है कि अगले वित्त वर्ष के लिए सरकार की योजनाएं क्या हैं। वह किस योजना पर कितना खर्च करेगी और किन तरीकों से उसका राजस्व बढ़ेगा या घटेगा। इन सबसे कुल मिलाकर देश की वित्तीय हैसियत का अंदाजा मिलता है कि वह अपने राजस्व के हिसाब से खर्चों को किस हद तक बढ़ा सकता है।

बजट बनने की शुरुआत कैसे होती है?
देश के बजट का आधार होती है, नॉमिनल जीडीपी। यह देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की मौजूदा बाजार कीमत होती है। इसी के आधार पर राजकोषीय घाटे से लेकर सरकार की आमदनी और खर्च तक की बात पता चलती है। बजट पेश करने की प्रक्रिया (Union Budget process) की बात करें, तो इसकी शुरुआत तकरीबन 6 महीना पहले से हो जाती है।

सरकार अलग-अलग प्रशासनिक निकायों से आंकड़े मांगती है, ताकि उसे पता चल सके कि किस विभाग को कितने फंड की जरूरत है। इसी से सरकार को यह भी अंदाजा होता है कि आयुष्मान भारत और स्वच्छ भारत जैसी जनकल्याण योजनाओं पर कितनी रकम खर्च करनी है। फिर उसी हिसाब से अलग-अलग मंत्रालयों के लिए फंड का बंदोबस्त किया जाता है।

बजट बनाने में किन लोगों की भूमिका रहती है?
बजट बनाने का सारा काम वित्त मंत्री की देखरेख में होता है। लेकिन, वित्त सचिव, राजस्व सचिव और व्यय सचिव की भूमिका भी काफी अहम होती है। उनकी बजट के सिलसिले में वित्त मंत्री से हर रोज बातचीत या मीटिंग होती है। अमूमन, वित्त मंत्रालय में या फिर वित्त मंत्री के आवास में। बजट बनाने वाली टीम को वित्त मंत्री के साथ प्रधानमंत्री और नीति आयोग का भी पूरा सहयोग मिलता है।

बजट टीम में अलग-अलग क्षेत्र के एक्सपर्ट भी होते हैं, जो बताते हैं कि सरकार को किस क्षेत्र पर फोकस बढ़ाना चाहिए। वित्त मंत्री बजट पेश करने से पहले तमाम उद्योग प्रतिनिधियों और संगठन के लोगों से भी सलाह मशविरा करते हैं और उसी हिसाब से नीतियां तैयार करने की कोशिश की जाती है। बजट पेश करने से पहले डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स को भी अंतिम रूप दिया जाता है।

बजट में किस तरह की जानकारियां दी जाती हैं?
सरकार बजट में अपने राजस्व और खर्च की पूरी जानकारी देती है। जैसे कि जनकल्याण योजनाओं को कितना फंड दिया जा रहा, आयात पर कितनी रकम खर्च हो रही। सरकारी कर्मचारियों को वेतन पर कितना खर्च हो रहा, सेना की कैसे फंडिंग हो रही है। सबसे बड़ी बात कि सरकार ने जो कर्ज लिया है, उसके ब्याज में कितना पैसा जा रहा है।

वहीं, राजस्व की बात करें तो इसमें सरकार टैक्स और गैर-टैक्स स्रोत से मिली रकम की जानकारी देती है। सरकार टैक्स लगाने के अलावा सरकारी कंपनियों से कमाई करती है, साथ ही बॉन्ड जारी कर राजस्व जुटाती है। विनिवेश (Disinvestment) यानी सरकारी कंपनियों या संपत्तियों में हिस्सेदारी बेचना भी सरकार की आमदनी का एक जरिया होता है।

अगर सरकार का खर्च उसके राजस्व से अधिक हो जाता है, तो इसे बजट घाटा कहते हैं। इस सूरत में सरकार अपनी आमदनी स्रोतों को बढ़ाने की कोशिश करती है, जैसे कि टैक्स या ड्यूटी बढ़ाना। वहीं, कुछ खर्चों में कटौती भी की जाती है, जिसे सरकार गैरजरूरी समझती है। बजट को नियंत्रित करने के लिए सरकार कई बार अतिरिक्त नोट छापने का भी फैसला करती है, जिससे महंगाई का खतरा बढ़ जाता है।

