Monday , July 15 2024
Home / MainSlide / 2024 के संसदीय चुनाव परिणाम में छिपा है जनता का संदेश – रघु ठाकुर

2024 के संसदीय चुनाव परिणाम में छिपा है जनता का संदेश – रघु ठाकुर

लोकसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं और नई सरकार का गठन भी हो चुका है। इस संसदीय चुनाव में यद्यपि भाजपा और श्री मोदी ने अबकी बार 400 पार के नारे से अभियान शुरू किया था। परन्तु मतदाताओं ने उनका नारा बदल दिया और कहा कि अबकी बार मुश्किल से पार।

  देश के जनमत ने अपना निर्णय इस प्रकार का दिया कि भाजपा को 240 और एनडीए 291 सीट ही मिली है। जनता ने प्रतिपक्ष को ताकत दी है और सशक्त विपक्षी की भूमिका निर्वाहन के लायक बनाया है। अयोध्या जिसकी चर्चा पिछले लगभग तीन दशक से राजनीति के केन्द्र में रही और इस चुनाव के पहले रामलला की प्राण प्रतिष्ठा और अयोध्या में जाकर दर्शन करने का एक सुनियोजित अभियान चलाया गया। जिससे ऐसा वातावरण बना कि शायद अब भाजपा को कोई चुनौती देने वाला नहीं है। प्रतिपक्ष के नेताओं को दर्शन न करने का अपराधी घोषित किया गया और प्रचार तंत्र से ऐसा वातावरण बना कि प्रतिपक्ष के नेता भी प्राण प्रतिष्ठा के समय अयोध्या नहीं पहुंच पाने के मामले में देश को सफाई देने लगे। परन्तु देश की जनता ने एक बार वैसा ही चमत्कारी निर्णय लिया जैसा कि सन 1977 में जनता पार्टी के पक्ष में लिया था। जनता ने नरेन्द्र मोदी की सरकार तो बनाई परन्तु उन्हें वैशाखियों पर खड़ा कर दिया और प्रतिपक्ष के मुंह पर केन्द्र सरकार ने जो दबाव की ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स की पट्टियाँ बांधी थी उन्हें खोल दिया।

ग्रामीण समाज में तो यहां तक चर्चा है कि भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और इसलिए उन्होंने सरकार और प्रतिपक्ष दोनों की मर्यादा रेखा खींच दी। ऐसा लगता था कि इस चुनाव परिणाम के बाद जिनमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तकनीकी रूप से जीते हैं परन्तु नैतिक रूप से हारे हैं। श्री नरेन्द्र मोदी अपनी राजनैतिक शैली में कुछ बदलाव लायेंगे। बनारस संसदीय क्षेत्र में उनकी जीत का अंतर 4 लाख से घटकर 1.5 लाख हो गया और वह भी तब जब उन्होंने सरकारी तंत्र का भरपूर उपयोग किया। परन्तु ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उन्होंने परिणाम को तथ्यों के आधार पर लिया है। उनकी भाषा अभी भी घमंड से भरी हुई है। उन्होंने एनडीए की संसदीय दल की बैठक में कहा कि ना हारे हैं और ना हारेंगे। यह भाषा न लोकतांत्रिक है और न विनम्रता की भाषा है। बल्कि एक प्रकार से देश के जनमत को चुनौती देती है। कांग्रेस के नेता श्री राहुल गांधी ने भी 11 जून को बयान दिया कि अगर मेरी बहिन प्रियंका गांधी लड़ी होती तो वे दो-तीन लाख मतों से जीतती। यह बयान भी अहंकारी बयान है। यदि उनका यह आंकलन था तो उन्होंने अपनी बहिन को प्रत्याशी क्यों नहीं बनाया। जबकि बनारस की कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी श्री अजय राय यह मांग कर रहे थे कि प्रियंका जी को लड़ाया जाय। श्री राहुल गांधी के बयान का तो अर्थ यह हुआ कि वे श्री नरेन्द्र मोदी को चुनाव जिताना चाहते थे इसलिए उन्होंने अपनी बहिन को उनके विरुद्ध खड़ा नहीं किया। वे भूल कर रहे हैं कि कांग्रेस की संख्या वृद्धि श्री अखिलेश यादव, श्री लालू यादव एवं श्री उद्धव ठाकरे के सहारे हुई है, वरना कांग्रेस शासित राज्यों कर्नाटक, तेलंगाना में कांग्रेस की स्थिति कमजोर ही रही है। कर्नाटक व तेलंगाना में भी भाजपा कांग्रेस को बराबर सीटें मिली। केरल में भी उन्होंने भाजपा को नहीं वरन अपने गठबंधन के सहयोगी को ही हराया है।

