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गांधी परिवार से रायबरेली का रिश्ता अमेठी से भी पुराना -राज खन्ना

राज खन्ना

गांधी परिवार से रायबरेली का रिश्ता अमेठी से भी पुराना है। असलियत में रायबरेली अमेठी को गांधी परिवार से जोड़ने का जरिया बनी। 1952 और 57 के दो चुनावों में फ़िरोज गांधी ने रायबरेली से जीत दर्ज की थी। वह इंदिरा जी के पति थे, यह उनका एक परिचय है। देश का संसदीय इतिहास उन्हे अलग कारणों से परिचित कराता है। वह सत्ता दल से जुड़े थे। पर विपक्ष की भी आवाज थे। 1955 में संसद में उन्होंने उद्योगपति राम कृष्ण डालमिया द्वारा एक बैंक और बीमा कम्पनी के चेयरमैन रहते अपनी निजी कम्पनियों को बेजा फायदा पहुंचाने का मामला उठाकर हलचल मचा दी थी। 1958 में उनका उठाया हरिदास मूंदड़ा कांड आजाद भारत का पहला आर्थिक घोटाला था। अपने ससुर नेहरू जी की सरकार की साफ़-सुथरी छवि पर बट्टे से बेपरवाह फ़िरोज गांधी को देश की पहले चिंता थी। मूंदड़ा को जेल जाना पड़ा था। वित्तमंत्री टी के कृष्णामचारी को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। रायबरेली के इस बेहतरीन सांसद को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जबरदस्त पैरोकार के कारण भी याद किया जाता है। विशेषाधिकार सम्पन्न संसद की कार्यवाही को जानने के आम आदमी के अधिकार और प्रेस की आजादी की संसदीय कोशिशें उनका अलग स्थान बनाती हैं।
फ़िरोज गांधी और इंदिरा जी के वैवाहिक जीवन में दूरियों के बहुत से किस्से हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों को आचरण में उतारने के सवाल पर भी वे विपरीत रास्तों पर नज़र आते हैं। देश के साथ रायबरेली इसकी गवाह है। इंदिरा जी 1967 में रायबरेली से पहली बार लोकसभा के लिए चुनी गईं। 1971 में दूसरी बार के उनके निर्वाचन को समाजवादी नेता राज नारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को उनके निर्वाचन को रद्द कर अगले छः साल के लिए चुनाव लड़ने और पद पर रहने की पाबंदी लगा दी। 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ फैसला स्थगित किया। 25 जून 1975 को इंदिराजी ने देश में इमरजेंसी लगा दी। नागरिक अधिकार निलंबित। विपक्षी जेल में। प्रेस पर सेंसर। अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक।
देश की तरह रायबरेली ने भी इंदिरा जी के इस फैसले का विरोध किया। 1977 में वह रायबरेली से चुनाव हार गईं। 1980 में फिर जीतीं। लेकिन उन्होंने मेडक की अपनी दूसरी सीट को तरजीह दी। 1981 के उपचुनाव और 1984 के आमचुनाव में उनके परिवार से जुड़े अरुण नेहरू रायबरेली से संसद पहुंचे। 1989 और 1991 में इंदिरा जी की मामी शीला कौल ने रायबरेली का प्रतिनिधित्व किया। 1996 और 1998 में भाजपा के अशोक सिंह जीते। 1999 में गांधी परिवार के बेहद नजदीकी कैप्टन सतीश शर्मा को रायबरेली ने चुना। 2004 में सोनिया गांधी ने अमेठी सीट पुत्र राहुल गांधी के लिए छोड़ी। रायबरेली से जीतीं और फिर लाभ के पद विवाद में इस्तीफे के कारण हुए 2006 में हुए उपचुनाव में फिर जीत दर्ज की। 2009 और 2014 के चुनाव में भी रायबरेली से उनकी जीत का सिलसिला जारी रहा।
2014 की जीत के बाद से मोदी-शाह की जोड़ी की निगाह अमेठी की तरह रायबरेली पर भी है। उत्तर प्रदेश से लोकसभा में कांग्रेस के पास यही दो सीटें शेष हैं। प्रदेश विधानसभा में इकाई पर सिमटी कांग्रेस की कुल जमा सात में दो सीटों का योगदान रायबरेली से है। कांग्रेस भले गर्दिश में हो। रायबरेली गांधी परिवार के साथ मजबूती से डटी है। 2004 में सोनिया की जीत का अंतर 2,49,765 , 2006 के उपचुनाव में 4,17,888 , 2009 में 3,72,125 और 2014 की मोदी लहर में 3,52,173 के बड़े अन्तर से सोनिया जी जीतीं।
2014 में अमेठी में कांग्रेस को कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ा था। तब से स्मृति ईरानी वहां डटी हैं। केंद्र-प्रान्त की सरकारें और उनकी पार्टी मजबूती से साथ है। अमेठी से मिले हौसले के चलते कोशिशें रायबरेली में भी हुईं। 21 अप्रेल 2018 को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने रायबरेली में एक रैली की थी। कांग्रेस के एम एल सी दिनेश सिंह इस रैली में भाजपा से जुड़े थे। उनके एक भाई राकेश सिंह हरचन्दपुर से कांग्रेस के विधायक हैं। एक अन्य भाई अवधेश सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। पांच भाइयों में तीन राजनीति में हैं।
पंचवटी उनका आवास है और दिनेश सिंह के भाजपा में दाखिले के पहले तक पंचवटी का जिक्र गांधी परिवार से नजदीकी के चलते होता था। गुजरे साल 16 दिसम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रायबरेली आये। रेल कोच परियोजना का उदघाट्न किया। 1100 करोड़ की अन्य परियोजनाओं की रायबरेली को सौगात दी। अरुण जेटली, स्मृति ईरानी सहित केंद्र-प्रदेश के अनेक मंत्री इस बीच रायबरेली के दौरे करते रहे। सबका मकसद एक। रायबरेली के लोगों को भरोसा देना कि गांधी परिवार की तुलना में भाजपा राज में उनकी ज्यादा फिक्र की जा रही है।
खराब सेहत के चलते इस दौरान सोनिया गांधी के रायबरेली के दौरों का अन्तराल बढ़ा है। प्रियंका उनकी सहायता करती है। अटकलों पर विराम लग चुका है।