बजट पेश करने से पहले निभाई जाती है हलवा सेरेमनी
बजट को संसद में पेश किए जाने से 1 हफ्ते पहले उसकी छपाई शुरू होती है। इस दौरान पारंपरिक ‘हलवा समारोह’ होता है। इसमें बड़ी मात्रा में हलवा तैयार किया जाता है। इसे बजट टीम में शामिल अधिकारियों और सहायक कर्मचारियों को परोसा जाता है। यह काम खुद वित्त मंत्री के हाथों से होता है। इसे आप उस प्राचीन भारतीय परंपरा का हिस्सा समझ सकते हैं, जिसमें कोई महत्वपूर्ण काम करने से पहले मीठा खाया जाता है।

हलवा सेरेमनी के साथ ही लॉक-इन पीरियड शुरू हो जाता है। इसका मकसद बजट की गोपनीयता को बरकरार रखना होता है। हलवा सेरेमनी के बाद वित्त मंत्रालय से जुड़े कर्मचारी तभी सार्वजनिक जीवन में बाहर आ सकते हैं, जब वित्त मंत्री अपना बजट भाषण खत्म कर लें। इस दौरान उन्हें अपने परिजनों से भी बात करने की इजाजत नहीं होती। पहले यह अवधि लंबी होती थी, लेकिन 2021 से बजट का तरीका डिजिटल हो गया, तो लॉक-इन पीरियड भी कम हो गया।

इससे पहले के 40 साल यानी 1980 से 2020 तक बजट दस्तावेज एक खास प्रिटिंग प्रेस में छपते थे, जो नॉर्थ ब्लॉक यानी वित्त मंत्रालय के बेसमेंट में थी। इसका मकसद भी बजट को गोपनीय रखना था। हालाकि, 2021 से बजट पूरी तरह से डिजिटल प्रारूप में पेश किया जाने लगा है और लॉक-इन अवधि कम हो गई है। अब काफी कम दस्तावेज छापे जाते हैं और बाकी काम डिजिटल तरीके से हो जाता है।

बजट से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:

  • आजाद भारत पहला बजट षणमुगम चेट्टी ने 26 नवंबर 1947 को पेश किया था। इसमें कोई टैक्स नहीं लगाया गया था।
  • शेट्टी के बाद वित्त मंत्री जॉन मथाई ने पहला संयुक्त-भारत बजट पेश किया। इसमें रजवाड़ों का वित्तीय ब्योरा भी शामिल था।
  • 1947 से लेकर अब तक देश में 74 आम बजट, 15 अंतरिम बजट या चार खास या मिनी बजट पेश किए जा चुके हैं।
  • 1955 तक बजट सिर्फ अंग्रेजी में छपता था। बाद में इसे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में छापने की परंपरा शुरू हुई।
  • बजट प्रस्तावों को संसद की मंजूरी की जरूरत होती है। मंजूरी मिल जाने के बाद ये प्रस्ताव 1 अप्रैल से लागू हो जाते हैं।
  • मोरारजी देसाई ने वित्त मंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा दस बार बजट पेश किया, जो बाद में भारत के के प्रधानमंत्री भी बने।
  • मोरारजी देसाई के बाद सर्वाधिक बजट पेश करने का रिकार्ड पी चिदंबरम के नाम है, जिन्होंने कुल नौ बार बजट पेश किया।
  • इंदिरा गांधी पहली महिला वित्त मंत्री थीं, जिन्होंने बजट पेश किया। 1970 में पीएम के अलावा उनके पास वित्त मंत्रालय भी था।
  • 1992 के बजट में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया। विदेशी कंपनियों के लिए भारत के रास्ते खुले।
  • 1997 में पी चिदंबरम के बजट को ‘ड्रीम बजट’ कहा गया। इसमें कॉरपोरेट टैक्स और इनकम टैक्स में बड़ी कटौती की गई।
  • इसी बजट में कर प्रावधानों को तीन अलग-अलग स्लैब में बांटा गया और काले धन पर रोकने लगाने वाली प्रभावी स्कीम लगाई गई।
  • साल 2016 तक फरवरी के आखिरी दिन आम बजट पेश होता था। 2017 में इसे बदलकर 1 फरवरी कर दिया गया।
  • 2017 से पहले रेल बजट अलग से पेश किया जाता था, लेकिन 2017 में इसे आम बजट में ही मर्ज कर दिया गया।
  • मौजूदा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 2020 का बजट भाषण सबसे लंबा बजट भाषण था, करीब दो घंटे चालीस मिनट का।
  • एचएम पटेल ने बजट ने 1977 में अंतरिम बजट पेश किया था, उनका बजट भाषण सिर्फ 800 शब्दों में खत्म हो गया था।