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राजनीतिक दलों का होना चाहिए सिद्धांत आधारित गठबंधन – रघु ठाकुर

देश में वैसे तो राजनैतिक दलों के मोर्चे के छुटपुट प्रयोग 50 के दशक में भी हुए हैं। परन्तु केन्द्र में एक मजबूत और अकेले बहुमत की सरकार होने की वजह से छुटपुट प्रदेशों में हुई ऐसी घटनाओं की कोई राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा नहीं हुई। राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तब शुरू हुई जब समाजवादी नेता स्व. डॉ.राम मनोहर लोहिया ने एक चुनावी रणनीति के तौर पर गैर कांग्रेसवाद और मिली जुली सरकारों यानी संयुक्त विधायक दल की सरकारों का तार्किक प्रयोग शुरू किया। डॉ. लोहिया ने मिली जुली सरकारों का प्रयोग राजनैतिक बदलाव के लिये कराया था। इस प्रयोग की विशेषता यह थी कि यह प्रयोग सिद्धांत उन्मुख कार्यक्रम आधारित था।परन्तु लोहिया की मृत्यु के बाद इसके प्रयोगकर्ताओं ने इसे कार्यक्रम आधारित की बजाय सत्ता पकड़ू बना दिया है। 1969 में कांग्रेस के अल्पमत होने के बाद वामपंथियों ने कांग्रेस सरकार को समर्थन देकर उसे बचाया और 1971 में तो कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 1977 में जनता पार्टी की केन्द्र सरकार को सी.पी.एम. ने बाहर से समर्थन दिया तथा प. बंगाल में सी.पी.एम. के नेतृत्व में मिली जुली सरकार बनी। जिसमें सी.पी.एम., सी.पी.आई., फारवर्ड ब्लॉक और आर.एस.पी. शामिल थे। इसे वामपंथी मोर्चे का नाम दिया गया। ज्योति बसु ने मोर्चे की सरकारों का अपने सूबे में एक बेहतर प्रयोग किया तथा लगभग 25 वर्षां तक वामपंथी मोर्चे की सरकार चलाई। यह सरकार यद्यपि सी.पी.एम. के नेतृत्व में थी और घटक दल सी.पी.एम. की ताकत के सहारे जीतते थे। परन्तु ज्योति बसु ने कभी भी अपने सहयोगी दलों को न तोड़ने का प्रयास किया और न कभी उन पर विलय के लिये दबाव बनाया। ज्योति वसु का यह बड़ा मन और साफ छवि थीं जो उनकी मृत्यु तक वामपंथी मोर्चे की एकजुटता व सफलता का कारण रहा। 1987 से फिर एक बार केन्द्र में मोर्चे सरकार की शुरूआत हुई तथा जनता दल के श्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी जिसका समर्थन बाहर से भा.ज.पा. और सी.पी.एम. दोनों ने किया। 1996 में फिर मिली जुली सरकारों का दौर केन्द्र में चला तथा इन सरकारों को सी.पी.एम. और कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया, और सी.पी.आई. तो सरकार में शामिल भी हुई थी। स्व. इन्द्रजीत गुप्ता, श्री देवगौड़ा के और फिर स्व. श्री गुजराल के प्रधानमंत्रित्व काल में गृहमंत्री रहे।

         1988 में भा.ज.पा. के साथ एन.डी.ए. का गठन हुआ। जिसके अध्यक्ष व संयोजक क्रमशः श्री अटल बिहारी वाजपेयी व जार्ज फर्नाडीज़ बने। एन.डी.ए. ने भी अपना एक कार्यक्रम तैयार किया। दरअसल यह कार्यक्रम बदलाव का कम था सत्ता हासिल करने का बहाना अधिक था। चेहरा बचाने के लिये कुछ दिखावा जरूरी था। 2014 में यद्यपि एन.डी.ए. की सरकार बनी परन्तु श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भा.ज.पा. का संख्या बल श्री अटल जी के जमाने से बहुत आगे चला गया था। चूंकि 2014 के चुनाव में भा.ज.पा. को यह कल्पना नहीं थी कि इतनी बढ़ी संख्या में उन्हें विजय हासिल होगी इसलिये उन्होंने चुनाव के पहले देश में सभी दूर छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों को एन.डी.ए. में शामिल किया, उन्हें सीटें भी छोड़ी, परन्तु चुनाव के बाद जो ताकत बढ़ी, उससे उन्होंने नाम को तो एन.डी.ए. रहने दिया पर धीरे-धीरे उसे भा.ज.पा. की सरकार में बदलने की शुरूआत कर दी। जो समर्थक दल थे उनके मंत्रियों को प्र्भावहीन कर दिया गया और केवल कार और बंगले वाला अधिकारविहीन मंत्री बना दिया गया। 2019 के चुनाव के बाद तो स्थिति और भी केन्द्रीकृत हो गई क्योंकि भा.ज.पा. को अकेले भारी बहुमत मिल गया। उन्होंने यद्यपि घटक दलों को सीधे तो बाहर नहीं किया परन्तु उनके साथ सम व्यवहार करने की बजाय उनसे दोयम दर्जे का व्यवहार करना शुरू कर दिया। कहने को आज एन.डी.ए. की सरकार है परन्तु वस्तुतः यह केवल भा.ज.पा., और श्री मोदी व श्री शाह की सरकार है। इससे छोटे और क्षेत्रीय दलों में बैचेनी बढ़ी और उन्होंने एन.डी.ए. से हटना और अन्य मार्ग चुनना शुरू कर दिया।