सोनिया गांधी की एक बार फिर उम्मीदवारी तय हो चुकी है। कोशिशों के बाद भी भाजपा किसी बड़े चेहरे को उनका मुकाबला करने के लिए तैयार नही कर सकी। दो साल पहले भाजपा से जुड़े कांग्रेसी एम एल सी दिनेश सिंह को पार्टी ने मैदान में उतारा है। सपा-बसपा गठबंधन ने सोनिया के खिलाफ़ उम्मीदवार न लड़ाने का पहले ही फैसला ले रखा है। सपा 2014 में भी नही लड़ी थी। बसपा को तब 63,633 वोट मिले थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा के उम्मीदवारों को कुल 2,16,017 वोट मिले थे। सपा कांग्रेस के गठबंधन में ऊंचाहार की इकलौती सीट से लड़ी और जीती थी। वहां उसके 59,103 वोट थे। दोनों ही दलों का रायबरेली में जनाधार है लेकिन गांधी परिवार के चेहरे के आगे लोकसभा में उनका प्रदर्शन फीका रहा है।
1999 में सोनिया गांधी जब पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ी थीं, तब उनके विदेशी मूल का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। दिलचस्प है कि इसकी पहल करने वाले शरद पंवार की एन सी पी अब कांग्रेस के साथ हैं। तारिक अनवर कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। पी ए संगमा अब रहे नही। उसी चुनाव में बेल्लारी में इसी सवाल पर सोनिया से जोर-शोर से जूझीं सुषमा स्वराज इस बार कहीं से चुनाव नही लड़ रहीं। बेल्लारी ने 1999 तो रायबरेली के मतदाताओं ने तबसे लगातार सोनिया को बड़े अंतर से जिता कर इस मुद्दे की हवा निकाल दी। रायबरेली गांधी परिवार की कर्मभूमि है और परिवार का जुड़ाव इतना पुराना है कि वहां स्थानीय-बाहरी की बात बेमानी है।
सोनिया की खराब सेहत। उनकी अनुपलब्धता। परिवार से लम्बे जुड़ाव के बाद भी रायबरेली को क्या हासिल हुआ जैसे सवालों के जरिये भाजपा उन्हें घेरने की कोशिश करेगी। एयर स्ट्राइक के बाद बना राष्ट्रवाद का माहौल। मोदी की छवि। प्रदेश में अपनी सरकार और एक बार फिर केंद्र में सरकार का दावा। भाजपा समझाने में लगी है कि गांधी परिवार से हटकर रायबरेली की पहचान और संभावनाएं हैं। लोग मानेंगे ? सोनिया का कद। सपा-बसपा के मैदान में न होने के कारण बना अंकगणित। अमेठी की तर्ज पर रायबरेली गांधी परिवार का पर्याय है। घूम फिरकर बात ठहरती है। रायबरेली मोदी क्यों आये ? एक स्थानीय एम एल सी के बी जे पी में दाखिले के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ क्यों और किसे संदेश देने रायबरेली आ गए ? गांधी परिवार से जुड़ाव की चर्चा-सुर्खियां। रायबरेली को भाती हैं। बहुत सी जरूरतों-शिकायतों पर ये भारी पड़ जाती हैं। विधानसभा और लोकसभा के अलग नतीजे इस सच को बार- बार समझाते हैं।

 

सम्प्रति- लेखक श्री राज खन्ना वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खन्ना के आलेख विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते है।