आलेख
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हिंदी : राजभाषा, राष्ट्रभाषा और विश्वभाषा – प्रो.संजय द्विवेदी
(हिंदी दिवस 14 सितंबर पर विशेष) एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है, बल्कि हमारे…
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राष्ट्रीय एकता के लिये एक राष्ट्र भाषा जरूरी -रघु ठाकुर
(हिंदी दिवस पर विशेष) फिर से एक बार देश में हिन्दी विरोधी अभियान शुरु हुआ है। कुछ शैक्षणिक संस्थाओं…
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हिंदी राजभाषा राष्ट्रभाषा या वैश्विक भाषा ? – डॉ.राजाराम त्रिपाठी
“हिंदी दिवस” के बहाने हर साल हम सब उसी पुराने झुनझुने को बजाते हैं,, हिंदी हमारी आत्मा है, हिंदी हमारी…
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टैरिफ की आँधी में स्वदेशी की मशाल: एकजुट भारत का आर्थिक धर्मयुद्ध -डॉ. राजाराम त्रिपाठी
हाल में लागू अमेरिकी 50% टैरिफ के बावजूद भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आर्थिक युद्ध…
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शुचिता की आड़ में संविधान संशोधन एक अधिकारवादी तंत्र स्थापना की कोशिश – रघु ठाकुर
(रघु ठाकुर) भारत सरकार ने अचानक पिछले 20 अगस्त को संसद में एक बिल प्रस्तावित किया जिसे 130 वां संविधान…
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संपादक के विस्थापन का कठिन समय !-प्रो.संजय द्विवेदी
(हिंदी पत्रकारिता के 200 साल) हिंदी पत्रकारिता के 200 साल की यात्रा का उत्सव मनाते हुए हमें बहुत से…
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छत्तीसगढ़ का मंगल पाण्डे लश्कर हनुमान सिंह-धनंजय राठौर
(स्वतंत्रता दिवस पर विशेष) 1857 के विद्रोह को कई नामों से जाना जाता है, जिनमें भारतीय विद्रोह, सिपाही विद्रोह, 1857…
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आदिवासी सत्य : विश्व आदिवासी दिवस पर आत्मचिंतन- डॉ.राजाराम त्रिपाठी
सभी जनजातीय क्षेत्रों में 09 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस तीर-कमान, ढोल-मृदंग और पारंपरिक वेशभूषा तथा पारंपारिक नृत्य के…
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गुलाम थे तो एक थे, आजादी मिलते ही बंट क्यों गए : प्रो. संजय द्विवेदी
भारत गुलाम था तो हमारे नारे थे ‘वंदेमातरम्’ और ‘भारत माता की जय’। आजादी के बहुत सालों बाद नारे गूंजे…
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लोकतंत्र,समता और संपन्नता तीनों चाहिये साथ-साथ – रघु ठाकुर
समाजवादी विचारधारा को लेकर सदैव कई प्रकार के संशय और आरोप लगाए जाते रहे हैं। यद्यपि आजादी के कई वर्षों…
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