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भारत अमेरिका डीलः यह ट्रेड डील नहीं बल्कि सरेंडर डील -रघु ठाकुर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 05 फरवरी को संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण और विपक्ष के आरोपों का उत्तर देते हुए कहा कि हम देश को बोफोर्स डील से ट्रेड डील तक लेकर आये हैं। इस कथन के माध्यम से जहां उन्होंने विपक्ष के ऊपर हमला बोला तथा बोफोर्स सौदे में हुए घोटाले की याद दिलाई वहीं अपने हाल के व्यापारिक समझौते का बचाव भी किया।

     हमारे देश में अक्सर ऐसा होता है कि मीडिया के माध्यम से कारपोरेट वॉर के हथियार के रूप में आरोप उछाले जाते हैं, सरकारें बदल जाती हैं और आरोप जस के तस बने रहते हैं। 1989 में बोफोर्स तोपों की खरीदी में भ्रष्टाचार के नाम पर सरकार बदली और प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह बने, परंतु जो आरोप उन्होंने लगाये थे उनके दोषियों को दंड मिले इसके लिए उन्होंने कुछ नहीं किया और बाद में तो यहां तक हुआ कि जब स्व. अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और कारगिल में घुसपैठ हुई थी तो उन घुसपैठियों के मुकाबले के लिए बोफोर्स तोपों का इस्तेमाल किया गया और बोफोर्स तोपों की श्रेष्ठता सिद्ध हुई। अब जो नया अमेरिका के साथ समझौता हुआ है उस पर चर्चा जारी है। कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री जी ने यूरोपियन यूनियन के साथ ट्रेड डील की थी और उसे मीडिया ने श्मदर ऑफ डील्य की संज्ञा दी थी। यह स्वाभाविक है कि सरकारें कोई निर्णय करती हैं तो मीडिया का बड़ा हिस्सा उसका प्रचारक बन जाता है। क्योंकि मीडिया घरानों और सरकार के बीच प्रत्यक्ष तौर पर विज्ञापनों की डील होती है और अप्रत्यक्ष तौर पर कारखानों के लाइसेंस, बैंक की कर्ज माफी, आर्थिक नीतियों के बदलाव आदि की डील होती है जो मीडिया के प्रचार के मुख्य आधार होते हैं।

   ईयू की डील के समय कहा गया कि अब भारत 20 लाख करोड़ डॉलर के मार्केट का हिस्सेदार बन गया है, हालाँकि यह डील अभी अपरिपक्व अवस्था में है। नियम यह है कि यूरोपियन यूनियन के अधिकारियों के साथ बातचीत में एक समझ बनी है, अब वे जाकर 6 माह के भीतर ईयू के देशों के साथ संपर्क कर निर्णय करेंगे और अगर इस डील के समर्थन में निर्णय होता है तो उसके क्रियान्वयन की शुरुआत में भी औसतन 4-5 वर्ष लग जाते हैं, परंतु प्रधानमंत्री मोदी को इनकी सरकार के लिए ऐसे काम करने का अभ्यास है। जब वे 2026 के बजट में 2047 की चर्चा कर सकते हैं तो  5 वर्ष का समय तो कम ही है। कम से कम मतदाताओं के लिए और देश के लिए झुनझुना तो पच्चीस साल का उन्होंने पकड़ा दिया है।

