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उदारता और सहिष्णुता से ही रूकेगी कट्टरता – रघु ठाकुर

 28 जून 2022 को राजस्थान के उदयपुर में मुस्लिम समाज के दो युवकों ने कन्हैया लाल नाम के एक टेलर की उनकी दुकान में घुसकर हत्या कर दी। यह युवक नाप देने के नाम पर उनकी दुकान में घुसे थे तथा जब वे नाप ले रहे थे तब धारदार हथियार से उनकी गर्दन काट दी। इनकी शिकायत यह है कि स्व. कन्हैया लाल ने सुश्री नूपुर शर्मा का समर्थन किया है, जिन्होंने हज़रत मोहम्मद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी।

इस घटना को घटित हुए कई दिन बीत चुके हैं, और भारतीय जनता पार्टी सुश्री नूपुर शर्मा और प्रवक्ता जिंदल को पार्टी से हटा चुकी है। सुश्री नूपुर शर्मा के खिलाफ महाराष्ट्र और कई स्थानों पर पुलिस थानों में एफ.आई.आर. भी दर्ज कराई गई तथा मुकदमे भी दर्ज हुए हैं। अब ये मुकदमे न्याय पालिका में चलेंगे और न्यायपालिका अपना निर्णय देगी। मैंने नूपुर शर्मा की टिप्पणी नहीं सुनी परन्तु उनके द्वारा कही गई बात की सफाई में एक मुस्लिम सज्जन का वीडियो अवश्य सुना जिसमें उन्होंने हज़रत मोहम्मद साहब के ऊपर कही बात की सफाई दी थी। मैं उन तथ्यों पर चर्चा के बजाय यह महसूस करता हूं कि सभी धर्मों में जो घटनाएं या किंवदतियां दर्ज है, उन पर उन धर्मों के जानकारों व या मुखियाओं या गुरूओं को स्वतः विचार करना चाहिए तथा जो मान्यताएं आज से कई हज़ार वर्ष पूर्व निर्धारित की गई थी या घटनायें हुई थी उनमें से अनेकों अपनी प्रासंगिकता अब खो चुकी हैं। काल चक्र के हिसाब से सभी धर्मों के धर्मावलम्बियों ने नई परिपाटियाँ और कानूनों को स्वीकार किया है। पुरानी परिपाटियों को बदल कर या त्याग कर समाज के वर्तमान के अनुकूल बनाना कोई धर्म विरोधी नहीं है। पुराने तथ्यों का उल्लेख करना भी धर्म विरोधी नहीं माना जा सकता।

उदयपुर की घटना एक असमान्य घटना है, जो धर्म के नाम पर हिंसा को स्थापित कर समाज में भय पैदा करना चाहती है। अपराधी हत्यारे गिरफ्तार कर लिये गये हैं। मैं चाहूँगा की राजस्थान सरकार फास्ट ट्रेक कोई माध्यम से शीघ्र अपराधियों को कठोरतम दण्ड दिलाने की पहल करे। ताकि देश के बड़े हिस्से के मनो में धधक रही प्रतिशोध की आग शांत हो सके। चिंता यह है कि अक्सर व्यक्तियों के द्वारा किये गये अपराध उस समूचे समाज जनों के अपराध मान लिये जाते हैं। मसलन जिस प्रकार मुस्लिम आक्रमणकारी बाबर या औरंगज़ेब ने जो हिन्दू मंदिर तोड़े थे उसके लिये सामान्य तौर पर समूचे मुस्लिम समाज को अपराधी बनाकर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। जबकि आज से 15 सौ साल पहले देशी मुस्लिमों की आबादी बमुश्किल कुछ लाख रही होगी या शायद वह भी न हो और आज करोड़ों देशी मुसलमानों का उससे कोई संबंध नहीं जुड़ता। ऐसी ही भावना और सोच 1984 में श्रीमती इंदिरा गाँधी की एक सिख के द्वारा हत्या के बाद देश के समूचे सिख समाज के लिये बनाई गई थी। दंगों का बड़ा कारण यही होता है। एक व्यक्ति के अपराध को सम्पूर्ण समाज का अपराध मान लिया जाता है। मैं मानता हूं कि ऐसे अपराधों की आलोचना, निंदा, प्रतिकार और प्रतिरोध उन समाजों के द्वारा जिस मुखरता के साथ होना चाहिए या तो वह नहीं होता या फिर उसकी अभिव्यक्ति और जानकारी दूर तक नहीं हो पाती। उदयपुर जैसी घटनाओं का तीखा प्रतिकार उनके समाज के द्वारा होना चाहिए जिनसे अपराधियों का ताल्लुक है, ताकि आम जनमानस को आश्वस्ति मिल सके।