   हालांकि जनस्मृति को ताजा करने के लिए मैं बता दूं कि 1992 में मस्जिद के गिरने के बाद जब उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव हुए थे तब भी अयोध्या में भाजपा हारी थी। उस समय सपा और बसपा का गठजोड़ था और नारा चलता था कि मिले मुलायम कांशीराम हवा हो गये जय श्रीराम। उत्तरप्रदेश ने कभी भी राम के नाम पर राजनैतिक निर्णय नहीं किया, चाहे वह निर्णय 1993 का हो या वह 2024 का हो। श्री अखिलेश यादव ने इस बार जातीय फार्मूला को छोड़कर डॉ. लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के विचार के अनुरूप पिछड़े वर्ग का फार्मूला अपनाया। उन्होंने यादव को 5, कुर्मी को 10, कोयरी, कुशवाहा को 10, मल्लाह को तीन टिकिट दिया। और इस न्याय संगत बंटवारे ने बुंदेलखंड, अवध और पूर्वांचल जहां से भाजपा जीतती थी उसे लगभग साफ कर दिया। लोहिया, कर्पूरी फार्मूले का यह प्रभाव हुआ है कि श्री नरेन्द्र मोदी जो स्वयं विश्व नेता बनते थे, बनारस के नेता भी नहीं रहे। उनके शपथ समारोह में भी केवल दक्षिण एशिया के छोटे देशों के प्रतिनिधि ही शामिल हुए हैं।

  श्री नरेन्द्र मोदी की मानसिक बनावट के आधार पर यह माना जा सकता है कि वे अपने आपको नहीं बदलेंगे समय का इंतजार करेंगे। उनकी थोड़ी बहुत ऊपरी विनम्रता अस्थायी दिखावा है। उनके मंत्रिमंडल के गठन में भी जो पुराने मंत्री थे यथावत वापिस किये गये हैं। बल्कि वो ऐसे मंत्री हैं जो अभी किसी भी सदन के सदस्य नहीं है। जाहिर है कि यह जनमत का अपमान है। ऐसा भी लगता है कि शायद वैश्विक आर्थिक संस्थाओं के दबाव में वे उसी प्रकार है जिस प्रकार से स्व. नरसिंहराव या स्व. वाजपेयी और श्री मनमोहन सिंह थे।

  इतना अवश्य है कि इस बार शपथ के बाद वे श्री आडवानी और श्री मुरली मनोहर जोशी जिनके ऊपर वे दृष्टि भी नहीं डालते थे, से जाकर मिले। उन्होंने श्री मनमोहन सिंह से भी बात की और जिन राष्ट्रपति श्रीमति द्रोपदी मुर्मू का खड़े होकर अभिवादन भी नहीं किया था, इस बार दोनों हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया। सेगोल रूपी धर्म दण्ड की बजाय संविधान को नमन किया। अब यह तो भविष्य ही तय करेगा कि यह उनका भीतरी बदलाव है या नया मार्केटिंग का पैंतरा। यह शक इसलिए भी है कि वे इतने अधिक प्रचार आतुर हैं कि केदारनाथ मठ या विवेकानंद स्मारक शिला पर जाकर ध्यान लगाते हैं और फोटो खिंचवाकर छपवाते हैं।

  प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में तीन घटनायें हुई जिन पर उनकी चुप्पी पूर्व के समान यथावत है। एक जम्मू में मंदिर के दर्शन के लिए गये श्रद्धालुओं पर आतंकी हमला जिसमें लगभग 10 लोगों की मौत हुई, दूसरी मणिपुर में मुख्यमंत्री के काफिले पर हमला। यद्यपि इसमें मुख्यमंत्री नहीं थे, परन्तु काफी क्षति पहुंची। तीसरी नीट परीक्षा में धांधली हुई। यहां तक कि 67 विद्यार्थियों को पूरे 720 अंक प्राप्त हुए और यह विद्यार्थी केवल दो कालेजों के ही बताये जाते हैं। समूचे देश के परीक्षार्थी जिनकी संख्या लाखों में है इस घोटाले से प्रभावित हैं और परिणाम के घोषणा के बाद देशभर में आंदोलन हो रहे हैं। परन्तु प्रधानमंत्री अभी भी कन्याकुमारी की ध्यानावस्था में आंख और मुंह बंद करे बैठे हैं। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे संदिग्ध माना है। शायद उनकी निर्णय क्षमता बहुत घट गयी है और बोली तथा कर्म का अंतर बहुत बढ़ गया है।