   अभी तक यूरोपियन यूनियन के साथ डील के जो समाचार आये हैं अगर वे क्रियान्वित भी हो तब भी उनसे असली भारत की जनता को क्या लाभ होगा? ईयू चाहता है कि भारत के द्वारा कार खरीदी के मामले में उसे सहभागिता मिले, अगर यह फैसला हो भी जाए तो इससे भारत के संपन्न और श्रेष्ठीय वर्ग के अलावा आम लोगों को क्या मिलेगा? आम लोगों को तो केवल धुआं और दुर्घटनाओं की मौत तथा भ्रष्टाचार की बढ़ोत्तरी मिलेगी। भारत के पहले भी ईयू ने इंडोनेशिया, सिंगापुर, जापान और यूके आदि के साथ ट्रेड डील की है, यूरोपीयन यूनियन की भी यह सफलता है। प्रचार तो यहां तक किया गया कि इस तथा कथित..मदर ऑफ आल डील.. से जियो पॉलिटिक्स बदलेगी और लोकतांत्रिक आर्थिक शक्तियों के बीच एक रणनीतिक विश्वास उभरेगा। यानि ये डील अमेरिका और चीन के दो धु्रवों के बीच में एक तीसरा धु्रव बनेगी। हालांकि इतना अतिविश्वास यूरोपियन यूनियन को भी नहीं है। यूरोपियन यूनियन को यूक्रेन के बचाव के लिए रूस से लड़ना पड़ रहा है और वह अभी तक उसमें सफल नहीं रहा है। यूरोपियन यूनियन के बारे में रूस ने यह कहा कि कुछ दिनों बाद ये सब अमेरिका के सामने घुटने के बल बैठे नजर आयेंगे और अमेरिका ने भी ईयू और भारत के डील के लिए कोई विशेष तरजीह नहीं दी। अमेरिका यह जानता है कि यूनियन के देश उससे अलग होकर बहुत दिनों तक अपनी अर्थव्यवस्था को नहीं बचा सकेंगे। अगर यह ..मदर ऑफ आल डील.. इतनी बड़ी उपलब्धि थी तो भारत को अमेरिका के साथ ट्रेड डील की क्या आवश्यकता थी? ईयू की डील ही पर्याप्त हो जाती। दरअसल ईयू की डील केवल प्रचारात्मक है क्योकि ईयू के देशों के पास भारत के समानों को बहुत अधिक खरीदने की ना तो जरूरत है और ना क्षमता है। अमेरिका का बाजार अभी तक भारत के लिए मुफीद था, क्योंकि भारत अभी तक अमेरिका से 9 लाख करोड़ का सामान निर्यात करता था और 4.5 लाख करोड़ का सामान आयात करता था। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत के होने वाले घाटे के एक हिस्से की पूर्ति इस तरीके से होती थी। दूसरे पिछले कुछ महीनों की घटनाओं से फिलहाल अमेरिका को एक विश्व शक्ति के रूप में देखना शुरू किया है और अपने सारे मनमानीपन, विदूषक तरीकों के बावजूद भी ट्रम्प अमेरिका की शक्ति का एहसास करा रहे हैं। वे एक साथ घर पर व बाहर दोनों मोर्चों पर बगैर अपने विचार को छिपाये खुलेआम लड़ रहे हैं, यह उनका अवगुण भी है और गुण भी है।

  अब भारत और अमेरिका के बीच जो ट्रेड डील हुई है, इससे भारत का रोता हुआ बाजार निफ्टी और सेंसेक्स जो पिछले कुछ दिनों से दहाड़ मार कर रो रहे थे, अब कह कहा कर हंस रहें हैं। याने वे जानते हैं कि, बाजार और कारपोरेट शक्तियों का लाभ अंतःअमेरिका के साथ समझौते में है। अमेरिका ने रूस के तेल खरीदी के नाम पर लगाये गए 25 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है। इससे भारत के निर्यात को जो पिछले माह से कमजोर अवस्था में था, अब फिर मौका मिला है। दरअसल एक पक्ष यह भी है कि अमेरिका जिन सामानों को भारत से खरीदता है वे कोई बुनियादी जरूरतों की चीजें नहीं हैं। जेवर, जेम्स, छोटो मोटी मशीन, दवा का रसायन आदि ऐसे ही सामान हैं जिनके बगैर अमेरिका का काम चल सकता है। अमेरिका इन सामानों को अन्य देशों से भी आयात कर सकता है।

   गुजरात के व्यापारियों का बड़ा हिस्सा और उनके परिवारजन अमेरिका में रहते हैं और उनका भी श्री मोदी पर दबाब था कि जैसे भी हो अमेरिका के साथ रिश्ते बहाल किए जाएं। इससे मोदी सरकार को फिलहाल अपनी सरकार बचाने में भी फायदा हुआ, और आगामी गुजरात चुनाव में भी इसका फायदा मिलेगा। हालाँकि व्यापार के क्षेत्र में यह बहुत मुनाफेमंद साबित नहीं होगा। अमेरिका भारत से सी फूड और विशेषतः झींगा खरीदेगा। दरअसल अमेरिका भारत से कुछ सामान इसलिए खरीदता है ताकि भारत को कुछ बाजार मिले और भारत उसका नीतिगत पिछलग्गू बना रहे। इसमें अमेरिका सफल भी हुआ है। पिछले कई माह से कहे अनकहे डोनाल्ड ट्रम्प को चुनौती देने वाले प्रधानमंत्री ने इस डील के बाद विनम्रता का बयान दिया है कि देश की 140 करोड़ आबादी आपकी आभारी है। यह बयान ही अपने आप में भारत की स्थिति को बताने के लिए पर्याप्त है । यानि प्रधानमंत्री ने माना है कि अमेरिका के साथ हुआ समझौता भारत की लगभग डेढ़ अरब आबादी के लिए हितकर है और इसलिए पूरा देश आभारी है। अमेरिका चाहता था कि भारत रूस से तेल खरीदना कम करे और यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि भारत वेनेजुअला के माध्यम से अमेरिकी प्रभाव का तेल खरीदेगा तथा कहे अनकहे रूस से खरीददारी कम होगी। दरअसल अमेरिका यूक्रेन को बचाने के लिए रूस की आर्थिक और सामरिक क्षमता कम करना चाहता है और इसमें वह सफल हुआ है। अमेरिका के कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस ने कहा है कि ट्रेड डील से अमेरिकी कृषि उत्पादों का निर्यात भारत के बाजार में बढ़ेगा जिससे 113 करोड़ डॉलर यानि लगभग 11000 करोड़ रुपये का भारत से व्यापार घाटा कम होगा और केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि कृषि और डेयरी सेक्टर हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है। यह बयान द्विअर्थीय है, एक तो इस रूप में कि यह नहीं कहा गया कि कृषि उत्पाद को लेकर कोई समझौता नहीं हुआ, बल्कि इतना ही कहा गया है कि कृषि और डेयरी के हितों से कोई समझौता नहीं हुआ। इससे इतना तो अर्थ स्पष्ट है कि अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों के भारत में आने के लिए सहमति बनी है। अब उसकी सीमा क्या होगी, कितने में भारतीय कृषि और डेयरी क्षेत्र के हित होंगे, यह श्री पीयूष गोयल ही समझ सकते हैं और अमेरिका अपने व्यापार घाटे को किस सीमा तक कम करेगा, यह खुलासा बकाया है।

