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बोधघाट प्रोजेक्ट का लाभ मिलेगा केवल बस्तर के लोगों को – बघेल

रायपुर 20 जून।छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा हैं कि बोधघाट बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजना बस्तर का इकलौता ऐसा प्रोजेक्ट है, जिसका लाभ सिर्फ और सिर्फ बस्तर के लोगों को मिलेगा।

श्री बघेल ने आज यहां परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर बस्तर के जनप्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक में कहा कि अब तक बस्तर में जितने भी उद्योग और प्रोजेक्ट लगे हैं, उसका सीधा फायदा बस्तर के लोगों को नहीं मिला है। यह पहला ऐसा प्रोजेक्ट है, जो बस्तर के विकास और समृद्धि के लिए है। इसका सीधा फायदा बस्तरवासियों को मिलेगा।उऩ्होने कहा कि 40 वर्षों से लंबित इस प्रोजेक्ट को बस्तर की खुशहाली को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से तैयार किया किया गया है।इस परियोजना में आमूलचूल परिवर्तन कर इसे सिंचाई परियोजना के रूप में तैयार किया गया है।

उन्होने कहा कि बोधघाट परियोजना बस्तर की जरूरत है। पूरे बस्तर संभाग में एक भी सिंचाई का बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है। बस्तर संभाग का सिंचाई प्रतिशत न्यूनतम है। वनों की अधिकता के बावजूद भी मानसून यदि थोड़ा भी गड़बड़ाता है, तो सूखे से सबसे ज्यादा बस्तर अंचल ही प्रभावित होता है।इंद्रावती नदी के जल का सदुपयोग कर बस्तर को खुशहाल और समृद्ध बनाने के लिए बोधघाट परियोजना जरूरी है।

कृषि एवं जल संसाधन मंत्री रविन्द्र चौबे ने कहा कि बस्तर अंचल के समग्र विकास के लिए सिंचाई जरूरी है। इससे बस्तर की अर्थव्यवस्था में बदलाव आएगा। उन्होंने इस परियोजना के क्रियान्वयन से पहले आकर्षक पुनर्वास एवं व्यवस्थापन की नीति तैयार करने और उसका अक्षरशः पालन सुनिश्चित करने की बात कही। मंत्री श्री चौबे ने कहा कि इस परियोजना से प्रभावित परिवारों को लाभ मिले, यह हर हाल में सुनिश्चित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बस्तर में सिंचाई सुविधा को बढ़ाना जरूरी है, क्योंकि इससे जीवन में बदलाव आता है। बैठक में वन मंत्री मोहम्मद अकबर एवं आबकारी मंत्री कवासी लकमा ने भी विचार व्यक्त किए।

बैठक के प्रारंभ में जल संसाधन विभाग के सचिव अविनाश चम्पावत ने पावर-प्वाइंट प्रजेंटेशन के माध्यम से इस परियोजना के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बोधघाट परियोजना के निर्माण से खेत-किसानी, उद्योग एवं अन्य आय मूलक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने बताया कि इन्द्रावती नदी के 300 टीएमसी जल का उपयोग छत्तीसगढ़ कर सकता है। वर्तमान में मात्र 11 टीएमसी जल का उपयोग हो रहा है।