कुछ इस्लामिक धार्मिक गुरू या नेताओं ने उदयपुर की क्रूर हत्या की निंदा की है उसे नकारा है यह स्वागतयोग्य है, परन्तु अब जब समस्या शब्दों से बढ़कर कर्म पर पहुंच गई है तब कुछ ठोस और निर्णायक बातों पर विचार किया जाना चाहिए। अभी कुछ दिनों पूर्व गाजियाबाद के एक धर्म गुरू और किसी धाम के कथा वाचक और ऐसे अनेक कथा वाचकों और तथाकथित साधु संतों ने मुसलमानों के विरूद्ध न केवल अनुचित टिप्पणी की बल्कि हिंसा को उकसावा दिया था। ऐसी ही एक टिप्पणी एक साधु वेशधारी ने छत्तीसगढ़ के राजीव लोचन मंदिर में महात्मा गाँधी की हत्या के संदर्भ में की थी। हालांकि यह भी एक सच है कि सरकारों का रवैया ऐसी उत्तेजक भाषा और अपीलों के खिलाफ जितना कठोर होना चाहिए वह नहीं था। बहुत संभव है कि हिन्दू मतदाताओं के वोट की अनुकूलता के लिये यह नरम कार्यवाही की हो परन्तु यह एक गलत तरीका है, जिसकी प्रतिक्रिया अन्य समूहों में होना स्वाभाविक है। तथा इससे यह भी होना है कि सभी धर्म समाज, अपने व्यक्ति की हिंसा या कथन पर या तो मूक रहते हैं या फिर बचाव में एकजुट हो जाते है। मैं राजस्थान सरकार से माँग करूंगा की स्वर्गीय कन्हैया लाल के परिवार की सुरक्षा और व्यवस्था की संपूर्णतः जवाबदारी सरकार उठाये।

मैं सभी धर्मों के धर्म गुरूओं से भी अनुरोध करूंगा की वे अपने-अपने धार्मिक ग्रंथों को वर्तमान समय के अनुकूल संशोधित करें ताकि समाज में पैदा होने वाले विद्रोह जन्म न ले सकें। मसलन शादी विवाह में धर्म परिवर्तन न धर्म है न जरूरी है। व दुनिया में इस्लाम के अलावा शायद ही कोई धर्म हो जहाँ शादी के लिये अपने ही धर्म को स्वीकारने की बाध्यता है। यह सब परंपराएं हैं जो तत्कालीन समाज के लिये बनाई गयी थी, जो अब औचित्यहीन हैं। हिन्दू समाज ने सती प्रथा को त्याग कर उसे अब अपराध माना है। दुनिया के इस्लामिक देशों में भी धार्मिक परंपराओं में परिवर्तन हुए हैं और हो रहे हैं। सऊदी अरब के शासकों ने मस्जिद के स्पीकरों की की आवाज को नियंत्रित किया है। तथा परदा आदि को लेकर कई प्रगतिशील कदम उठाये हैं। क्या तुर्की में उन्नीसवीं सदी में कमाल पाशा ने परदा प्रथा को समाप्त नहीं किया था? क्या हिन्दू समाज अपने समाज में परदे को समाप्त नहीं कर रहा है? अब नया जमाना आ रहा है, और हर क्षेत्र में महिलाएं आगे आ रही है। लखनऊ में जब बेगम हज़रत महल अंग्रेजों से लड़ी थीं तब क्या परदा में रहकर लड़ना संभव था ? धार्मिक कट्टरताओं में ढीलापन आ सकता है यदि उसके धर्मावलंबी कुछ अपनी ही हंसी मजाक को सहना सीखें। एक समय सरदारों के ऊपर बहुत से चुटकुले चलते थे, और उन्हें स्वतः सरदार लोग ही रस लेकर सुनाते थे। सरदार खुशवंत सिंह ने तो खुद अपना ही खूब मजाक उड़ाया। क्या ऐसा ढीलापन या उदारता अन्य धर्मावलंबी लोग नहीं अपना सकते? मैं तो चाहता हूं कि देश में एक दिन धार्मिक होली का जश्न मनाया जाये। जिस प्रकार होली पर कोई जात पात नहीं देखता उसी प्रकार एक दिन धार्मिक होली का पर्व मनाया जाये ‘‘जिसमें धर्मावलंबी परस्पर एक दूसरे की परम्पराओं का जमकर मजाक उड़ाये और उसका आनंद लें’’ यदि यह शुरूआत हो तो समाज में सहनशीलता बढ़ेगी, प्रगतिशीलता बढ़ेगी सुधार होगा और, कट्टरता कम होगी।इसी प्रकार देश में सभी धर्मों की धर्म संसद धर्म गुरू आयोजित करें जिसमें केवल अपने धर्म की श्रेष्ठता बघारने के बजाय अपनी धार्मिक कमियों और आलोचनाओं को सुने स्वीकारें, और सुधारें।

अगर कट्टरता कम नहीं होगी तो हिंसा नहीं रूकेगी। हिंसा का रास्ता एक व्यापक काली सुरंग है, जिसमें हिंसा और संकीर्णता के दायरे सिकुड़ते जाते हैं। मुसलमान अगर कहीं हिन्दू के खिलाफ हिंसा करता है, तो वही कहीं मुसलमान शिया, सुन्नी के नाम पर मुसलमान के खिलाफ हिंसा करता है। हिन्दू कहीं कहीं अपने अंदर अपने जाति समूह आधार पर हिंसा करता है। इसाई कैथोलिक प्रोटोस्टेंट के नाम पर हिंसा करता है। सिख जाट सिक्ख और राम गढ़िया के नाम पर हिंसक या भेदभाव का व्यवहार करता है। हिंसा और क्रूरता की सुरंग क्रमशः सिकुड़ती जाती है। संकीर्णता का कोई अंत नहीं है। मानव मन की व्यापकता ही धर्म है साथ ही सभ्यता, संस्कृति और मानवता भी।

 

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर देश के जाने माने समाजवादी चिन्तक है।प्रख्यात समाजवादी नेता स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक भी है।