स्वाभाविक है कि कोई भी देश किसी दूसरे देश से समझौता करता है तो वह अपना भी हित सुरक्षित रखता है। दरअसल, पिछले आठ महीनों से जो भारत और दुनिया के पटल पर ट्रंप और मोदी का ड्रामा चल रहा था इसका एक ही अर्थ और एक ही लक्ष्य था। मैंने आज से लगभग तीस वर्ष पहले अपनी पुस्तक आर्थिक उदारीकरण और भारत में लिखा था कि डब्ल्यूटीओ का समझौता कोई साल दो साल का नहीं है, बल्कि एक ऐसी लंबी दूरी का है जो सदी तक भी पहुंच सकता है। इस समझौते में ही भारत के कृषि के क्षेत्र को खोले जाने की बात थी। वैसे भी, भारत अनेक दुग्ध उत्पादक सामग्रियों को अनेकों देशों से आयात करता रहा है। क्या हमने दूध पाउडर डेनमार्क से आयात नहीं किया था? इतना ही है कि बस पहले किसी छोटे देश से छोटे-मोटे आयात होते थे। अब अमेरिका से बड़े पैमाने पर कृषि आयात होगा जिसमें कपास, सोयाबीन तेल, बीन्स आदि आदि उत्पाद शामिल होंगे। फिर भारत की ओर से अपनी बढ़ती आबादी की जरूरतों की पूर्ति का हवाला दिया जाएगा और भारतीय कृषि इससे बुरी तरह प्रभावित होगी। विपुल अनुदान प्राप्त अमेरिका में पैदा किया गया गेहूँ भारत खायेगा और भारत में 85 करोड़ लोगों को 5 किलो मुफ्त अनाज मिलेगा। भारत का सामान्य किसान बर्बाद होगा तथा 85 करोड़ मुफ्त अनाज पाने वाले सरकार की जय जयकार करेंगे। अमेरिका अपने आर्थिक हितों में सफल होगा और भारत की सरकार वोट की खेती में सफल होगी। अमेरिकी कपास को तो भारत सरकार ने कपास की फसल आने के पहले ही आयात की अनुमति दे दी थी। यह हमारे देश के विपक्ष के बौद्धिक दिवालियापन का भी प्रतीक है कि जब घटनायें होती हैं, तब वे अज्ञानता या अपने अतीत के अपराधों के दबाव में चुप रहते हैं और जब वे बीज विराट-वृक्ष बन जाते हैं तब प्रतिपक्ष थोड़ा बहुत हल्ला मचाकर चुप हो जाता है। अगर प्रतिपक्ष भी ईमानदार है तो उसे ये घोषणा करनी चाहिए कि अगर प्रतिपक्ष की सरकार आएगी तो डब्ल्यूटीओ के समझौते से बाहर निकलेंगे, जो कि बचाव का वास्तविक रास्ता है। अमेरिका के साथ हुई डील में यह भी तय हुआ कि जहां एक तरफ अमेरिका टैरिफ को कम कर रहा है वहीं भारत भी अमेरिका 100 करोड़ डॉलर का अमेरिका से प्रतिवर्ष आयात से टैरिफ हटाएगा तथा पांच वर्ष में पांच सौ करोड़ के व्यापार को टैक्स अमेरिकी डॉलर मुक्त करेगा।

 सच्चाई तो यह है कि ये ट्रेड डील नहीं है, बल्कि सरेंडर है। यह व्यापार समझौता नहीं है, बल्कि भारत का समर्पण है। प्रधानमंत्री जी ये कह रहे हैं कि खाड़ी देश परिषद के छह देशों से मुक्त व्यापार की बात हो रही है। इस व्यापार से भारत कुछ राहत तो पाएगा, परंतु अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने के सपने को दूर तक लेकर नहीं जा पाएगा।

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।