    अब देश में कांग्रेस की ओर से एक बहस शुरू कराई गई है कि अब मिली जुली सरकारो का समय चला गया और एक दलीय सरकारों का समय आ गया। हालांकि बाह्य तौर पर कांग्रेस अभी भी गठबंधन राजनीति के पक्ष में है। कुछ दिनों पहले पटना में जो 15 दलों की बैठक भा.ज.पा. हटाओ के नाम पर आयोजित हुई उसमें कांग्रेस ने सीधे तौर पर तो क्षेत्रीय और छोटे दलों को नहीं नकारा परन्तु जिस भाषा का प्रयोग किया उससे ये क्षेत्रीय व छोटे दल सावधान हो गये। क्षेत्रीय दल व छोटे दलों में यह भावना पनप रही है कि अपने स्वभाव के अनुसार केन्द्रीय सत्ता में आने के बाद कांग्रेस इन्हें भी समाप्त करेगी और इसलिये एक बिहार को छोड़कर अन्य राज्यों के क्षेत्रीय दल अभी से अपने वजूद के प्रति सावधान हो गये लगते हैं।

         इन राजनैतिक परिस्थितियों में एक राष्ट्रीय चर्चा शुरू हुई है कि क्या गठबंधन की रणनीति समाप्त होने का समय आ गया है? या गठबंधन होना चाहिए और क्या फिर एक बार देश में एक दलीय सत्ता होना चाहिए। यह भी कहा जाता है कि क्षेत्रीय दल केन्द्र के अल्पमत दल की सरकार से सौदेबाजी करते हैं। यह कुछ हद तक सही भी है। परन्तु महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस सौदेबाजी से देश को क्या क्षति होती है ? अभी तक के प्रयोगों के अनुभवों को देखें तो मिली जुली या मोर्चे की सरकारों के प्रयोग से कोई राष्ट्रीय क्षति नहीं हुई बल्कि लोकतांत्रिक प्रणाली इस अर्थ में मजबूत हुई है कि क्षेत्रीय, धार्मिक, जाति या भौगोलिक अपेक्षाओं की सुरक्षा से क्षेत्रीय भावना संतुष्ट हुई और वे राष्ट्र, राज्य में अपनी भूमिका खोजने लगी हैं।

   अभी कुछ दिनों पूर्व तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डी.एम.के. ने दिल्ली में अपना दफ्तर बनाया है और केन्द्रीय कार्यालय शुरू किया है। यह एक प्रकार से उनके राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका खोजने व निभाने की इच्छाओं की शुरूआत है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री श्री स्टालिन के पिता स्व. करूणानिधि, ए.आई.डी.एम. की मुख्यमंत्री स्व. जयललिता उसके पूर्व स्व. रामचन्द्रन या अन्ना द्रमुक, डुयुक राजनीति के मजबूत स्तम्भ थे और उनका सूबे पर प्रभाव वर्तमान शासकों की तुलना में कहीं अधिक था। परन्तु उन्होंने कभी भी राष्ट्रीय राजनीति में आने की इच्छा नहीं की। उनकी अपेक्षायें क्षेत्र तक सीमित रही। इसी प्रकार आंध्र में एन.टी. रामाराव की तेलगू देशम पार्टी की भी यही स्थिति रही। परन्तु अगर अब यहां के क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका खोज रहे हैं उनकी अपेक्षायें फैल रही है तो यह भारतीय राजनीति के लिये इस अर्थ में सुखद है कि इससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी। कुछ लोगो के मन में यह भय रहता है, कि क्षेत्रीय दल अपनी क्षेत्रीय अस्मिता में सीमित रहते है और इसलिये कभी कभी उनके राष्ट्र भक्ती पर कुछ संकायें और प्रश्न चिन्ह लगाये जाते है? तमिलनाडु, उड़ीसा, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, बंगाल आदि गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों की राजनैतिक अपेक्षायें अगर केन्द्रीय सत्ता की ओर बढ़ती है तो यह कई प्रकार से देश के लिये फायदेमंद होगा। एक उनकी क्षेत्रीय कट्टरतायें कम होगी और राष्ट्रीय मेल जोल, आना जाना , शादी-विवाह भाषाई सीमाओं को लांघकर एक राष्ट्रीय भाषा के  निर्माण की प्रक्रिया की गति तेज होगी।

