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पंजाब में बढ़ता कट्टरपंथ चिंता का विषय- रघु ठाकुर

रघु ठाकुर

पंजाब में पिछले कुछ समय से कट्टरपंथ पुनः सक्रिय हुआ है। किसान आंदोलन के अंतर्गत चल रहे धरने के आखिरी दिनों में भी एक निहंग ने एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या कर दी थी और यह तर्क दिया था कि वह धर्म का अपमान यानि ईश निंदा कर रहा था।

पिछले दिनों गिरफ्तार अमृतपाल सिंह के नेतृत्व में निहंगों ने अजनाला थाने पर अपने साथियों को छुड़ाने के लिये हमला किया था जिसमें अनेकों पुलिसकर्मी भी हमले के शिकार और घायल हुये थे। एक पुलिस थाने पर इस प्रकार का सामूहिक हमला और अपराधियों को छुड़ाकर ले जाना सामान्य घटना नहीं थी। उसके बाद से निरंतर पंजाब में कहीं न कहीं तनाव नज़र आ रहा है।

इस उभरते तनाव के पीछे क्या कारण है और उन्हें कैसे हल किया जाए, यह भी चिंता का विषय है। सिख पंथ या सिख धर्म जो भी कहें वह बहादुरी, उदारता, समता, तार्किकता और सहनशीलता का विचार है। गुरूनानक ने तो लगभग सभी धर्मों के जो उनके समकालीन थे या प्राचीन थे से अच्छे सिद्धान्त अपने उपदेशों में शामिल किये थे। और यहां तक कि कबीर, रविदास जैसे समाज सुधारकों की भी कुछ बातों को उन्होंने अपने दर्शन में शामिल किया था। उन्होंने लगभग देश के बड़े हिस्से का भ्रमण किया और गुरूद्वारों की स्थापना की थी। उनके पंच प्यारों में जिन्हें लोग आमतौर पर छोटी जाति का या अस्पृश्य जैसा मानते थे उन्हें भी शामिल किया था। यानी समर्पण और विचार के प्रति संकल्प उनके चयन का आधार था।

गुरूनानक जी के जीवन काल की कई उल्लेखनीय घटनायें हैं जो उनकी वैचारिक उदारता और व्यापकता को स्पष्ट करती है। जैसे एक कथानक बताया जाता है कि वे जब सो रहे थे तो उनके पैर मस्जिद की ओर थे किसी मुस्लिम भाई ने इस पर आपत्ति की तो उन्होंने कहा कि वह जगह बताओ जहां खुदा न हो। जब ईश्वर सब जगह व्याप्त है तो फिर पैर कहां हो कहां न हो यह अर्थहीन है। गुरू ग्रंथ साहिब को ही अपना मार्गदर्शक मानना यह भी एक क्रान्तिकारी कदम था। जिसका अर्थ था कि पत्थर की पूजा की बजाय विचार और असूल को मानो। उस कालखण्ड में हिन्दू समाज में व्याप्त कई कुरीतियों को भी उन्होंने अपने नये विचारों के द्वारा त्याग करा दिया था। गुरूद्वारों का संचालन, वहां आने जाने वालों के प्रति प्रेम और सेवा उनका तरीका था। आज भी मैं देखता हूं बगैर किसी भेदभाव के, बगैर किसी जाति धर्म की कसौटी के, इंसान के साथ समानता प्रेमभाव और सेवा, गुरूद्वारों में नज़र आती है।दिल्ली के गुरूद्वारों में मैंने बड़े-बड़े संपन्न सिखों को गुरूद्वारे में आने वाले दर्शनार्थियों के जूते संभालते तथा उन्हें बाद में पालिश कर वापिस करते देखा है। यह एक विनम्र सेवा भाव तो है ही साथ ही इंसान-इंसान के बीच, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, के भेद को नकारने वाला विचार भी है।

