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आदिवासियों के उत्थान में जीवन समर्पित करने वाले डा.खेड़ा का निधऩ

बिलासपुर 23 सितम्बर।छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में अचानकमार के जंगलों में लगभग 35 वर्षों से आदिवासियों के उत्थान में लगे दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डा.प्रभुदत्त खेड़ा का आज यहां निधन हो गया।

डा.खेड़ा काफी समय से बीमार चल रहे थे,और उनका उपचार यहां के अपोलो अस्पताल में इलाज चल रहा था।आज सुबह उन्होने वहीं पर अन्तिम सांस ली।उन्हे पिछले वर्ष दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद से वह अस्वस्थ चल रहे थे।

दिल्ली विश्वविद्यालय में 15 साल तक समाजशास्त्र पढ़ाने वाले डा.खेड़ा 1985 से अचानकमार टाईगर रिजर्व के लमनी छपरवा में झोपड़ी बनाकर रहते थे।बताया जाता है कि 1983-84 में एक दोस्त की शादी में बिलासपुर उनका आना हुआ।उसी दौरान वह जंगल घूमने गए।वहां उन्होने रेस्ट हाउस में रुककर वहां बसने वाले बैगा जनजाति के लोगों के रहन सहन को देखा। इन लोगों की हालत और सरकार की बेरुखी देखकर प्रो.खेड़ा  का मन इतना व्यथित हुआ कि उन्होंने प्रोफ़ेसर की नौकरी छोड़ दी और दिल्ली का ऐशो आराम छोड़कर लमनी के जंगलों में ही आ बसे।

डा.खेड़ा जीवनपर्यन्त वह आदिवासियों के उत्थान में लगे रहे।उनके प्रयासों से इस क्षेत्र में आदिवासियों में शिक्षा के प्रति काफी जागरूकता आई।डा.खेड़ा अंतिम संस्कार ससम्मान कल सुबह लमनी, अचानकमार में किया जाएगा।

 

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