         दूसरे मिली जुली सरकारों में नियंत्रण और संतुलन (चेक और बैलेन्स) महत्वपूर्ण होता है। जब किसी एक दल का भारी बहुमत का समर्थन मिल जाता है, तो वह कई बार अपनी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भूल जाता है और ‘‘मेरे अलावा कोई दूसरा नहीं’’ के विचार पर चल पड़ता है। इस तानाशाह मन और एक हाथ में केन्द्रीकृत सत्ता के प्रयोग को देश ने 1975 में देखा और उसे भोगा है और कुछ भिन्न रूप में देश अभी भी देख और भोग रहा है। कुछ लोग कह सकते है कि 1947 के बाद भी देश में एक दल के अकेले बहुमत की सरकार थी और देश व्यापी लोकप्रिय नेतृत्व था तब यह मनोवृत्ति क्यों नहीं पनपी। यह दोनों बातें सही है परन्तु यह भी देखना होगा कि उस समय राजनैतिक दल के अंदर आंतरिक लोकतंत्र मौजूद था। स्व. नेहरू की सीमा को बाँधने के लिये स्व. पटेल थे, स्व. राजेन्द्र प्रसाद और आजादी के आन्दोलन की महात्मा गांधी के दौरान की उदार परिपाटियां भी थी जिन्हें तत्काल तोड़ना किसी के लिये भी संभव नहीं था। परन्तु 1960 के बाद से कांग्रेस में भी आंतरिक लोकतंत्र सिकुड़ने लगा और 1962 के बाद तो लगभग एक व्यक्ति परक दल बन गयी। अब स्थिति यह है कि लगभग सभी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र समाप्तप्राय है। व्यक्तिपरक एकाधिकारीवादी नेतृत्व सूबाई दलों से लेकर राष्ट्रीय दलों में फैल चुका है। और इसीलिये इस दौर में जब दलों के भीतर नियंत्रण और संतुलन की स्थितियाँ समाप्त हो चुकी है तो अल्पमत के नेतृत्व वाली मिली जुली सरकारें इस आंतरिक लोकतंत्र के अभाव और ‘‘चेक एवं बैलेन्स’’ की जरूरतों को पूरा कर सकती है। क्षेत्रीय या सूबाई दलों को हमें लोकतंत्र के लिए उनकी उपयोगिता के आधार पर भी देखना होगा। मिली जुली सरकारों से क्षेत्रीय अपेक्षायें चाहे वे धार्मिक हो, जातिगत हो, भाषाई या क्षेत्रीय हो को भी संतुष्टि मिलती है, और इससे अलगाववाद घटता है व राष्ट्रीयता बढ़ती है।

         यह अवश्य है कि मिली जुली राजनीति का जो रणनीतिक व वैचारिक प्रयोग डॉ. लोहिया ने शुरू किया था वह अपनी दिशा भटक चुका है। अब गठजोड़ किसी बदलाव या कार्यक्रम के लिये नहीं बल्कि विशुद्ध सत्ता हतियाने के लिये हो रहे हैं। भारतीय राजनीति एक कम्पनी सिस्टम जैसी बन गई है जिसमें अपनी-अपनी वोटों की पूंजी के मालिक अपनी-अपनी जाति धर्म या क्षेत्रवार की पूंजी के शेयर मिलाकर एक कम्पनी खड़ी कर मुनाफा आपस में बांट लेते हैं। इसे विचार कार्यक्रम व बदलाव की दिशा में मोड़ना होगा। ताकि लोकतांत्रिक अपेक्षायें पूरी हो और बदलाव के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सके। कम्पनी का गठन अंशधारकों के मुनाफे के लिये होता है, जबकि राजनैतिक गठजोड़ का उद्देश्य समाज को आगे ले जाना और व्यवस्था को बदलना होना चाहिए।

         जो देश में बड़ी संख्या के संसदीय दल है उन्हें अपने दायित्व को समझना होगा और क्षेत्रीय दलों को भी अपनी भूमिका को विचार उन्मुख बनाना होगा। ऐसी विचार और कार्यक्रम आधारित एकजुटता ही देश को ठीक दिशा में ले जा सकती है। कारपोरेट का पैसा, कारपोरेट का प्रचार और कारपोरेट की राजनीति यह देश के लिये मुफीद नहीं है। देश को प्रधानमंत्री के पद पर कारपोरेट के सी.ई.ओ. के बजाय देश के विशाल बहुमत की अपेक्षाओं को समेटने और अभिव्यक्त करने वाले नेतृत्व को आगे लाना होगा।

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।