परन्तु पिछले कुछ दिनों से सिखों के एक समूह में कुछ कट्टरतायें पैदा हुई है या उनके दिमाग में भरी जा रही है। जिससे एक तरफ उग्रता और कट्टरता बढ़ रही है और दूसरी तरफ सिख धर्म के अनुयायियों में भी मानसिक विभाजन हो रहा है। जो दलित लोग गुरूनानक के दर्शन को मानकर सिख बने थे वे अब अपने को जाट सिखों के साथ सहज नहीं महसूस कर रहे हैं। उन्हें रामगड़िया सिख कहा जाता है। और वे अब जट सिखों के गुरूद्वारों से अपने अलग गुरूद्वारे बनाना चाहते है। याने उनकी निष्ठा गुरूनानक के विचारों में तो है परन्तु सिख संस्थाओं के नियंत्रकों में नहीं। ऐसा ही कुछ राम रहीम पंथ के साथ भी है और उनके अनुयायी भी गुरूद्वारों के केन्द्रीय नियंत्रण से अलग होकर अपना अस्तित्व देखते है। और इसका स्वर्ण मंदिर और अकाल तख्त के नियंत्रण पर भी असर पड़ा है। एक समय जनमत की एकजुटता व दबाव के कारण राजा, महाराजा भी अकाल तख्त के फैसलों को स्वीकार करते थे। अकाल तख्त के सामने पेश होकर वे महाराजा नहीं बल्कि सामान्य इंसान होते थे। तात्पर्य यह है कि राज्य का सर्वोच्च अधिकारी भी अकाल तख्त के दण्ड को सहज सामान्य व्यक्ति के रूप में स्वीकारता था। लेकिन अब स्थितियां बदल रही है। अनेकों स्थानों पर सिखों के विभिन्न समूहों ने प्रथक गुरूद्वारे बनाये हैं और शिरोमणि प्रबन्धक कमेटी के नियंत्रण से वे मुक्त होना चाहते है।

वैसे तो यह अच्छा ही है कि किसी भी धर्मों के केन्द्रों का सत्ताई केन्द्रीयकरण न हो क्योंकि केन्द्रीयकरण अपने आप में धार्मिक नहीं है। ईश्वर व व्यक्ति के बीच किसी संस्था या सत्ता की आवश्यकता नही है। धार्मिक संस्थाओं की देख-रेख या प्रबन्धन एक अलग विषय है। परन्तु उनके शरीर और मन पर प्रबंधक संस्थाओं का संगठनात्मक नियंत्रण धार्मिक मूल्यों के प्रतिकूल है। कुछ विदेशों से भी कट्टरताओं और विभाजक मानसिकता को हवा दी जाती है और बरगलाया जाता है। हालांकि यह महत्वपूर्ण है कि पंजाब का आम सिख और बहुमत बल्कि कहे तो चंद लोगों को छोड़कर सभी सिख अपने आपको भारतीय मानते है और खालिस्तानी जैसे नारों या विचारों का समर्थन नहीं करते। अमृत पाल के संगठन ‘‘वारिस पंजाब दे’’ को भी आम सिखों का कोई समर्थन नहीं है। आप किसी भी आम सिख से पंजाब में पूछें कि क्या वह खालिस्तान चाहता है तो शायद ही कोई हां कहे वरना हर सिख इससे इंकार करता है और इसे असंभव बताता है। कई वर्ष पूर्व एक ढाबे पर मैंने एक सिख ड्राईवर से यह पूंछा था कि क्या वह खालिस्तान चाहता है तो उसका उत्तर चैंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि, हम लोग ट्रक पर काम करते हैं और हमारी इतनी गाड़ियां हैं कि वे पंजाब की सीमा से बाहर देश के दूसरे कोने तक चली जायेंगी। हम अपनी गाड़ियां कहां खड़ी करेंगे? याने छोटे से देश की कल्पना उनके दिमाग में नहीं है। पढ़े लिखे सिख और सीमा के नजदीक रहने वाले सिख भी पाकिस्तान के खतरे को समझते हैं और कहीं दूर तक भी उनके दिमाग में अलगाव की भावना नहीं है। परन्तु कुछ राजनीतिक, कुछ वैश्विक कारणों से उनमें कट्टरता की पुनः प्रवेश की बातें होती हैं। जैसे 26 मार्च को न्यूयार्क के टाइम्स स्क्वायर पर अमृत पाल सिंह के समर्थन में सिख भाईयों ने प्रदर्शन किया। कुछ दिनों पूर्व लंदन, सेंट फ्रांसिसको और वाशिंगटन में भी भारतीयों पर हमले का प्रयास हुआ है, यह घटनायें कहीं न कहीं हस्तक्षेप को दर्शाती हैं इसमें कोई दो राय नहीं है कि सिख समुदाय स्वर्ण मंदिर की पवित्रता और सम्मान के लिये अपना सब कुछ कुर्बान करने को तैयार रहा है और आज भी है। परन्तु स्वर्ण मंदिर की पवित्रता और गुरूद्वारों की सत्ता के केन्द्रीयकरण में कोई साम्य या संबंध नहीं है,गुरूद्वारों के प्रबन्धन के लिये राज्य को स्थानीय समाज जनों को ही अधिकृत कर देना चाहिये। वे अपने गुरूद्वारों का प्रबंधन अपने तरीके से करें। राज्य को केवल राज्य या राष्ट्रीय कानून व्यवस्था के बारे में चिंता करना चाहिये।