  पिछले दो दिनों से संघ प्रमुख मोहन भागवत और संघ मुखपत्र पान्चजन्य का समाचार चर्चा में है। श्री मोहन भागवत को लगभग एक वर्ष से जारी मणिपुर की हिंसा का ध्यान अब आया है और उन्होंने चिंता जताई है, जब मणिपुर नियंत्रण के लगभग बाहर हो चुका है। और दूसरा उन्होंने उपदेश दिया है कि लोकतंत्र में विपक्ष नहीं प्रतिपक्ष होता है। जबकि पिछले दस वर्षों से उनकी जमातें प्रतिपक्ष को विपक्ष तो दूर शत्रु-पक्ष मान रहा था और उसे समाप्त करने के लिए वैधानिक या अवैधानिक, संवैधानिक या  असंवैधानिक कदमों का सहारा ले रही थी। श्री मोहन भागवत का यह बयान उनकी अपनी भविष्य की चिंता का बयान लगता है। इसी को दूसरे रूप में पान्चजन्य में छापा गया है कि श्री नरेन्द्र मोदी को मद हो गया था। भाजपा अध्यक्ष ने बयान दिया था कि हमें संघ की आवश्यकता नहीं है और संघ ने आखिरी चरणों के चुनाव में उन्हें उनकी हैसियत बता दी। हालांकि पहले 5 चरणों में भी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर भाजपा को कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली थी। केरल में उन्हें 1 सीट मिली है परन्तु मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस बनाम वामपंथी है। आंध्रप्रदेश में भाजपा श्री चंद्रबाबू नायडू की वैशाखियों पर टिकी है। एक उड़ीसा को छोड़कर कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है जो संघ बताना चाहता है कि भाजपा को वही जिताता और वही हराता है। फिर वह पिछले 5 साल से चुप क्यों था? संघ का तरीका भी द्विअर्थी भाषा और मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू का रहा है और जब तक फायदा उठा सको तो उठाओ और जब नहीं उठा सको तो उसको नकार दो। पान्चजन्य कहता है कि महाराष्ट्र में अजित पवार के समझौते से नुकसान हुआ तो जब भाजपा समझौता कर रही थी तब संघ और उसके संगठन प्रमुख जो भाजपा में संघ से प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाते हैं और वे ही निर्णायक होते हैं, तब वे कहां थे? क्या बिहार में नीतीश कुमार, उत्तरप्रदेश में ओमप्रकाश राजभर के साथ समझौता नैतिक और नीति संगत था ? तब संघ एक तरफ सत्ता का भरपूर उपयोग करता है और दूसरी तरफ रणनीति के तौर पर भाजपा से अलग है यह बताता है। हालांकि एक कटु सत्य यह भी है कि संघ के दबाव में मोदी जी जातीय जनगणना नहीं करा सके। जिसका भारी नुकसान हिंदी भाषीय क्षेत्रों में उन्हें उठाना पड़ा। प्रतिपक्ष को जातिगत जनगणना, आरक्षण समाप्ति और संविधान बदलने की मंशा, ये तीनों ही मुददे संघ ने दिये हैं जिसका नुकसान श्री मोदी को को उठाना पड़ा है। यहां तक उनकी इतनी मुंहबंदी हुई कि कांग्रेस ने 2011 में जो जातिगत जनगणना कराई थी पर परिणाम घोषित नहीं किये थे। उसकी भी चर्चा वे सार्वजनिक तौर पर नहीं कर सके। देश में यह आम धारणा बनी है कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं करेगी। एनडीए का अंतर संतुलन श्री मोदी का स्वभाव और मुखर-जन विरोध इसके कारण हो सकते हैं। हो सकता है कि संघ भाजपा के इस अनिश्चित भविष्य की शंकाओं से आशंकित हो और ऐसे बयान देकर भविष्य की सुरक्षा तलाश रहा हो। मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सलाह दूंगा कि वे निम्न कदम उठायें ताकि उनकी सरकार की साख बच सके-

1. जम्मू की आतंकवादी घटनाओं में अमेरिकी, एम-कार्बाइन का इस्तेमाल हुआ है। जिन्हें अमेरिका ने पाकिस्तानी फौज को दिया था। मतलब साफ है कि आतंकवादियों को हथियार पाकिस्तान की सेना के द्वारा दिये जा रहे हैं। और यह पर्याप्त आधार है कि भारत अब पीओके को वापिस लेने की कार्यवाही करे ताकि आतंकवाद के आवागमन पर स्थायी रोक लग सके।

2. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की निजीकरण की नीति समाप्त करे और पिछले दिनों जो निजीकरण हुआ है उसे वापिस करे।

3. देश के वरिष्ठ नागरिकों, पत्रकारों, महिलाओं के दी जाने वाली सुविधायें जैसे रेलवे और अन्य विभागों की जो समाप्त कर दी गई थी, उन्हें बहाल करें।

4. देश के सरकारी क्षेत्रों में जो नौकरियों के रिक्त स्थान हैं उन्हें एक मुश्त अधिकतम तीन माह में भरे।

5. जातिगत जनगणना 2011 की रपट सार्वजनिक करे तथा बिहार के समान आरक्षण सीमा बढ़ायें।

6. नीट परीक्षा घोटाले जैसे घोटाले फिर न हो उसके लिए कदम उठायें। अभी नीट की परीक्षा में जो गड़बड़ी हुई है उन 67 देवपुत्रों की अंकसूचियों की खुली जांच कराये तथा जिम्मेदार संख्या के मालिकों के तथा अधिकारियों के खिलाफ भी आपराधिक कार्यवाही हो तथा बकाया विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम घोषित किये जायें।

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।