सिख समाज के भी प्रबुद्धजनों, राजनेताओं और समाज सेवियों को कट्टरताओं को पनपने से रोकने का प्रयास करना चाहिये। बल्कि ज्यादा अच्छा यह हो कि वह इस पर भी विचार करें कि रामगड़िया सिख या राम रहीम जैसे लोग जो सिख समाज के हिस्से हैं के मनों को कैसे अलगाव की भावना पनपती है ये कैसे समाज में स्थान बना पाते हैं। क्या कहीं यह उनके साथ होने वाले भेदभाव के कारण तो नहीं है? कुछ संकीर्ण मानसिकता और उग्रवाद की पोषक मांगों का विरोध भी स्वतः सिख समाज के भीतर से होना चाहिये। श्रीमती इंदिरा गाँधी या सरदार बेअंत सिंह की हत्या करने वालों को संत की उपाधि कैसे दी जा सकती है और अगर इन्हें संत माना जायेगा तो फिर क्या धार्मिक कट्टरता नहीं बढ़ेगी? इन सवालों पर सिख समाज को सोचना चाहिये। आजकल यह भी मांग उठी है कि जिन्हें आतंकवाद के दौर में हत्याओं के अपराध में सजा हुई है उन्हें भी रिहा किया जाये। यह मांग उचित नहीं है। अपराध करने वाले को सजा देना न्यायिक प्रक्रिया है और उसे धार्मिक आधार पर नहीं देखा जाना चाहिये। हालांकि राज्य की पक्षपात पूर्ण और संकीर्ण कार्यवाही के कारण कई बार लोगों को ऐसी अनुचित मांगों के लिये तर्क मिल जाते हैं। मसलन गुजरात के बेकरी हत्याकांड में उम्र कैद की सजा पाये कुछ बंदियों को शासन द्वारा रिहा किये जाने की घटना एक गलत निर्णय था तथा वैधानिक शक्तियों व प्रक्रिया का खुला दुरूपयोग है। रिहा करने वाली कमेटी के एक सदस्य ने तो यहां तक कहा कि अपराधी ब्राम्हण है और जेल में उसका चाल चलन नेक है। इसीलिये उसे रिहा किया जाये। ऐसी घटनाओं से अन्य धर्मों और क्षेत्र के लोगों को एक तर्क का हथियार मिल जाता है और फिर वह उग्रवाद और आतंकवाद के लिये उर्वरक भूमि और खाद प्रदान करता है। समूचे देश, राजनैतिक दल और सत्ताओं को गंभीरता से इन उभरते खतरों को समझाना और उन्हें हल करना चाहिये। यही आज की आवश्यकता है। पाकिस्तान अफगानिस्तान और कई इस्लामिक देशों में आज जो हालात बन रहे है उनसे सबक सीखना चाहिये। कट्टरता का ना कोई अंत होता है और न कोई सीमा बल्कि यह निरंतर बढ़ती रहती है और मानिसक सिकुड़न पैदा करती है, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना देखने वालों को भी इस तथ्य को समझना होगा।

 

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।